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Sahir Ludhiyanvi Sahir Ludhiyanvi मुंबई. देह व्यापार के विषय पर हिंदी-उर्दू साहित्य का बेमिसाल और नायाब नगीना है यह नज़्म। औरत की मजबूरी, इज़्ज़त और हालात पर उस दौर को एक निगाह अदा करने के लिए और औरत की कीमत को अनमोल करार देने के लिए यह नज़्म हर दौर को महफ़ूज़ रखना होगी क्योंकि इसमें जो तस्वीर खींची गई है, उससे एक चित्रकार उस दौर के शहरों में होने वाले कोठों और चकलों का पूरा चित्र बना सकता है, एक फिल्मकार बिल्कुल सटीक सैट खड़ा कर सकता है और उस दौर से नावाक़िफ़ कोई भी शख़्स उस घिनौनी, ख़ौफ़नाक़ और नंगी सच्चई को उसी नफ़रत के साथ महसूस कर सकता है।
‘मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी, यशोदा की हमजिंस राधा की बेटी.’ इन पंक्तियों में स्त्री के दर्जे को वही ऊंचाई दी गई है जो धर्म-शास्त्रों में वर्णित है और उसी लय में मजबूरी, दर्द और हालात का सटीक ब्यौरा भी दे दिया गया है।
मूल नज़्म में साहिर ने लिखा है ‘सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं’, गुरुदत्त ने जब इस नज़्म को अपनी फिल्म प्यासा में लिया तो साहिर ने इस पंक्ति को बदलकर ‘जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं’ इस तरह लिखा। माना जाता है कि प्यासा फिल्म साहिर की शुरुआती ज़िंदगी के कई पहलुओं पर आधारित है और गुरुदत्त का निभाया विजय का चरित्र असल में साहिर ही हैं। यह सच इसलिए भी हो सकता है क्योंकि गुरुदत्त और साहिर काफी अच्छे दोस्त रहे हैं। प्यासा में एक नज़्म और है ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?..’ वह नज़्म भी इसी स्तर पर कमाल का हुनर और असर रखती है।
नज़्म
ये कूचे ये नीलामघर दिलक़शी के
ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के
कहां हैं कहां हैं मुहाफ़िज़ ख़ुदी के
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..
ये पुरपेंच गलियां ये बेख़्वाब बाज़ार
ये गुमनाम राही ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे ये सौदों पे तकरार
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..
तअफ्फुन से पुरनीम रौशन ये गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियां
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..
वो उजले दरीचों में पायल की छनछन
तऩफ्फ़ुस की उलझन पे तबले की धनधन
ये बेरूह कमरों में खांसी की धनधन
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..
ये गूंजे हुए कहकहे रास्तों पर
ये चारों तरफ भीड़ सी खिड़कियों पर
ये आवाज़ें खिंचते हुए आंचलों पर
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..
ये फूलों के गजरे ये पीकों के छींटे
ये बेबाक़ नज़रें ये गुस्ताख़ फ़िक़रे
ये ढलके बदन और ये मदक़ूक़ चेहरे
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..
ये भूखी निगाहें हसीनों की जानिब
ये बढ़ते हुए हाथ सीनों की जानिब
लपकते हुए पांव ज़ीनों की जानिब
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..
यहां पीर भी आ चुके हैं जवां भी
तनूमंद बेटे भी अब्बा मियां भी
ये बीवी भी है और बहन भी है मां भी
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..
मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हमजिंस राधा की बेटी
पयंबर की उम्मत ज़ुलेख़ा की बेटी
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..
ज़रा मुल्क़ के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ को लाओ
सना-ख़्वाने-तक़दीसे-मशरिक़ कहां हैं..