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खूबसूरत मोड़

मुंबई. इस नज़्म के खयाल की खूबसूरती की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है। ऐसे ख़याल एक दौर में एकाध दफा ही आते हैं और इतनी शिद्दत के साथ बेहतरीन अलफ़ाज़ में सिर्फ़ एक बार ही उतर पाते हैं। मैं बार-बार यह नज़्म पढ़ता हूं और हर बार इस सवाल पर नए सिरे से सोचने लगता हूं कि क्या वाक़ई ‘फिर से अजनबी’ हो पाना मुमकिन है। मानने लगा हूं कि हां, यह मुमकिन है।

इस पर बहस की जा सकती है और बड़े ही बेहतरीन तरीके से लेकिन यहां मुनासिब नहीं। जो कुछ बातें हैं, उनमें एक तो यह कि पूरी तरह से मन पर निर्भर करता है और अगर मन चंचल न हो तो यह मुमक़िन है, दूसरे यह कि कुछ रिश्ते अगर सलीके से टूट जाएं या एक अदब के साथ छोड़ दिए जाएं तो मुमक़िन है कि व़क्त रहते यादें मिट जाएं और तीसरे चूंकि यह ख़याल बेतरह हायपोथैटिकल है इसलिए वाक़यात का सहारा लिया जाए तो याददाश्त जाने पर भी यह मुमकिन है।

असल चीज़ यह है कि किन हालात में यह ख़याल आता है, उन हालात की उलझनें तो समझी जा सकती हैं लेकिन उन लमहों की खूबसूरती को समझने के लिए थोड़ा सा वक्त निकालना ज़रूरी है इसलिए इस बेशक़ीमती नज़्म के लिए व़क्त दीजिए..

नज़्म
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रक्खूं दिलनवाज़ी की
न तुम मेरी तरफ देखो गलतअंदाज़ नज़रों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों में
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से..

तआर्रुफ रोग हो जाए तो उसको भूलना बेहतर
तआल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमक़िन
उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा..

(फिल्मी गीत में एक अंतरा और शामिल किया गया है)
तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशक़दमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराये हैं
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं..





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