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Year End 2007 Year End 2007 मुंबई.
केएन गोविंदाचार्य वर्ष 2007 को राजनैतिक दृष्टि से बेहद उथल-पुथल से भरा साल मानते हैं। उनका कहना है कि यह वर्ष मतदाताओं की चुप्पी और समझदारी का रहा जिसके अप्रत्याशित परिणाम भी सामने आए। उनका मानना है कि आम आदमी के हक और हित को सुरक्षित रख पाने में हम असफल रहे हैं। इसके साथ ही नए साल में आतंकवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद को वे बहुत बड़ी चुनौती मानते हैं। प्रस्तुत है भास्कर डॉट कॉम संवाददाता नीरज कुमार के साथ हुई गोविंदाचार्य की खास बातचीत:
वर्ष 2007 को राजनीतिक दृष्टिकोण से कितना महत्वपूर्ण मानते हैं।
राजनैतिक दृष्टि से भरपूर उथल-पुथल और उलट-पुलटवाला रहा । सामान्य लोगों ने कल्पना नहीं की थी कि बसपा को उत्तर प्रदेश में बहुमत मिलेगा और गुजरात में भाजपा इतने बहुमत से जीतेगी। वर्ष 2007 मतदाताओं की चुप्पी और समझदारी का रहा। दूसरी तरफ सभी सरकारों ने अपने वर्चस्व को प्रमुखता दी न कि जनहित को। इस एक वर्ष में प्रदेशों में और केंद्र में जो आर्थिक नीति और योजनाएं सामने लाईं गईं वे सभी अमीर-परस्त रही हैं इसके साथ ही गरीब विरोधी और प्रकृति विरोधी भी रही हैं। चाहे वो सेज का विषय हो या खुदरा बाजार में बड़ी पूंजी निवेश का विषय या किसानों के भूमि-अधिग्रहण का विषय हो। राजनैतिक अनैतिकता और सत्ता-लोलुपता का उत्कृष्ट उदाहरण कर्नाटक में प्रस्तुत हुआ। उसी प्रकार सभी राष्ट्रीय दलों का दोहरा रुख सामने आया है, चाहे वह परमाणु करार का सवाल हो या नंदीग्राम का। इस र्व में वामपंथियों का विकृत रुपांतरण भी सिंगुर और नंदीग्राम के रूप में जनता के समक्ष उजागर हुआ।
वर्ष 2007 में हम कहां चूके, कुछ खास मोर्चे जहां हम असफल रहे।
ऐसे कई मोर्चे रहे जहां हम असफल रहे। कुछ खास बातों की ओर मैं ध्यान दिलाना चाहूंगा। सबसे पहले तो किसानों की आत्महत्या रोकने में असफल रहे। बेरोजगारी की वृद्धि-दर नहीं रोकी जा सकी। गरीबों और अमीरों की आमदनी में 90 लाख गुना के फर्क को कम नहीं किया जा सका। मीडिया पर बाजार की पकड़ को ढीला नहीं किया जा सका है। इसके साथ ही आम आदमी के हक और हित को सुरक्षित नहीं रखा जा सका।
नए वर्ष में कौन-कौन सी चुनौतियां देश के सामने होंगी?
फिर से आतंकवाद का उभार देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी। इसके साथ ही दिशाहीन राजनीति के कारण जातिवाद और क्षेत्रवाद का खतरा। संवेदहीन सत्ता और आर्थिक गैर-बराबरी के परिणामस्वरूप हिंसक आंदोलनों की बढ़ोत्तरी आने वाले समय की मुख्य चुनौतियां होंगी।
पिछले साल की सबसे खास घटना जिसका जिक्र करना चाहेंगे।
मेरी समझ से सबसे मुख्य घटना रही 25 हजार आदिवासियों द्वारा जमीन के अधिकार को लेकर ग्वालियर से नई दिल्ली की पदयात्रा। यह पदयात्रा 28 दिनों तक चली थी।
गुजरात चुनाव पर कुछ टिप्पणी करना चाहेंगे।
गुजरात सर्वाधिक शहरीकृत प्रदेश है और वहां चुनाव की बिसात विकास के मुद्दे पर बिछी थी, मगर कांग्रेस और भाजपा का अभियान उस पर कायम नहीं रह सका। सोनिया जी ने मौत का सौदागर को हवा दी तो नरेंद्र मोदी ने सोहराबुद्दीन मुद्दे का सर ऊंचा किया। नरेंद्र मोदी का छवि प्रबंधन सोनिया जी के मुकाबले काफी बेहतर रहा। विकास की बिसात से शुरू होकर यह चुनाव धीरे-धीरे छवियुद्ध की शक्ल लेता गया। मुद्दे भी पीछे छूटे और पार्टियां भी पीछे छूट गईं। नरेंद्र मोदी की छवि सोनिया गांधी पर भारी पड़ी।
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