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Sahir Ludhiyanvi Sahir Ludhiyanvi मुंबई. साहिर की यह नज़्म कलाकार की जिंदगी का सच है, कम से कम उस दौर का बयान तो है ही, तब शायरी करना के मतलब था कि आपने अपने लिए एक कठिन और मुफ़लिसी की ज़िंदगी चुन ली है। शायरी कौड़ियों के दाम बिकती थी। मुट्ठी भर शोहरत के लिए मुट्ठी भर चनों-मूंगफलियों पर दिन कटते थे और ख़ुद्दारी शायरों को विरासत में मिला करती है तो सौदा-सुल्फ़ करना मतलब शायरी के साथ बेईमानी करना था।
क़द्रदान कम थे और फिर कीमत अदा करने वाले तो किस्मत से मिला करते थे। हालात आज भी बहुत नहीं बदले हैं, पहले भी राजनीति, गुटबाजी हावी थी, आज भी है, पहले भी शायरी के साथ भूख मिटाने के लिए कुछ और करना होता था, आज भी हालत यही है। इस पहलू को उस दौर के कई शायरों और उसके बाद के शायरों ने अपने-अपने तरीके से दर्ज किया है लेकिन साहिर के यहां इस सच्चई को पूरी सच्चई और ईमानदारी के साथ उकेरा गया है।
नज़्म
मैंने जो गीत तेरे प्यार की खातिर लिखे
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूं..
आज दुकान पे नीलाम उठेगा उनका
तूने जिन गीतों पे रखी थी मुहब्बत की असास
आज चांदी की तराजू में तुलेगी हर चीज
मेरे अफ़क़ार मेरी शायरी मेरा एहसास
जो तेरी ज़ात से मंसूब थे उन गीतों को
मुफ़लिसी जिंस बनाने पे उतर आई है
भूख तेरे रुखे-रंगीं के फ़सानों के एवज
चंद आशिया-ए-ज़रूरत की तमन्नाई है
देख इस अरसागहे-मेहनतो-सरमाया में
मेरे नग़मे भी मेरे पास नहीं रह सकते
तेरे जलवे किसी ज़रदार की मीरास सही
तेरे ख़ाक़े भी मेरे पास नहीं रह सकते
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूं
मैंने जो गीत तेरे प्यार की खातिर लिखे..