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Year End 2007 Year End 2007 2007 : साहित्य, कला-संस्कृति
कामना है नया साल आपके लिए अमन, चैन और ख़ुशियों से भरा हो। लेकिन इससे पहले Êारूरी है कि हम गुÊारे वर्ष के पन्ने पलट कर देखें और उनसे कुछ सीख-सबक लें..। आइए, देखते हैं साहित्य, कला-संस्कृति और अन्य क्षेत्रों से जुड़ी देश की ख्यात हस्तियों और विचारकों की नÊार में कैसा रहा यह साल..
दिशाहीन वर्ष
विष्णु खरे, वरिष्ठ कवि एवं आलोचक
जिस तरह वर्ष 2007 का अंत हुआ है, वह न केवल डरावना, बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण है। यह राजनीति के लिए शुभ नहीं है। स्पेशल इकोनॉमिक्स जोन का जो प्रकोप देखने में आया, वह भी कम अफसोसनाक नहीं है। एक तरफ कांग्रेसी गलती कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ मार्क्सवादी। एक प्रकार से पिछला वर्ष राजनीतिक दिशाहीनता के लिए याद किया जाएगा। वर्ष 2007 में हमने बहुत कुछ खोया- पहले कमलेश्वर गए, फिर त्रिलोचन शास्त्री। कमलेश्वर तो काफी सक्रिय थे, उनसे पांच-दस साल और जीने की उम्मीद कर सकते थे, लेकिन त्रिलोचन बहुत कष्टमय स्थिति में विदा हुए। जिस ढंग से उनकी मृत्यु हुई, वह दुखी करता है। त्रिलोचन की दर्दनाक मौत से यह महसूस होता है कि यदि हिंदी का साहित्यकार सत्ता के गलियारे के आसपास नहीं है, उसका अंत दुखद ही समझो।
पिछले वर्ष कुछ साहित्यकारों के बीच अशोभनीय व्यवहार भी हुए हैं, जिससे मनोमालिन्य बढ़ा है। लेखक ही सोचें कि वे ऐसा क्यों लिखते हैं, जिससे यह स्थिति पैदा होती है। मुझे नहीं लगता कि वर्ष 2007 किसी उल्लेखनीय कृति के लिए याद किया जाएगा। न उपन्यास, न कहानी संग्रह और न कोई कविता संग्रह, जिसे बहुत महत्वपूर्ण कहा जा सके।
हम पत्रिकाओं के विशेषांकों के सहारे जिएं या किताबों के, कुछ कहा नहीं जाता। युवा विशेषांक भी निकले, लेकिन आशा के अनुरूप नहीं। पांच वर्ष भी नहीं बीते और युवा विशेषांकों की होड़ मच गई। मुकाबला हो रहा है, लेकिन आलोचना लगभग नदारद है। रीडरशिप नहीं बन रही है। हिंदी का स्तर घट रहा है। उसकी अवमानना हो रही है। सरकार से लेकर चैनल तक सब हिंदी का मजाक उड़ा रहे हैं।
हिंदी को पढ़ने वालों की संख्या ४२ करोड़ बताई जाती है। हिंदी की कोई भी ऐसी पुस्तक नहीं, जिसकी बिक्री करोड़ों में हुई हो। यहां तक कि प्रेमचंद के उपन्यास भी करोड़ की संख्या में नहीं बिकते। ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान का मध्यवर्ग कलाओं के साथ उपेक्षा भाव अपनाए हुए है। हिंदी का लेखक भूखों मरने के लिए अभिशप्त है। प्रकाशक करोड़पति हो रहे हैं। राजधानी की साहित्यिक बिरादरी मुर्दार है। उसे पुरस्कार, फैलोशिप और तरह-तरह के सम्मान चाहिए, लेकिन साहित्य और अच्छे साहित्य के लिए वह कतई प्रतिबद्ध नहीं हैं।
2007 की पस्ती
ज्ञानरंजन, प्रख्यात साहित्यकार
इस वर्ष हिंसक और मूर्ख होने का मूल्य बढ़ा है। मेरी स्वयं की भाषा दर्शन और ज्योतिषपूर्ण वाक्यों में ढल रही है। इसे 2007 की पस्ती ही कह सकते हैं।
