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ऑस्कर के लिए ‘धर्म’ क्यों नहीं?
ब्लैक वर्सेस पहेली और लगे रहो मुन्नाभाई वर्सेस रंग दे बसंती के बाद अब लड़ाई है धर्म वर्सेस एकलव्य की। ऑस्कर के लिए धर्म क्यों नहीं? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान में फिल्में सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं रहीं बल्कि ग्लोबल स्तर पर व्यापार के साथ-साथ भारत की रचनात्मकता, छवि और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने लगी हैं। इस बार ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म की श्रेणी में विधु विनोद चोपड़ा की एकलव्य को चुना गया है और भावना तलवार निर्देशित पंकज कपूर के कमाल के अभिनय वाली धर्म को नजरअंदाज कर दिया गया है। बॉलीवुड के खेमों में इस निर्णय को लेकर विवाद छिड़ गया है। ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री चुनने के नियम-कायदों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। इस मुद्दे पर भास्कर डॉट कॉम की विशेष पड़ताल..
‘धर्म’ के साथ हुई राजनीति : भावना

इस बार ऑस्कर पुरस्कार के लिए सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म की श्रेणी में भारत की ओर से विधु विनोद चोपड़ा की एकलव्य का चयन किया गया है। एकलव्य के मुकाबले कई बेहतर फिल्में होते हुए भी इस फिल्म के चयन से फिल्म उद्योग के कई लोग नाराज हैं तो ऑस्कर के लिए चयन में राजनीतिकरण का आरोप भी लग रहे हैं।

‘धर्म’ फिल्म को ऑस्कर अवार्ड के लिए भारत की तरफ से न भेजने के पीछे राजनीति हुई है और इसके लिए सुधीर मिश्रा और नदीम खान जैसे लोग जिम्मेदार है। यह खुलासा फिल्म की निर्देशक भावना तलवार ने भॉस्कर डॉट काम से एक विशेष बातचीत के दौरान किया है .. पढ़ें...

टकराव की शिकार हो गई धर्म!
ऑस्कर के लिए आधिकारिक प्रविष्टि के तौर पर भेजी जाने वाली फिल्म को लेकर माना जा रहा है कि दो सुपरस्टारांे के बीच चल रही जंग भी चयन के आधार के लिए एक दबाव थी। एक तरफ थी अमिताभ बच्चन स्टारर एकलव्य और दूसरी तरफ शाहरुख स्टारर चक दे इंडिया। पढ़ें...

मेरी फिल्म एकलव्य पर आलोचकों ने भी खुले दिल से अच्छी टिप्पणी की है और विदेशों के लोगों ने भी इसे एक मास्टरपीस की संज्ञा दी है लेकिन असली काम अब शुरू होगा। मुझे उम्मीद है कि हम वहां जाएंगे और भारत को गौरवान्वित करेंगे। मैं हमेशा अपनी फिल्मों में 100 प्रतिशत देने की कोशिश करता रहा हूं और अब भी करता रहूंगा। मैंने परिणीता और फिर लगे रहो मुन्नाभाई का निर्माण किया और फिर उसी तरह की कोशिश। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पहले दोनों फिल्मों को ऑस्कर के लिए नहीं चुना गया।

Vidhu Vinod Chopdaइस बार एकलव्य को चुने जाने के बाद मैं अपने लॉस एंजिल्स ऑफिस में कुछ लोगों को फिल्म के प्रचार के लिए जिम्मेदारी देने की योजना बना रहा हूं। मैं इतना ही कह सकता हूं कि वहां जाना और समारोह का एक हिस्सा बनना आसान है लेकिन असली परीक्षा यह है कि आप वहां से खाली हाथ लौटते हैं या ट्रॉफी के साथ।

