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Mothers Day Mothers Day
मुझे याद है कि मैं जब छोटा सा था उस समय घर में बहुत सी समस्या थी। घर में खाने के लिए भी काफी मशकक्त भरे समय से गुजरना पड़ता था। घर में कुल मिलाकर पांच परिवार एक साथ रहते थे, लेकिन सब बाहर रहते थे, मेरे पिता जी एक वकील थे लेकिन बाद में वे वकालत छोड़कर घर के खाने-पीने की समस्या को खेती के माध्यम से दूर करने में लग गए।
मां एक ऐसी मूरत का नाम है जो कि खुद तो भूखी रह लेगी लेकिन बच्चों को भूखे पेट नही रहने देगी। उस समय खाने पीने को लेकर घर में प्रतिदिन लड़ाई-झगड़ा होता था। कभी एक टाइम खाना बनता था तो कभी दोनों टाइम चूल्हा ही नही जलता था, चूंकि उस समय बारिस बहुत कम होती थी इसलिए खेती ठीक तरह से नहीं हो पाता था। घर के बाहर का काम सब पिता जी करते थे और घर के अंदर का काम मां के हांथों में था। उस समय घर में जबकि पांच परिवारों की औरतें रहती थी, लेकिन इन सभी में मेरी मां सबसे छोटी थी, इसलिए उसे चारों तरफ से कहा सुनी के साथ-साथ घर का सारा कामकाज करना पड़ता था।
मां अकेली चूल्हे पर बैठकर सबके लिए खाना बनाती थी, लेकिन जैसे ही खाना पूरा बन जाता था घर की दूसरी औरतें खाना अपने-अपने घर में उठा ले जाती थी और मां के लिए कभी कुछ बचता था कभी नहीं। इन परिस्थतियों मां कभी भूखे रहती थी तो कभी पानी पीकर ही दिन गुजार देती थी। लेकिन मेरे लिए मां चोरी चुपके से जो रूखी-सूखी रोटी या चावल बचा रहता था खुद भूखे रहकर मुझे अपने प्यार भरे हांथों से खिलाती थी। मेरे पूछने पर कि मां तुमने खाना खाया तो मां बोलती थी हां बेटा मैंने तो कबके खा लिया है। कौन ऐसा कर सकता है। कौन किसके लिए भूखा रह सकता है ऐसा केवल मां ही वह परमात्मा है जो ऐसा कर सकती है।
मां को मैं दूर रहकर भी कभी नही भुला सकता हूं। मां मेरे लिए सभी देवी-देवताओं से भी उपर विराजमान है। जब मैं छ या सात महीने बाद घर जाता हूं तो सबसे पहले घर से बाहर मां ही दौड़ती हुई आती है और अपने सीने से लगा लेती है। उस समय ऐसा लगता है जैसे सारी सुख और शांती मां के गले लगते ही मिल गई। बस और कुछ नहीं चाहिए इतने दिन का छूटा हुआ प्यार एक मिनट में मिल गया। सभी देवी-देवता, सभी धर्म-पुराण और सारे तीर्थस्थान मां के ही चरणों में है। इतने दिन के बाद घर जाने पर मां के हांथों से खाना-खाना, सर पर तेल रखना, सुबह शाम कुछ न कुछ पूछते रहना इन सबके बाद ऐसा लगता है जैसे मैं कभी बाहर गया ही नहीं था।
मेरे इस पच्चीस साल के दौर में अभी भी मां का वही प्यार, वही ममत्व है जैसे बचपन में हुआ करता था। बचपन में पता नहीं मैनें कितनी गलतियां की, कितनी बार मां को रूलाया, कितना सताया लेकिन मां का प्यार कभी भी न कम हुआ और न कभी कम होगा। मुझे याद है मेरा एक बार पड़ोस के एक लड़के के साथ झगड़ा हो गया। इस बात को लेकर पड़ोस से जब शिकायत आई तो उस समय मेरे पिता जी ने मुझे काफी मारा इस बीच बचाव में मां को भी चोटें आईं लेकिन इस बात की परवाह किये बगैर मां ने मुझको पिता जी के हांथों से बचाया। परिवार के सभी लोग वहां खड़े होकर तमाशा देख रहे थे लेकिन बचाने के लिए कोई सामने नही आया।
मेरे लिए मेरी मां हमेशा एक आदर्श रही है जिसने हमेशा सही-गलत के रास्ते को बताया। अगर मैं किसी गलत काम को करता था तो मां तुरंत ही बताती थी कि यह काम सही नहीं है। ऐसा कौन कर सकता है। इस अज्ञान रूपी संसार में कोई किसी को सही रास्ता नहीं दिखाता है। वह मां ही है जो हमेशा बच्चों के लिए एक आदर्श के रूप में रहकर सही-गलत के रास्ते को बताती है और चलने का मार्ग प्रशस्त करती है।
मै इतनी दूर हूं लेकिन मां का नाम लेते ही मां मेरी आंखों के सामने आकर खड़ी हो जाती है। ऐसी मां को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम जिसने मुझे बड़ा किया, पढ़ाया-लिखाया, सही-गलत को बताया और साथ ही साथ प्रथम पाठशाला बनकर बचपन में छोटी-छोटी मगर महत्वपूर्ण बातों को सिखाया और इस काबिल बनाया कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो सकूं।
मैं मां को कोई गिफ्ट या कोई उपहार तो नहीं दे सकता हूं क्योंकि उसके ममत्व के कर्ज तले मैं इस तरह से दब गया हूं कि कुछ भी देकर उसके इस उपकार के कर्ज तले से अपने आपको उबार नहीं सकता। सारे गिफ्ट या उपहार मां की ममता के लिए तुच्छ है। कोई भी उपहार मां के कर्ज को नही उतार सकता है। मां को इन सब से परे केवल एक ही चीज चाहिए वह है अपने बच्चों का प्यार। बच्चों का प्यार मां को सब कुछ मिल जाने का ऐहसास दिला देती है।
लेखक भास्कर डॉट कॉम में उप संपादक के पद पर कार्यरत है