शिकंजा कसता रहा
-विश्वनाथ त्रिपाठी, वरिष्ठ साहित्यकार
राजनीति की दृष्टि से वर्ष 2007 अच्छा नहीं रहा। धर्मनिरपेक्ष ताकतों और वाम शक्तियों के लिए यह पराभव का वर्ष रहा। इस वर्ष अमेरिकी साम्राज्यवाद का शिकंजा कसा है। सांस्कृतिक सत्व क्षीण हुआ है। स्वदेशी भावनाएं स्खलित हुई हैं। सारा तामझाम एक आडंबर में तब्दील हो गया है। दुखद यह नहीं कि आर्थिक कारणों की वजह से परिवार टूट रहे हैं, दुखद यह है कि उच्छृंखलता के कारण परिवार टूट रहे हैं। २क्क्७ में शायद यह Ê़यादा हुआ है, इसलिए कि कोई भी फिल्म, कोई सीरियल ऐसा नहीं, जिसमें हिंसा का नंगा नाच न हुआ हो। सांस्कृतिक पराभव के लिए यह वर्ष विशेषरूप से जाना जाएगा।
ख़तरे का संकेत
-मैनेजर पांडेय, वरिष्ठ आलोचक
तसलीमा नसरीन और एम.एफ. हुसैन के सामने जो सवाल हैं, वे कलाकारों और लेखकों के लिए खतरे के संकेत देते हैं। बांग्लादेश के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के संदर्भ में भी यह कहना उचित है कि कट्टरपंथियों की वजह से तसलीमा और एम.एफ. हुसैन कहीं सुरक्षित नहीं हैं। कट्टरपंथियों के समक्ष साहित्य और संस्कृति का झुकना और सी.पी.एम. के शासन में किसानों की Êामीन छीनना और फिर उन पर अत्याचार करना-वर्ष २क्क्७ की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हैं।
नुकसान ही नुकसान
-पद्मा सचदेव, सुप्रसिद्ध डोगरी कवयित्री
पिछले वर्ष मैंने यह भी देखा कि हमारी संस्कृति का बहुत अधिक ह्रास हुआ है। नई पीढ़ी रसातल को जा रही है। देश में बलात्कार, हिंसा और लूट की घटनाएं बढ़ी हैं। सन् 2007 में हमने बहुत कुछ खोया-कमलेश्वर भाई गए, त्रिलोचन गए और तेजी बच्चन भी गईं। वर्ष २क्क्७ में नुकसान ही नुकसान हुआ-फायदा क्या हुआ-इस देश को कुछ पता नहीं।
युवाशक्ति का वषर्
-चित्रा मुद्गल, सुप्रसिद्ध कथा लेखिका
न्यूक्लीयर डील भूत की तरह हमारे पीछे लगा रहा, मगर वामपंथियों ने सरकार की एक न चलने दी। हालांकि युवापीढ़ी नए उत्साह से लबरेज नÊार आई। मल्टीनेशनल कंपनियों ने जैसे उनके लिए विजय के द्वार खोल दिए। दस-दस लाख रुपए की तनख्वाह, मगर यह भी देखने में आया कि ये कंपनियां लड़कियों के लिए ड्रेसकोड निश्चित कर रही हैं। उन्हें पश्चिमी सभ्यता में ढाला जा रहा है, जिससे भारतीय जीवनशैली और संस्कृति प्रभावित हो रही है। वर्ष 2007 में अच्छी फिल्में देखने को मिलीं। ‘रंग दे बसंती’ और ‘चक दे इंडिया’ जैसी फिल्मों ने युवावर्ग की ऊर्जा को अभिव्यक्ति दी। क्रिकेट में धोनी का धमाल भी ठीक रहा।
अंधकारपूर्ण
-मंगलेश डबराल, सुपरिचित कवि
2007 तकलीफों भरा वर्ष रहा। वर्ष के अंत में गुजरात के चुनावों ने बहुत निराशा पैदा की। नंदीग्राम की घटना वर्ष की दूसरी ऐसी घटना है, जिसने सी.पी.एम. को कलंकित किया है। इस घटना को रोका जा सकता था। यदि सी.पी.एम. के पास इस घटना को रोकने की कोई ताकत नहीं थी, तो इसे दुभाग्र्यपूर्ण ही कहा जाएगा।
अनिश्चितताओं भरा साल
-जोगिन्दर सिंह, पूर्व निदेशक, सी.बी.आई.