- विधु विनोद चोपड़ा
चयन प्रक्रिया में बदलाव जरूरी
जब तक सक्रिय फिल्मकार, आलोचक और फिल्म से जुड़े सरकारी नुमाइंदे पूरी चयन प्रक्रिया को जिम्मेदारी और गंभीरता से नहीं लेते तब तक गलत चयन होते रहना सामान्य बात है और ऑस्कर का भारत के खाते में आना सिर्फ एक सपना ही। पढ़ें...
रास्ता ढूंढने की कोशिश :
भावना तलवार और ज्यूरी के बयानों के बाद जो सवाल उभरकर आए हैं, उनका हल ढूंढने की कोशिश की जाए :
1. ज्यूरी सदस्यों की योग्यता और छवि महत्वपूर्ण है इसलिए उन कलाकारों को ज्यूरी सदस्य बनाया जाए जिनके पास उपलब्धियों के साथ अच्छी छवि भी है?
    • हां
    • नहीं
2. ऑस्कर पुरस्कार के लिए प्रमोशन में अगले स्तर पर काफी धन खर्च होता है तो छोटे निर्माताओं की चयनित फिल्मों को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और फिल्म विभाग द्वारा बड़े स्तर पर प्रमोट किया जाना चाहिए।
    • हां
    • नहीं
3. गलत फिल्म के चयन पर ज्यूरी की जवाबदारी तय की जाना चाहिए और इसके लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान किया जाना चाहिए?
    • हां
    • नहीं
4. क्या इस साल धर्म की अनदेखी कर एकलव्य को ऑस्कर एंट्री के लिए चुना जाना गलत फैसला है?
    • हां
    • नहीं
5. इस साल ऑस्कर के स्तर की फिल्म के रूप में आप किस फिल्म को चुनना चाहेंगे?
    • धर्म
    • चक दे इंडिया
    • पारजानिया
    • ब्लू अंब्रेला
    • गांधी माय फादर
    • एकलव्य
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मैं कहना चाहता हूं कि यहां कोई राजनीतिकरण नहीं है। मुझे लगता है कि एकलव्य तकनीक की दृष्टि से काफी संपन्न फिल्म है और विदेशी फिल्मों के लिए ऑस्कर की श्रेणी में टॉप 5 में जगह बना सकती है। इसके अलावा इस फिल्म में भारत की महक काफी दिखती है। मौलिकता भी एक कारण है। दो घंटे के भीतर वाली एकलव्य को विदेशों में भी आलोचकों ने काफी सराहा था और तकनीक के अलावा भी एकलव्य में बहुत कुछ तत्व हैं। मैं नहीं समझता कि चयन के बारे में कोई सवाल उठाया जाना चाहिए। फिर पूरी ज्यूरी ने मिलकर यह फैसला किया है और मैं उनके मत से सहमत था।Sudhir Mishra

भावना तलवार की धर्म और शिमित अमीन की चक दे इंडिया का दावा पुख्ता होने के बारे में मिश्रा ने कहा कि चक दे इंडिया बढ़ियाफिल्म थी। इसमें भारतीयता भी काफी थी लेकिन खेलों पर इस तरह की फिल्में अमेरिका के लिए कोई खास छवि नहीं रखतीं। भावना की फिल्म भी प्रबल दावेदार थी लेकिन यह काफी निराशा की बात है कि इतने बड़े और सांस्कृतिक विविधता वाले देश से हमें केवलएक ही फिल्म भेजने की इजाजत है।

- सुधीर मिश्रा
जायज है भावना की नाराजगी

ज्यूरी सदस्यों के बीच हुए खुले मतदान में एंट्री की हकदार धर्म दरकिनार कर दी गई। यह खुद ज्यूरी अध्यक्ष विनोद पांडे ने फोन पर कहा। क्या यह नियमों के अनुकूल है? नियम कहता है कि गुप्त मतदान हो। इस नियम को क्यों तोड़ा गया? और ज्यूरी अध्यक्ष होने के नाते क्या यह पांडे का कर्तव्य नहीं था कि वे एक बेहतर फिल्म, जिसे वे एंट्री का हकदार मानते हैं, के समर्थन में खड़े हों?

Bhavnaभावना ने सुधीर मिश्रा पर भी निशाना साधा : अगर मिश्रा कहते हैं कि एकलव्य तकनीकी दृष्टि से ज्यादा अच्छी फिल्म है तो प्लीज उसे टैक्निकल श्रेणी में ऑस्कर के लिए नामांकन हेतु भेजें। मैंने एकलव्य देखी थी और उस फिल्म ने सिवाय बोर करने के कुछ और नहीं किया। मैं किसी भी चरित्र से जुड़ाव महसूस नहीं कर सकी। उसका अंत क्या था? फिल्म कहना क्या चाह रही थी?

संयोजन एवं संपादन : भवेश दिलशाद