HomeSpotlightSahir Ludhianvi A tribute to Sahir Ludhianvi
 
साहिर के मायने हैं जादूगर और वाक़ई साहिर लुधियानवी को न सिर्फ़ अलफ़ाज़ बल्कि अलफ़ाज़ और ख़याल का जादूगर कहा जाना चाहिए। अपने वक़्त की शायरी में सबसे ऊपर के मुक़ाम पर साहिर का हक़ था और आने वाले कई दौर उनका नाम ज़रूरी तौर पर शुमार करेंगे। हर फ़िक़्र को धुएं में उड़ाने वाले इस फ़नक़ार ने ‘कभी-कभी’ ‘उम्मीद’ का दामन थामे रखा तो ‘कभी-कभी’ सोचा कि ‘मुहब्बत से किनारा कर लूं’ और इस गुस्से की ज़द में ‘ताजमहल’ तक आ गया लेकिन पुरज़ोर और बामानी अलफ़ाज़ के साथ। 25 अक्टूबर 1980 को नहीं रहे साहिर..इस एक बहाने से ही उन्हें दोहरा लेते हैं वरना तो साहिर उन शख्सियतों में से हैं जिन्हें भुलाया जाना मुमक़िन नहीं है, एक पल के लिए भी नहीं..
मैं पल दो पल का शायर हूं साहिर की 10 जादुई नज़्में
साहिर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। ‘पल दो पल’ के इस शायर ने साहित्य और फ़िल्म की दुनिया के आक़ाश में एक ऐसी चमक क़ायम कर दी जो सदियों तक आबाद रहेगी। साहिर एक क्रांतिकारी शायर थे। इसकी पूरी झलक इनके ग़ीतों और शायरी में नजर आती है। जो ज़िंदग़ी पे गुज़री उसे शब्दों में ढालते गए।
प्रारंभिक जीवन
लाहौर में अमृता से मुलाकात
पहली किताब
फ़िल्मों में साहिर
साहिर का व्यक्तित्व
अकेला बहुत देर चलता रहा
साहिर के दस गाने
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संयोजन : भवेश दिलशाद एवं नीरज कुमार