वर्ष 2007 में जो सबसे बड़ी चिंता उभरकर सामने आई है, वह यह है कि पढ़े-लिखे लोग अपराध की दुनिया में उतर आए हैं। यह धारणा भी बेकार होती जा रही है कि ज्यादा पढ़ा-लिखा आदमी सभ्य और संस्कारवान बनता है। कोई किसी से भय नहीं खा रहा। कानून एकदम ठंडा पड़ गया है। यदि अपराध करने वाले को फटाफट सजा मिलने लगे, तो शायद अपराध कम होने लगें।
अवहेलना हुई
-कैलाश वाजपेयी, वरिष्ठ कवि एवं स्तंभकार
2007 में यह भी देखने में आया कि जो संस्कृतिकर्मी, लेखक और साहित्यकार हैं, उनका कहीं कोई सम्मान नहीं है। देश का शासक कोई भी रहा हो, लेकिन बुद्धिजीवियों, लेखकों और साहित्यकारों का हमेशा सम्मान होता आया है। 2007 में इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया ने सूक्ष्म मानसिक प्रदूषण भी फैलाया है। जीवन को स्वच्छंद रहने के लिए उकसाता है, जिसका नई पीढ़ी पर बुरा असर पड़ रहा है। छिछोरे लोगों को आइकॉन बनाया जा रहा है। लोग सिर्फ धन के लिए काम कर रहे हैं, आदर्श के लिए नहीं।
काफी कठिन वर्ष
-ममता कालिया, सुप्रसिद्ध कथा लेखिका
हिंदुस्तान में कोई भी वर्ष घटना-विहीन नहीं होता। बीते वर्ष में राजनीतिक समीकरण बने, मगर कामयाबी नहीं मिली। ऐसा लगता है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इस देश की जनता की नब्Êा को नहीं पहचानती। देश की जनता भी इस देश का ताज किसी एक राजनीतिक पाटी्र्र को नहीं सौंपना चाहती। यानी जनता प्रबुद्ध है, पर वह यह नहीं जानती कि इससे अस्थिरता खत्म नहीं होती। यह सबसे कठिन समय रहा इस देश के सामने, जहां महंगाई बढ़ी, लोगों की असुरक्षा बढ़ी और कोई कदम नहीं उठाए गए।
एक वर्ग ऐसा भी है, जो मजे की जिंदगी जी रहा है और देश का एक-तिहाई वर्ग स्थितियों से बुरी तरह जूझ रहा है, वक्त की दौड़ में पिछड़ रहा है। उसे लगता है जैसे उसे चूहा बना दिया गया है, इसलिए हताशा बढ़ी और अपराध भी बढ़े हैं। इस कठिन समय में साहित्य लेखन भी मुठभेड़ के मूड में नहीं दिखाई देता। सब ‘जादुई यथार्थ’ के पीछे पड़े हैं। साहित्य में न आम जनता की आवाज सुनाई देती है, न समाज तथा परिवार की दिक्कतों व चिंताओं का उल्लेख किया जाता है।
जाने कई नाम
-अनुपम मिश्र, सुप्रसिद्ध गांधीवादी, पर्यावरणविद्
2007 में कई नए नाम हमने सीख लिए हैं। अब तक पश्चिम बंगाल को भी पता नहीं था कि नंदीग्राम और सिंगुर कहां पर हैं- इस साल इसकी जानकारी सभी को हो गई, लेकिन इस पाठ के लिए समाज ने भारी कीमत चुकाई है। इस वर्ष मध्य प्रदेश में नर्मदा पर बने विकास के नए बांधों ने लाखों लोगों के सामने धाराजी तीर्थक्षेत्र, ओंकारेश्वर और महेश्वर के घाटों को लगभग पूरी तरह डुबो दिया है, लेकिन आंखों से न दिखने वाला रामसेतु बचाना इस वर्ष में बहुत जरूरी हो गया है। जलवायु परिवर्तन का भयानक खतरा, इसी साल सामने आया है।