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ख़ुदा-ए-बरतर

मुंबई. साहिर ने हिंदोस्तान का बंटवारा देखा था, पूरे होशो-हवास में। उस हौलनाक़ मंज़र के बाद उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच दो युद्ध भी देखे। जंग के पीछे के सच और उसकी हकीकत से साहिर वाक़िफ़ थे। एक शायर के बतौर उन्होंने इस नज़्म में कुछ सवाल उठाए हैं जो वाक़ई काबिले-गौर हैं।

‘दिलों के गुलशन उजड़ न जाएं मुहब्बतों की पनाह देना..’ यह दुआ हर दौर के लिए जरूरी है और यही पैग़ाम है जिससे बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया जिंदगी का नग़मा गा सकती है। साहिर ने जंग की तल्ख़ियों पर कुछ नज़्में, नग़मे और भी लिखे हैं, उनमें से एक नज़्म की कुछ पंक्तियां यूं हैं ‘जंग तो खुद ही एक मसला है. जंग क्या मसलों का हल देगी. ख़ून और आग आज बख़्शेगी. भूख और एहतियाज कल देगी. इसलिए ऐ शरीफ़ इंसानों जंग टलती रहे तो बेहतर है. आप और हम सभी के आंगन में शमां जलती रहे तो बेहतर है.’ या एक और नज़्म की एक और पंक्ति ‘ज़मीन खा गई आस्मां कैसे-कैसे’। कुल मिलाकर साहिर का संदेश यही था कि ज़मीन को मां समझकर मुहब्बत किए जाने की ज़रूरत है, उसे जंग की वजह बनाने की नहीं।

इस खूबसूरत नज़्म को 1963 की फिल्म ताजमहल में लता मंगेशकर ने स्वर दिया और इसकी धुन बनाई रौशन ने, इस सार्थक नज़्म पर दो घड़ी अगर सभी गौर कर लें तो शायद जंग का हल निकल सके..

नज़्म
ख़ुदा-ए-बरतर तेरी ज़मीन पर ज़मीन की खातिर ये जंग क्यूं है
हर इक फ़त्हो-ज़फ़र के दामन पे ख़ूने-इंसान का रंग क्यूं है..

ज़मीन भी तेरी हैं हम भी तेरे ये मिल्क़ियत का सवाल क्या है
ये क़त्लो-ख़ून का रिवाज़ क्यूं है ये रस्मे-जंगो-जदाल क्या है
जिन्हें तलब है जहां भर की उन्हीं का दिल इतना तंग क्यूं है..

गरीब माओं शरीफ बहनों का अम्नो-इज़्ज़त की ज़िंदगी दे
जिन्हें अता की है तूने ताकत उन्हें हिदायत की रौशनी दे
सरों में क़िब्रो-गुरूर क्यूं है दिलों के शीशे पे ज़ंग क्यूं है..

क़ज़ा के रस्ते पे जानेवालों को बच के आने की राह देना
दिलों के गुलशन उजड़ न जाएं मुहब्बतों को पनाह देना
जहां में जश्ने-वफ़ा के बदले ये जश्ने-तीरो-तुफ़ंग क्यूं है
ख़ुदा-ए-बरतर तेरी ज़मीन पर ज़मीन की खातिर ये जंग क्यूं है..





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