नेशनल एन्वायर्नमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी), नागपुर ने इस प्रोजेक्ट का पर्यावरण की दृष्टि से अध्ययन किया है। इसका कहना है कि इस प्रकार के किसी मैरीन प्रोजेक्ट का कोई इतिहास नहीं है। तमिलनाडु एन्वायर्नमेंट काउंसिल ने कहा है कि समुद्र में बड़े हिस्से में खुदाई से वहां के सूक्ष्मजीवीय जीवन पर काफी असर पड़ेगा।
काउंसिल से जुड़े एक ट्रस्ट के एल एंटनी सामी नीरी के इस विचार से असहमत हैं कि सूक्ष्मजीवों के नष्ट होने का उतना असर नहीं पड़ेगा क्योंकि इस खुदाई से निकला मलबा थोड़े से इलाके में दफन किया जाएगा। उनका कहना है कि ऐसा नहीं किया जा सकता कि समुद्र में एक हिस्से को एक अलग डिपार्टमेंट की तरह देखा जाए। इन आशंकाओं को केंद्रीय मंत्री टीआर बालू ने यह कहकर खारिज कर दिया कि कैनाल कोरल रीफ्स और आखिरी द्वीप से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर बनाई जाएगी। उनका कहना है कि इस क्षेत्र में कोई वैजीटेशन नहीं है, इसलिए कोई नुकसान की आशंका नहीं है।
विशेषज्ञ कहते हैं इस कैनाल के बनने से इस क्षेत्र के समुद्री जीवन पर सीधा असर पड़ने जा रहा है। पर्यावरणविद कहते हैं कि पाक जलडमरूमध्य और मन्नार की खाड़ी में समुद्र में खुदाई का मतलब है: - इस क्षेत्र की समुद्री पारिस्थितिकी में ही बदलाव लाना और इससे समुद्र के तापमान, खारेपन, खनिजों के बहाव में बदलाव होगा।- जहाजों से निकलने वाला तेल और दूसरा समुद्री प्रदूषण तटों तक पहुंचेगा और खासकर मन्नार की खाड़ी की संवेदनशील समुद्री पारिस्थितिकी इससे खतरे में पड़ जाएगी।- ज्वार और ज्यादा ताकतवर लहरें उठेंगी और इससे तटीय इलाकों में कटाव शुरू हो जाएगा।
पर्यावरण विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि समुद्र में खुदाई से सीबैड के नीचे मौजूद टॉक्सिन्स भी ऊपर आ जाएंगे और कोरल्स घुटकर मर जाएंगे। इसके अलावा जहाजों से निकलने वाले पानी से कुछ समुद्री प्रजातियां तो इस पारिस्थितिकी को ही छोड़कर चली जाएंगी।
गौरतलब है कि मन्नार की खाड़ी में करीब 3600 जंतुओं और पौधों की प्रजातियां हैं और इसे भारत भर का सबसे ज्यादा समृद्ध तटीय इलाका माना जाता है। स्पर्म व्हेल्स, डॉल्फिन्स और डुगॉन्ग्स जैसी स्तनधारी भी इसी इलाके में पाए जाते हैं। खासतौर पर मन्नार की खाड़ी को अपने कोरल्स की प्रजातियों के लिए जाना जाता है। यहां 37 वंशों की 117 प्रजातियों के कोरल मौजूद हैं। इसके अलावा इनसे जुड़ी ढेर सारी मछलियों और क्रस्टेशियन्स भी हैं। श्रीलंका की ओर का समुद्री क्षेत्र और भी समृद्ध है।
कलपीतिया के पास बार रीफ क्षेत्र में अकेले कोरल्स की 156 प्रजातियां और 283 मछलियों की प्रजातियां थीं। इसके अलावा मन्नार और जाफना में दो और कोरल रीफ सिस्टम हैं। इंडियन चांक, सी कुकुम्बर और सीपियों का भंडार भी इस इलाके में मौजूद है। हालांकि मन्नार के दक्षिण में मौजूद पर्ल फिशरीज ने जॉर्ज बिजे के ओपेरा ले पेश्यूर्स डे पल्र्स की प्रेरणा दी थी, अब उतने समृद्ध नहीं रह गए हैं, जितने पहले थे। इसका कारण इस इलाके में मछलियों का बेहद शिकार और उनकी हैबिटेट में बदलाव रहा है।
इन तमाम पर्यावरणीय सवालों को भारत सरकार के मंत्रालयों ने यह कहकर खारिज कर दिया है कि ये फिजूल में उठाए जा रहे डर हैं। सरकारी दावों के बावजूद जिन्होंने पर्यावरण के मुद्दों को उठाया है, उनका कहना है कि भारत सरकार ने जिस संस्था से इस प्रोजेक्ट का अध्ययन कराया है, उसे इस प्रकार के प्रोजेक्ट्स संभालने का अनुभव नहीं है। साथ ही इस प्रोजेक्ट को लेकर पूरी तरह न तो सर्वे ही हुआ है और न ही इसके परिणामों को लेकर कोई वैज्ञानिक आधार ही सरकार के पास है।
श्रीलंका में इस प्रोजेक्ट के पर्यावरण से जुड़े पक्षों पर विचार के बाद भारत सरकार ने इस पर सोचना शुरू किया है लेकिन इसकी मंजूरी तो सरकार इससे भी पहले दे चुकी है। इस बारे में श्रीलंका के नेशनल एक्वेटिक रिसोर्सेज रिसर्च एंड डवलपमेंट एजेंसी (नारा) का कहना है कि इस प्रोजेक्ट की वजह से बंगाल की खाड़ी से मन्नार की खाड़ी की तरफ पानी का बहाव बढ़ेगा और इससे खाड़ी का इकोसिस्टम तो गड़बड़ाएगा ही, जमीन पर पानी का संतुलन भी बिगड़ जाएगा।