अपराधी कौन है और क्यों?

 
Source: पुष्पेश पंत     Designation: प्राध्यापक
 
 
 
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http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100179_thumb.jpeg देश की राजधानी में 'एक और जघन्य बलात्कार' ने सभी को दहला दिया है। जिस तरह इस वहशी हरकत को अंजाम दिया गया, उससे उत्तेजित नागरिक यह मांग कर रहे हैं कि कानून में जल्दी से जल्दी संशोधन कर अपराधियों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए और इसके साथ एक बेहद उलझी, पर जायज बहस गरम हो रही है। सबसे पहली जरूरत इस घटना का विश्लेषण दलगत राजनीति की पक्षधरता से मुक्त होकर करने की है, पर इसका मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि इस प्रकरण पर कोई भी चर्चा राजनीति से इतर रह सकती है।
यह सवाल जाने कितनी बार पूछा जा चुका है कि क्यों महिलाओं से बलात्कार की वारदातें इतनी तेजी से बढ़ रही हैं और क्यों सरकार इसे रोक नहीं पा रही? हर बार उत्तर की तलाश उन बड़ी समाजशास्त्रीय बहसों में भटक जाती है, जो धूर्तता ही कही जानी चाहिए। बलात्कारी ऐसा घिनौना काम क्यों करता है? क्या वह सामान्य मनुष्य नहीं होता- यौन विकृति से पीडि़त, सहानुभूति तथा उपचार का पात्र मानसिक रोगी समझा जाना चाहिए? या वह वंचित-शोषित-उत्पीडि़त तबके का ऐसा सदस्य होता है, जिसका व्यवस्था के आगे नपुंसक आक्रोश मौका पाते ही अपने से कमजोर महिला या बच्ची के साथ बलात्कार से ही अपने पौरुष को सार्थक/प्रमाणित कर सकता है? यह सुझाने वालों की भी कमी नहीं रही है कि हमारा समाज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, जिसमें पारंपरिक सामाजिक मूल्य अक्षत नहीं रह सकते। गांव और शहर, परंपरा एवं आधुनिकता के बीच का टकराव अनिवार्य है और मात्र कानून के अंकुश से बलात्कार या हत्या को रोका-घटाया नहीं जा सकता। लंबे समय तक शिक्षण-प्रशिक्षण के बिना और इस मकसद के लिए चलाए सांस्कृतिक अभियान के अभाव में हालात बदल नहीं सकते। पुलिस अधिकारी यही दुहाई देते हैं कि वह कितने दबाव में काम करते हैं, वीआईपी शासक वर्ग की जानोंमाल की हिफाजत से फुर्सत मिले तो आतंकवादियों पर नजर रखने की प्राथमिकता बतलाई जाती है। आम आदमी का नंबर बहुत बाद में आता है। यह सब इस वक्त निरर्थक है, बेमानी भी।
पुलिस ने असाधारण चुस्ती दिखलाते हुए इस बार सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और व्यापक जनाक्रोश के कारण इनका जमानत पर छूटना अपेक्षाकृत कठिन होगा। पर क्या इससे आहत को न्याय मिल जाएगा? यह मुहावरा सुनते हमारे कान पक चुके हैं- कानून अब अपना काम करेगा, न्यायपालिका पर भरोसा रखें। पर यह सब जानते हैं कि 'कानून की देर' कितना अंधेर करती है। अगले ऐसे ही जघन्य बलात्कार तक इस अपराध की याद धुंधलाने लगेगी और यह हिसाब कौन रखेगा कि गृहमंत्री ने सदन को जो भरोसा दिलाया है कि 'फास्ट ट्रैक' झटपट इंसाफ दिलाने की व्यवस्था की जाएगी, उसका क्या हुआ? मुंबई, बेंगलुरु और दिल्ली में यह वचन पहले भी दिया गया है जिसका पालन होते बरस बीत जाते हैं।
