संसद के सवाल सड़क पर

 
Source: आनंद कुमार     Designation: प्राध्यापक
 
 
 
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http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100178_thumb.jpeg सोलह दिसंबर को दिल्ली में गैंगरेप की घटना के बाद पूरा एक पखवाड़ा देश के लिए असहनीय पीड़ादायक और शर्मसार करने वाला रहा है। इस दौरान दिल्लीी ही नहीं, देश के हर छोटे-बड़े शहर में नई पी‍ढ़ी की महिलाओं की अगुवाई में न्यालय और सुरक्षा के लिए नागरिकों के क्षुब्धो समूह जगह-जगह धरना-प्रदर्शन करते रहे। एक लंबे अरसे के बाद भारतीय लोकतंत्र के मूलाधार में एक नए तरह का रचनात्मलक आवेग देखकर सारी दुनिया अचंभे में है। आधा देश यानी भारतीय स्त्री की जिंदगी में हिंसा की बारंबारता के खिलाफ जिस सांस्कृखतिक विद्रोह की जरूरत देश को पिछले दो दशकों से महसूस हो रही थी, वह आज सत्ता प्रतिष्ठािन के मर्म स्थाल पर लगातार दस्तशक दे रही है। सरकारी मुलाजिम इसको गैर-जिम्मेंदार राजनीति का नमूना बताकर गलतफहमी में जी रहे हैं। ऐसे में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए जो उपाय घोषित हुए हैं, उनको कौन ईमानदारी से कार्यान्वित करने के लिए नैतिक जिम्मेकदारी महसूस करेगा? दीर्घकालीन उपायों के लिए न्याकयमूर्ति जे.एस. वर्मा जैसे लोक-हितकारी न्या यविद की अध्यफक्षता में जो समिति बनी है, उसके पीछे राजसत्ता का कितना बल बना रहेगा और कब तक? न्या.यमूर्ति वर्मा की समिति जिन उपायों को बताएगी, उनको लागू करने के पहले ही 2014 के चुनाव के नगाड़े बजने लगेंगे। फिर नेताओं के नक्कानरखाने में न्या,याधीश की तूती की कौन सुनेगा? परिस्थितियां कितनी बेकाबू हो चुकी हैं, इसके चार उदाहरण सामने देखकर आने वाले समय का अंदाजा लगाना कठिन बात नहीं है।
दिल्लीद की मुख्ययमंत्री ने दो टूक शब्दों में पुलिस के मुखिया की क्षमता को प्रश्नों के दायरे में रख दिया है। दिल्ली के एक सांसद ने पुलिस मुखिया को हटाने की मांग की है। पीडि़ता का बयान लेने गए न्यासयपालिका प्रतिनिधि ने पुलिस पर मनमानी का आरोप लगाया। डॉ. राममनोहर लोहिया अस्पयताल के डॉक्टमरों की भी पुलिस हवलदार सुभाष तोमर की मृत्युी को लेकर रखी राय पुलिस के बार-बार किए जा रहे प्रचार के खिलाफ दिखती है। फिर भी सत्ता की कोई गुप्तृ विवशता है, जिसके कारण दिल्लीय में गुंडों और बलात्काारियों पर अंकुश लगाने में नाकामयाब हो चुके पुलिस नेतृत्वु को अभयदान मिला हुआ है। कहीं हम भस्मा सुर की कथा तो नहीं दुहरा रहे हैं! अगर दिल्लीा का इंतजाम निहत्थेी स्त्री -पुरुषों को बार-बार आंसू गैस और लाठीचार्ज का शिकार बनाने से और कुछ असंबद्ध नौजवानों को एक पुलिसकर्मी की मृत्युस का जिम्मे-दार बनाकर गिरफ्तार करने से बेहतर होने वाला है, तो पुलिस को ही अपना पथ-प्रदर्शक बना लेना चाहिए, लेकिन अगर हमारे पुलिस प्रशासन और अदालत व्येवस्थाे में कुछ बुनियादी कमियां दिखती हैं तो अविलंब मजबूत झाडू से सफाई अभियान चलाना चाहिए।
आज जो निर्भयता की तलाश में लोगों का, विशेषकर स्त्रियों के प्रदर्शन का सिलसिला चल रहा है, इसे हमें मौजूदा पुलिस और प्रशासन के प्रति अविश्वाकस का ऐलान मानना चाहिए। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि ये क्षुब्ध लोग पुलिस और कानून में सुधार की आशा भी छोड़ चुके हैं।
चूंकि चारों तरफ जिस तरह अराजकता और व्य क्तिवाद का माहौल बन रहा है, उसमें हमको एक सुरक्षित समाज बनाने के लिए अच्छीस पुलिस और अच्छीड न्या य व्यकवस्थाब चाहिए। फर्क इतना ही है कि अभी की पुलिस और न्याोय व्यनवस्थास खास लोगों के लिए है।
