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सोचता हूं..

मुंबई. भारतीय दर्शन और साहित्य में प्रेम का स्थान बहुत ऊंचा रहा है। इसे भक्ति और राष्ट्र से जोड़कर बुलंदियां दी गई हैं। यानी प्रेम न सिर्फ दो इंसानों के बल्कि मानवता, देश, इंसानों और ईश्वर से जुड़ने का रास्ता रहा है लेकिन इसकी शुद्धता और पवित्रता की शर्त जरूरी है। साहिर की इस नज़्म के लिए इससे बेहतर भूमिका लिखी जा सकती है लेकिन ज़रूरी यही है कि पहले मुहब्बत के मायनों को समझ लिया जाए। इस नज़्म में जो गुस्सा साहिर ने मुहब्बत पर उतारा है उसे समझने के लिए यही समझ, यही तमीज़ लाज़मी है।

यथार्थ में, बदलते दौरों में सच्चे प्रेम और प्रेमियों पर हुए ज़ुल्मों, मुहब्बत के बदलते अर्थो और चरित्र में आती गिरावट के ख़िलाफ़ यह पूरी नाराज़गी एक नज़्म की श़क्ल में साहिर ने भाषाई कमाल के साथ अर्ज़ की है। इस पूरी नज़्म का मूल सवाल या लहजा यूं है कि मुहब्बत से नफरत करके क्या जिया जा सकता है? क्या ऐसा मुमक़िन है? या यूं कहें कि मुहब्बत से मुहब्बत करना ही जीवन का आधार है।

नज़्म
सोचता हूं कि मुहब्बत से किनारा कर लूं
दिल को बेगाना-ए-तरग़ीबो-तमन्ना कर लूं

सोचता हूं कि मुहब्बत है जुनूं-ए-रुसवा
चंद बेकार से बेहूदा ख़्यालों का हुजूम
एक आज़ाद को पाबंद बनाने की हवस
एक बेगाने को अपनाने का सई-ए-मौहूम

सोचता हूं कि मुहब्बत है सुरूरे-मस्ती
इसकी तनवीर में रौशन फ़ज़ा-ए-हस्ती

सोचता हूं कि मुहब्बत है बशर की फ़ितरत
इसका मिट जाना मिटा देना बहुत मुश्किल है
सोचता हूं कि मुहब्बत से है ताबिंदा हयात
आप ये शमां बुझा देना बहुत मुश्किल है

सोचता हूं कि मुहब्बत पे कड़ी शर्ते हैं
इक तमद्दुन में मसर्रत पे बड़ी शर्ते हैं

सोचता हूं कि मुहब्बत है इक अफसुर्दा सी लाश
चादरे-इज़्ज़तो-नामूस में कफ़नाई हुई
दौरे-सरमाया की रौंदी हुई रुसवा हस्ती
दरगहे-मजहबो-इख़लाक़ से ठुकराई हुई

सोचता हूं कि बशर और मुहब्बत का जुनूं
ऐसे बोसीदा तमद्दुन से है इक कारे-ज़बूं

सोचता हूं कि मुहब्बत न बचेगी ज़िंदा
पेश-अज़-व़क्त की सड़ जाए ये गलती हुई लाश
यही बेहतर है कि बेगाना-ए-उल्फ़त होकर
अपने सीने में करूं जज़्ब-ए-नफ़रत की तलाश..
सोचता हूं कि मुहब्बत से किनारा कर लूंदिल को बेगाना-ए-तरग़ीबो-तमन्ना कर लूं





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