कई नैवल हाइड्रोग्राफर्स और विशेषज्ञों की राय है कि इस प्रोजेक्ट के जरिए शायद ही कोई बड़ा वित्तीय लाभ कमाया जा सके। कन्याकुमारी या तूतीकोरिन से निकलने वाले जहाजों के लिए 10 से 30 घंटे के समय में बचत होगी। लेकिन मध्यपूर्व, अफ्रीका, मॉरीशस और यूरोप से आने वाले जहाजों के लिए औसतन इस कैनाल के जरिए सिर्फ 8 घंटे के समय में ही बचत हो पाएगी।
मौजूदा टैरिफ दरों को देखें तो अफ्रीका और यूरोप से आने वाले जहाजों को हर यात्रा पर करीब 4992 डॉलर का नुकसान होगा ही, क्योंकि समय में बचत की जो बात की जा रही है वह काफी कम है। दूसरे, इस कैनाल का इस्तेमाल करने वाले 65 फीसदी जहाज अफ्रीका और यूरोप के ही होंगे। इसके अलावा एक और बात भी अहम है कि अगर टैरिफ कम भी कर दिए जाएं कि हानि न हो तो प्रोजेक्ट का आईआरआर 2.6 फीसदी तक आ जाएगा और इस स्तर पर सरकार किसी सार्वजनिक प्रोजेक्ट को भी मंजूरी नहीं देती।
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