आज आम आदमी और औरत को अपनी हितकारी, अपने लिए मित्रभाव रखने वाली पुलिस और मजिस्रेथा ट चाहिए। इसी के समानांतर आम पुरुषों के बारे में भी यह प्रदर्शन एक तरह की चेतावनी है क्यों कि स्त्रियों को लेकर अधिकांश पुरुषों, सिर्फ युवकों नहीं सभी उम्र के, पुरुषों की एक विशेष दृष्टि है। इस दृष्टि में औरतों के बारे में फूहड़ मजाक से लेकर अभद्रता के हर अवसर का इस्ते माल करने में मर्दानगी मानना शामिल है। इसके लिए हमें परिवार में स्त्रियों के प्रति अपनत्व और आदर के साथ, विद्यालयों में साथ पढ़ रही छात्राओं के लिए सम्मांन भाव, दफ्तर में काम कर रही सहकर्मी स्त्री के बारे में एक मर्यादित आचरण के लिए प्रतिबद्धता और खेल के मैदान से लेकर सिनेमा हॉल तक स्त्री की उपस्थिति को उच्छृंेखलता और मनमानी हरकतों के लिए लाइसेंस मानने की प्रवृत्ति से मुक्ति की जरूरत है।
जैसे हमारे सार्वजनिक जीवन की हर जगह पुरुषों के लिए सुरक्षित मानी जाती है, वैसे ही स्त्रियों के लिए भी सुरक्षित मानी जानी चाहिए। बिना सार्वजनिक स्थापनों में सुरक्षा और स्वीराज की भावना के हम त्यौंहारों के मौके पर होने वाले फूहड़पन से लेकर बस और ट्रेन में की जाने वाली अपमानजनक हरकतों को कैसे रोक सकते हैं? हर जगह पुलिस नहीं होगी और हर हरकत पर मुकदमा भी नहीं होगा। यह सचमुच सांस्कृतिक क्रांति की तलाश है। अभी पुलिस निशाने पर है, लेकिन पुलिस से नाराजगी सिर्फ इसलिए है कि कुछ पुरुषों के एक हुड़दंगी समूह ने व्येभिचार करने का दुस्सा हस किया। यह घटना इसलिए और भयानक और डरावनी बन गई क्योंरकि यह सब देश की राजधानी के मुख्यस क्षेत्र में हुआ।
अभी तक यह कहा जा रहा है कि दिल्लीु में मनचले औरतों के साथ मनमानी इसलिए कर पा रहे हैं कि हमारे गली-मुहल्लेय और सड़कों पर पुलिस कम है और हमारी न्याऔय-व्यलवस्थाै में स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों के प्रति संवेदनशीलता का अभाव है। ये दोनों ही बातें सच हैं, लेकिन इसमें एक महत्वयपूर्ण कमी भी है, जिसका बार-बार दिल्लीत की अनेक महिला संगठनों ने ठोस आधारों पर सार्वजनिक मंचों से इजहार करने का खतरा उठाया है।
हम पुलिस वालों की संख्या से भी ज्यानदा उनमें कर्तव्यापरायणता की भावना और महिलाओं के प्रति दायित्वा बोध के अभाव को क्योंं नहीं संबोधित करना चाहते! इसके लिए पुलिस बल में महिलाओं की तादाद बढ़ाना और पूरी पुलिस व्यववस्थास को महिला गरिमा को राष्ट्र गरिमा का सारांश मानना और तदनुकूल आचरण करना एक ही सिक्केु के दो पहलू होने चाहिए। दूसरी तरफ न्याहयपालिका की तेज रफ्तार तो हर मामले में जरूरी माननी चाहिए। महिला के खिलाफ हिंसा के दोषियों के मामले में असरदार शक्ति वाली दंड व्यरवस्था की जरूरत एक खास बात है। अभी तो ऐसा लगता है कि 16 दिसंबर के राक्षसी कांड के बाद हुए सांस्कृातिक विद्रोह का लाभ उठाकर पुलिस विभाग और न्यालयपालिका, दोनों ही अपनी तादाद बढ़ाने के लिए ही ज्याादा सक्रिय हुए हैं।
इस समय भीड़ से ज्याकदा निर्भयता और नैतिकता की बुनियाद पर खड़ी शक्ति की जरूरत है। इसे सामाजिक सजगता वाली पुलिस और न्याययपालिका की तलाश भी कहा जा सकता है। अगर अब पुलिस व्य।वस्था में सुधार के बारे में पहल नहीं की गई तो कब हम जनहितकारी पुलिस का सपना पूरा कर सकेंगे? अगर दीमक लगी जिला-स्तेरीय अदालतों की जगह संवेदनशील और सक्षम न्यााय प्रबंध की तरफ आज नहीं बढ़े तो कितनी और निर्दोष स्त्रियों को अपनी जिंदगी खतरे में डालनी पड़ेगी? संसद का विशेष सत्र इन्हीं सवालों से हमारा साक्षात्कादर कराता लेकिन चूंकि माननीय सांसद नए वर्ष के स्वापगत के लिए होने वाले उत्स वों में व्य‍स्तो रहेंगे इसलिए अब इन सवालों को और समाधानों को सड़क पर ही बैठकर संबोधित करना होगा।
 
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