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सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट यानी स्वेज कैनाल ऑफ ईस्ट

सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट की कहानी करीब डेढ़ सौ साल पहले शुरू हुई थी। लेकिन यह विवाद अभी हाल ही में शुरू हुआ जब केंद्र सरकार ने इस प्रोजेक्ट पर अपनी मंजूरी की मोहर लगा दी।पाक खाड़ी और मन्नार की खाड़ी के बीच एक शिपिंग कैनाल बनाकर भारत और श्रीलंका को जोड़ने की योजना को सेतुसमुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट कहा जाता है। द्वीपों की एक श्रंखला को राम सेतु या पुल की संज्ञा दी जाती है। इसे एडम्स ब्रिज भी कहा गया है। उम्मीद जताई जा रही है कि इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद भारतीय प्रायद्वीप के आसपास एक स्पष्ट समुद्री रास्ता तैयार हो जाएगा। इस प्रोजेक्ट के तहत 44.9 नॉटिकल माइल यानी 83 किलोमीटर तक लंबे समुद्र में खुदाई कर उसे पाक जलडमरूमध्य के रास्ते मन्नार की खाड़ी तक जोड़ने का विचार है। 1860 में इस बारे में सबसे पहले एल्फ्रेड डुंडास टेलर ने अपनी रिपोर्ट दी थी।

उथले पानी की वजह से पाक जलडमरूमध्य के बीच समुद्री रास्ता काफी कठिन हो जाता है। हालांकि श्रीलंका और भारत के बीच करीब दो हजार पहले से ही व्यापारिक संबंध रहे हैं लेकिन ये संबंध छोटी नौकाओं और दिंगियों के सहारे ही चलते रहे हैं। बड़े जहाजों को भारत तक पहुंचने के लिए श्रीलंका के चारों ओर चक्कर काटकर आना पड़ता है। जाने माने ब्रिटिश भूगोलज्ञ मेजर जेम्स रैनेल ने इस इलाके का काफी सर्वे किया था और उसका मानना था कि अगर रामीसेरम इलाके से समुद्र में खुदाई करके एक रास्ता तैयार कर लिया जाए तो एक रूट तैयार हो सकता है। तब उसके प्रस्ताव पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया। इसके बाद 1838 में इस जलडमरूमध्य के बीच एक नहर बनाने की कोशिश भी हुई, पर वह भी बेकार साबित हुई, क्योंकि हल्के जहाजों के अलावा कोई भी बड़ा जहाज इस रास्ते से फिर भी नहीं गुजर सकता था।

एडम्स ब्रिज यानी रामसेतु शोआल की एक चेन है जो 30 किलोमीटर लंबी है। सर इमरसन टैनेट ने अपनी किताब सीलोन में लिखा है कि एडम्स ब्रिज ऐसा बैरियर है जिससे सीलोन और रमाद के बीच जहाजों का निकलना मुश्किल होता है। ज्योलॉजिकल सर्वे के मुताबिक एडम्स ब्रिज के नीचे मियोसीन काल के लाइमस्टोन बैड हैं जो श्रीलंका के जाफना इलाके को भारत में रामेश्वरम से जोड़ते हैं। कथाएं और आर्कियोलॉजिकल प्रमाण भी बताते हैं कि श्रीलंका में मानव आबादी के प्रमाण 17 लाख 50 हजार साल पुराने हैं और इस सेतु की उम्र भी तकरीबन इतनी ही है। हालांकि इस बारे में सभी वैज्ञानिक एकमत नहीं हैं। इसी के साथ यह बात भी जुड़ी है कि महाकाव्य रामायण का काल भी 17 लाख साल पुराना बताया जाता है, जिसमें इस सेतु के होने की बात कही गई है।

1860 में इंडियन मैरीन्स के कमांडर एडी टेलर ने इस प्रोजेक्ट पर फिर विचार किया पर कोई नतीजा फिर भी नहीं निकला। 1955 में भारत सरकार ने सेतु समुद्रम प्रोजेक्ट कमेटी बना दी जिसके अध्यक्ष थे डॉ ए रामासामी मुदलियार। कमेटी को इस प्रोजेक्ट का अध्ययन करने को कहा गया। कई बार अध्ययन के बाद कमेटी ने इस प्रस्ताव को कीमत और लाभ की दृष्टि से उपयुक्त पाया। तब इस प्रोजेक्ट की कीमत 9.98 करोड़ रुपए आंकी गई थी। इसके बाद रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी गई। 1963 में सरकार ने केवल तूतीकोरिन प्रोजेक्ट को ही मंजूरी दी। इसके बाद फिर से सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का अध्ययन हुआ। आखिरकार मौजूदा यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलाएंस (यूपीए) सरकार के प्रमुख प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2 जून 2005 को इसे अपनी मंजूरी दे दी।

प्रोजेक्ट के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह है कि बड़े जहाजों के लिए करीब 424 नॉटिकल माइल दूरी यानी 30 घंटे का सफर कम हो जाएगा। माना जा रहा है कि तटीय तमिलनाडु को आर्थिक और औद्योगिक फायदा पहुंचेगा। तूतीकोरिन बंदरगाह को इसका ज्यादा लाभ मिलेगा, जो खुद को एक नोडल पोर्ट में बदल सकेगा। तमिलनाडु सरकार पहले ही 13 और नए बंदरगाहों का निर्माण करने का फैसला कर चुकी है।

प्रोजेक्ट की कुल कैपिटल कीमत 2233 करोड़ रुपए आंकी गई है और वित्तीय कीमत होगी 194.4 करोड़ रुपए। केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम के मुताबिक यह 100 साल पुराने एक सपने के पूरा होने के बराबर है और इससे मिलने वाले लाभ वैसे ही होंगे जैसे स्वेज और पनामा कैनाल के बनने से हुए थे।



लिंक्स
*प्रेजेंटेशन
*सरकारी नजरिए के लिए लिंक देखें
*सेतु समुद्रम





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