
Spotlight
Mothers Day Mothers Day भोपाल.
वह कभी स्कूल नहीं गई, सारी जिंदगी पत्थर तोड़ने में गुजर गई, पर आज उसका चेहरा गर्व से दमक रहा है। दोनों बेटे इंजीनियर बनने की राह में हैं और उसे इसका संतोष है कि कम से कम उसके बच्चों को मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी।
राजधानी की एक झुग्गी बस्ती में रहने वाली आदिवासी महिला दौलीबाई ने खुद पत्थर तोड़ते-तोड़ते अपने बेटों का भविष्य गढ़ दिया है। करीब 13 साल पहले पति भावसिंह के निधन के बाद से ही दौली ने सोच लिया था कि गरीबी को वह बच्चों की नियति नहीं बनने देगी। इसलिए खुद निरक्षर होते हुए भी ठान लिया कि बच्चों को पढ़ाना है। उसने दो पाली में मजदूरी शुरू कर दी।
मां के संघर्ष में बच्चों ने भी साथ दिया। मां दिन-रात पत्थर तोड़ती थी, लेकिन बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजने का काम उससे कभी नहीं छूटा। चार साल पहले संघर्ष की अंधी सुरंग में सफलता की पहली किरण नजर आई जब दौली के बड़े बेटे कमल ने पीईटी पास की और राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विवि के यूआईटी में उसका सिलेक्शन हो गया। इसके तीन साल बाद छोटे बेटे भैयालाल को भी इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिल गया।
बड़ी बेटी मीना बीकाम फाइनल में है और बैंक अधिकारी की परीक्षा की तैयारी कर रही है। सबसे छोटी रेखा 10वीं कक्षा में पढ़ रही है। चारों बच्चे अपनी सफलता का श्रेय सिर्फ अपनी मां के संघर्ष को देते हैं। कमल की आंखें आज भी वह दिन याद कर भर आती हैं जब उसे सिलेक्शन होने की सूचना मिली थी।
उसने भास्कर को बताया, ‘समझ नहीं पा रहा था कि काउंसिलिंग के लिए किसे साथ ले जाऊं, मेरा गर्व तो मेरी मां हैं, उन्हें ही लेकर गया।’ मीना कहती हैं, ‘जब-जब किसी ने मेरी शादी की बात की, मां ने यही कहकर मना कर दिया कि इसे पढ़ लेने दो, ताकि उसकी हालत मेरी जैसी न हो।’
लगातार एक मां के कत्र्तव्य निर्वाह में जुटी रहने वाली दौला बाई के ये शब्द खासे मायने रखते हैं, ‘ऐकली थी। म तो कदी स्कूल नी गई, पर बच्च को स्कूल पाढ़ानो जरूरी लग्यो, फिर वाने तगारी न उठानी पड़े।’