जरा एक नजर उन परिस्थितियों पर डालें, जिनमें बलात्कार हुआ। सफेद बसों को सार्वजनिक यातायात के लिए चलाए जाने की अनुमति देने वाले क्या अपनी जिम्मेदारी से हाथ झाड़ सकते हैं? बलात्कारियों को इस कुकर्म के लिए जगह और अवसर दोनों उनकी कृपा से ही प्राप्त हुए। जिस रूट पर इस बस को चलाया नहीं जा सकता था, उस पर वह न सिर्फ चली बल्कि बिना रौंदे दो नौजवान जिंदगियां और उनके परिवारों के सपने तबाह करने वाला यमदूत बनी। कुछ समय पहले जब कुख्यात पोंटी चड्ढा हत्याकांड के सिलसिले में उनके भाई के दिल्ली महानगर में सार्वजनिक यातायात व्यवसाय में सक्रिय होने तथा इस काम में सहायक हो सकने वाले राजनेताओं के साथ दोस्ताना रिश्तों की एक झलक भर मिली थी, जिसके बाद यह शंका स्वाभाविक है कि निजी बसों के बेहद मुनाफाखोर धंधे में बाहुबलियों की खतरनाक दखलंदाजी है। सवारियों को मनचाहे ढंग से परेशान करने का खुला लायसेंस इनके पास है, ऐसा चालकों-खलासियों का मानना है। वह मनमौजी मनमाफिक तरीके से गाड़ी भगाते हैं- एक दूसरे से होड़ लेते- मासूम जानों के साथ खूनी खेल खेलते। किसी चालक के पास लायसेंस है या नहीं, वह पहले सजायाफ्ता या जमानत पर रिहा आरोपी है या नहीं, इसकी कोई जांच पड़ताल जरूरी नहीं। यह रेखांकित करने की जरूरत है कि यही बस अंधेरा होने के पहले स्कूली बच्चों को लाती ले जाती थी। वे बच्चे भाग्य से ही किसी भयानक हादसे से बचे रहे हैं! जो शख्स हमारे सामने ड्राइवर-क्लीनर के रूप में प्रकट होते हैं, उनकी असली उपयोगिता उनके संरक्षक मालिकों के लिए शहरी 'लठैतों', दबंग मवालियों वाली ही होती है। अपनी जायज व नाजायज जरूरतें पूरी करने के लिए बेगुनाह बेचारों की लूटखसोट की आजादी इनको देना इस रोजगार का हिस्सा है। क्रमश: यह लंपट असामाजिक बिरादरी जघन्य अपराधियों के संगठित गिरोह या परिवार की शक्ल ले लेती है। हर बार यह बात साफ होती है फिर भुला दी जाती है। कॉल सेंटर की कार के चालक पिछले साल गुडग़ांव में खूंखार सीरियल किलर्स बने थे और जाने कितने तिपहिया स्कूटर चालक हर रोज रेल स्टेशनों या अंतर्राज्यीय बस अड्डों पर शिकार करते हैं। जीपीएस हो या और कोई उपकरण इन्हें फेल करने में ही इनका और पुलिसवालों का फायदा है। इस सबसे यह नतीजा न निकालें कि दिल्ली में बलात्कार की बाढ़ को इन्हीं लोगों ने बढ़ावा दिया है- इस जानलेवा मर्ज को फैलाने में हमारे शासक श्रेष्ठि वर्ग की निर्णायक भूमिका रही है। याद रहे कैसे एक पुलिस महानिरीक्षक के पुत्र को एक विदेशी पर्यटक के साथ बलात्कार के बाद पहले गिरफ्तारी से बचाया गया, फिर जमानत हो जाने पर गुमशुदा करार दिया गया। इसमें पिता का क्या दोष? हाल के एक दूसरे हादसे में वर्दीधारी पुलिस अफसर को दिन दहाड़े एक राजनेता ने गोली मार मौत के घाट उतार दिया, जब वह अपनी बेटी की इज्जत बचाने उनके पास शिकायत करने पहुंचा।
जब किसी धनकुबेर या माफिया सरगना अथवा जाति या संप्रदाय विशेष के नेता का कुपुत्र ऐसी काली करतूत का आरोपी होता है तो तत्काल बलात्कार का शिकार बनी लड़की या महिला का चरित्र हनन होने लगता है। इस तरह का मूर्खतापूर्ण प्रलाप कानूनी लफ्फाजी के साथ चालू रहता है कि आप अपने आप पर विश्वास खोने लगते हैं। पहनावा भड़काऊ उत्तेजक था, यह तो ऐसी ही थी, बेचारा फंसाया जा रहा है, डॉक्टरी रिपोर्ट का तो इंतजार करें, मीडिया ट्रायल बंद करें। वगैरह। न भूलें कि जेसिका कांड हो या प्रियदर्शिनी मट्टू प्रसंग मीडिया और नागरिकों की सतर्कता से ही आरोपी दंडित हो सके। बलात्कार के मामले में एक और मक्कार साजिश अपराध की परिभाषा की है- महिलाओं के साथ अवांछित हरकतें -स्पर्श, घूरना, छेडख़ानी, अश्लील इशारे बलात्कार से कहीं कम खतरनाक समझे जाते हैं, पर सच यह है कि यह 'मर्दाने' मजाक ही बलात्कार की मानसिकता को पनपाते हैं। अंत में, यह भलीभांति समझने की जरूरत है कि बलात्कार सिर्फ महिलाओं की समस्या नहीं। जीने के और समानता के संवैधानिक बुनियादी अधिकार की धज्जियां उड़ाने वाला सर्वनाशक अपराध है। यदि बेनकाब बलात्कारी तत्काल दंडित नहीं होते तो हमारा जनतंत्र देर तक बचा नहीं रह सकता।
 
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