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Rakshabhandan Rakshabhandan श्रवण नक्षत्र का नाम श्रवण कुमार पर कैसे पड़ा, इस बारे में एक पौराणिक कथा है : श्रवण कुमार की पत्नी श्रवण को तो खीर-मिष्ठान्न खिलाती थीं, लेकिन वृद्ध व अंधे सास-ससुर को आटे की रबड़ी दिया करती थीं।
एक बार श्रवण के माता-पिता ने खीर खाने की इच्छा जाहिर की, मगर पत्नी ने अपने पति को तो खीर खाने को दी और सास-ससुर को आटे की रबड़ी। जब इसका पता
श्रवण को चला तो उनके अंदर वैराग्य-भाव जाग पड़ा और वे वृद्ध माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ-यात्रा करवाने ले गए। जब वे जंगल से गुजर रहे थे, तो माता-पिता को प्यास लगी। पानी लेने तालाब पहुंचे श्रवण जब लोटे में पानी भर रहे थे तो आवाज हुई, जिसे सुनकर शिकार की टोह में बैठे राजा दशरथ ने शब्दबेधी बाण चला दिया। बाण लगते ही श्रवण के मुंह से कराह निकली, जिसे सुनकर राजा दशरथ पास पहुंचे और उन्होंने युवक को घायल अवस्था में पड़ा पाया।
यह देखकर उन्हें घोर पश्चाताप हुआ। मरणासन्न अवस्था में श्रवण ने राजा दशरथ से अपने माता-पिता को पानी पिलाने का आग्रह किया। राजा दशरथ पानी लेकर श्रवण के वृद्ध माता-पिता के पास पहुंचे और उन्हें दुर्घटना के बारे में बताया। गुस्से में श्रवण के माता-पिता ने राजा को श्राप दे डाला। राजा दशरथ ने अपनी गलती का प्रायश्चित करते हुए कहा कि आज जो नक्षत्र है, वह श्रवण के नाम से सर्वपूज्य होगा तथा श्रावणी पूर्णिमा को द्वार-द्वार पर सर्वप्रथम उनकी ही पूजा होगी।