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चंडी दी वार

चंडी दी वार को वार श्री भगौती जी के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ होता है देवी की कविता, गीत या गजल। ये श्री गुरु गोविंद सिंह जी की रचना है जिसे दशम ग्रंथ के पांचवें अध्याय में स्थान दिया गया है। धरम पाल आस्था इसे सबसे अच्छी पंजाबी कविताओं में से एक मानते हैं।

इस कविता में परिकल्पनाओं की प्रचुरता है, तेज झरने की तरह तीर चला करते हैं, बिजली जब कौंधती है तो सांप के फुंफ कारने की सी आवाज आती है, सैनिकगण जंगली जानवरों की भांति प्राणघातक लड़ाई में दिखते हैं। खालसा जब युद्धक्षेत्र की तरफ जाते हैं तो ये गीत काफी रुचि के साथ गाते हैं।

वार का प्रथम भाग अरदास के नाम से जाना जाता है। ये सिख प्रार्थना का शुरुआती हिस्सा होता है जिसमें गुरुओं के नामों का उल्लेख है..

ੴ ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਕੀ ਫਤਹ ॥
ਸ੍ਰੀ ਭਗਉਤੀ ਜੀ ਸਹਾਇ ॥
ਵਾਰ ਸ੍ਰੀ ਭਗਉਤੀ ਜੀ ਕੀ ॥
ਪ੍ਰਿਥਮ ਭਗੌਤੀ ਸਿਮਰਿ ਕੈ ਗੁਰੁ ਨਾਨਕ ਲਈਂ ਧਿਆਇ ॥
ਫਿਰ ਅੰਗਦ ਗੁਰ ਤੇ ਅਮਰਦਾਸੁ ਰਾਮਦਾਸੈ ਹੋਈਂ ਸਹਾਇ ॥
ਅਰਜਨ ਹਰਿਗੋਬਿੰਦ ਨੋ ਸਿਮਰੌ ਸ੍ਰੀ ਹਰਿਰਾਇ ॥
ਸ੍ਰੀ ਹਰਿ ਕਿਸ਼ਨ ਧਿਆਈਐ ਜਿਸ ਡਿਠੇ ਸਭਿ ਦੁਖਿ ਜਾਇ ॥
ਤੇਗ ਬਹਾਦਰ ਸਿਮਰਿਐ ਘਰ ਨਉ ਨਿਧਿ ਆਵੈ ਧਾਇ ॥
ਸਭ ਥਾਈਂ ਹੋਇ ਸਹਾਇ ॥1॥

अनुवाद:
यशस्वी गुरु की जय हो। मैं देवी की कविता लिखता हूं, श्री भगवती जी हमारी सहायता करें। सर्वप्रथम मैं भगवती का ध्यान करता हूं जिनका प्रतीक चिह्न तलवार है और उसके बाद मैं गुरु नानक जी का ध्यान करता हूं। इसके बाद गुरु अजरुन, गुरु अमर दास और गुरु राम दास हमारी सहायता करें।

मैं गुरु अजरुन, गुरु हरगोविंद और गुरु हर राय का ध्यान करता हूं। मैं गुरु हर किशन को याद करता हूं जिनके स्मरण मात्र से सारी तकलीफें दूर हो जाती हैं। मैं गुरु तेगबहादुर को भी याद करता हूं जिनकी कृपा से नौ खजाने मेरे घर आते हैं। मैं प्रार्थना करता हूं कि ये सारे सभी जगह हमारी सहायता करें।

गुरु गोविंद सिंह देवी चंडी के अवतार को एक ऐसी शक्ति मानते हैं जो सारे दानवों का विनाश करती है।

ਤੈ ਹੀ ਦੁਰਗਾ ਸਾਜਿ ਕੈ ਦੈਤਾ ਦਾ ਨਾਸੁ ਕਰਾਇਆ ॥
ਤੈਥੋਂ ਹੀ ਬਲੁ ਰਾਮ ਲੈ ਨਾਲ ਬਾਣਾ ਦਹਸਿਰੁ ਘਾਇਆ ॥
ਤੈਥੋਂ ਹੀ ਬਲੁ ਕ੍ਰਿਸਨ ਲੈ ਕੰਸੁ ਕੇਸੀ ਪਕੜਿ ਗਿਰਾਇਆ ॥
ਤੈਥੋਂ ਹੀ ਬਲੁ ਕ੍ਰਿਸਨ ਲੈ ਕੰਸੁ ਕੇਸੀ ਪਕੜਿ ਗਿਰਾਇਆ ॥
ਬਡੇ ਬਡੇ ਮੁਨਿ ਦੇਵਤੇ ਕਈ ਜੁਗ ਤਿਨੀ ਤਨੁ ਤਾਇਆ ॥
ਕਿਨੀ ਤੇਰਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥2॥

अनुवाद:
हे भगवान! दुर्गा को बनाकर आपने दानवों का संहारकत्र्ता तैयार कर दिया है। राम ने आपसे ही शक्ति ग्रहणकर रावण को तीरों से मारने में सफलता पाई थी। कंस को बालों से पकड़कर पटकने की ताकत भी कृष्ण ने आपसे ही हासिल की थी। अत्यंत बुद्धिमान लोग और देवतागण जो कई साल से तपस्या कर रहे हैं, वे भी आपकी क्षमताओं से पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं।





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