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Rakshabhandan Rakshabhandan श्रवण नक्षत्र में बांधा गया रक्षासूत्र अमरता, निडरता, स्वाभिमान, कीर्ति, उत्साह एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाला होता है। पौराणिक काल में तो पत्नी भी अपने पति के सौभाग्य के लिए रक्षासूत्र बांधा करती थी, लेकिन परंपरा बदलते-बदलते इसकी सार्थकता भाई-बहन के रिश्तों पर आकर टिक गई है।
ज्योतिषशास्त्र में श्रावण का नामकरण श्रवण नक्षत्र के कारण हुआ है जबकि श्रवण नक्षत्र का नामकरण मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार के नाम पर हुआ है। श्रवण नक्षत्र में तीन तारे होते हैं और वे तीन चरण (वामन भगवान के तीन कदम) के प्रतीक चिह्न् हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार तीन तारे श्रवण के माता-पिता एवं स्वयं श्रवण कुमार के प्रतीक हैं। इसी तरह अभिजीत नक्षत्र राजा दशरथ का प्रतीक है, जो कि शिकार की मुद्रा में बैठा है।
उत्तराषाढ़ एवं पूर्वाभाद्रपद दोनों नक्षत्रों की आकृति मंच की तरह है तथा तारों की संख्या भी दो ही है। उत्तराभाद्रपद नक्षत्र की आकृति स्त्री-पुरुष की जोड़ी है और ये ही श्रवण कुमार के माता-पिता हैं। उत्तराषाढ़ नक्षत्र का मंच राजा दशरथ का है, तो पूर्वाभाद्रपद के मंच पर श्रवण अपने माता-पिता का स्थान बनाकर रहते हंै।
श्रावण मास में सूर्य प्राय: कर्क राशि में रहता है और कर्क राशि भी जलचर राशि है। जिस प्रकार राजा दशरथ ने श्रावणी पूर्णिमा को प्रायश्चित किया था, उसी प्रकार सभी वर्णो के लोग प्रायश्चित निमित्त श्रावणी कर्म संपन्न करते हैं। यह मास अध्ययन तथा अध्यापन के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। 28 नक्षत्रों में श्रवण अपना विशेष महत्व रखता है। श्रवण नक्षत्र में जिनका जन्म होता है, वे बड़े पराक्रमी, स्वाभिमानी, सहनशील, स्पष्टवादी और सेवाभावी होते हैं। श्रावण माह और श्रवण नक्षत्र में जन्मे जातक अच्छी प्रगति करते हैं, लेकिन गुप्त शत्रुओं के भय से अनेक योजनाओं को अकारण ही अधूरी छोड़ देते हैं।
इस काल में जन्मे जातकों की आयात-निर्यात, अध्ययन अध्यापन, चिकित्सा, तकनीकी शिक्षा, कला, रसायन आदि में विशेष रुचि रहती है। दांपत्य जीवन साधारण रहता है। इस नक्षत्र में जन्मे लोग अक्सर माता-पिता से दूर हो जाते हैं। मुहूर्त की दृष्टि से श्रवण नक्षत्र मांगलिक कार्यो के लिए ग्राह्य होता है। गर्भाधान, कर्णवेध, मुंडन, विद्यारंभ, वधू प्रवेश, द्विरागमन, वापी, कूप, तालाब निर्माण, कृषिकर्म आदि में यह नक्षत्र शुभफल दायक होता है। शिव आराधना की दृष्टि से भी श्रवणयुक्त पूर्णिमा सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। रक्षासूत्र का संबंध भी श्रवण नक्षत्र से होता है, क्योंकि सरसों, केसर, चंदन, अक्षत, दूर्वा, सुवर्ण आदि को एक पोटली में बांधकर उस वस्त्र को सूत्र में बांधकर पुरुष के दाहिने हाथ तथा महिला के बाएं हाथ में बांधने पर रक्षा बंधन हो जाता है।
श्रवण नक्षत्र में बांधा गया यह रक्षासूत्र अमरता, निडरता, स्वाभिमान, कीर्ति, उत्साह एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाला होता है। पौराणिक काल में तो पत्नी भी अपने पति के सौभाग्य के लिए रक्षासूत्र बांधा करती थी, लेकिन परंपरा बदलते-बदलते इसकी सार्थकता भाई-बहन के रिश्तों पर आकर टिक गई लगती है।