आश्वस्त करती है यह ऊर्जा

 
Source: अरविंद मोहन     Designation: वरिष्ठ पत्रकार
 
 
 
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http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100177_thumb.jpeg देश और समाज की दिशा तय करने में बौद्धिक और सचेत लोगों की बड़ी भूमिका होती है। इसकी हाल में मिसाल सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में सिविल सोसाइटी की महती भूमिका के रूप में दिखी है। उसके बाद अरविंद केजरीवाल इस मुहिम को और आगे ले गए। समाज के बड़े वर्ग की इसे मान्यता मिली। पर हमारा शासक जमात न तो आंदोलन की मांग से सहमत था, न अपनी हनक छोडऩे को तैयार हुआ। इसके विपरीत उसने आंदोलन के तरीके और मंशा पर शक उठाया। शासक जमात ने लोकतंत्र और संसद की गरिमा और श्रेष्ठता का सवाल भी उठाया।
लेकिन इस महज सवा साल के आंदोलन से उपजी भावनाओं बड़ी उपलब्धि बलात्कार की एक नृशंस वारदात के बाद उमड़े आक्रोश की अभिव्यक्ति में भी दिखीं। इससे शासक दल और सरकार तो डरी ही है, पुराने आंदोलनों के महारथी भी परेशान हैं। स्वामी रामदेव और जनरल वीके सिंह पर तो सरकार ने मुकदमा किया, पर इंडिया गेट पर आंदोलनकारियों ने भी उनका कोई स्वागत नहीं किया था। इस बार आंदोलन का श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने परोक्ष समर्थन या भंडारा आयोजन के सहारे भी नहीं ले सकता था। इस बार यह विशुद्ध रूप से नौजवानों का आंदोलन था और औरत जाति के खिलाफ हो रहे अन्याय के खिलाफ एक विस्फोट के रूप में सामने आया था। इसके पीछे किसी संगठन को ढूंढने वाले थक गए, पर कोई संगठन नजर नहीं आया।
इस जनाक्रोश ने यह साबित किया कि जो लोग मुल्क के युवाओं के अराजनीतिक होने का, कॅरियरिस्ट होने का आरोप लगा रहे थे, वे गलत थे। भले ही मुल्क ने 1974 के बाद कोई बड़ा जनांदोलन न देखा हो पर अकेले अन्ना आंदोलन ने मुल्क को जगा दिया है और अब शासन में बैठे लोग या इस व्यवस्था का हिस्सा बन चुके लोग अगर अपने समाज, खास कर मध्यवर्ग को लेकर किसी गलतफहमी में रहेंगे तो खुद पिट जाएंगे। असल मे लोकतंत्र दो स्तर पर काम करता है-हमारे आपके दिल में और लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से। दिल का लोकतंत्र शुद्ध रूप में होता है तो उसे कामकाजी रूप देने के लिए संस्थाओं की जरूरत होती है। लेकिन इस संक्रमण में वह अपनी शुद्धता कुछ गंवाता है। धीरे-धीरे विकृतियां ही प्रमुख हो जाती हैं जैसा कि हमें अपनी कई लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ दिखता है। लेकिन यदि लोगों के मन में लोकतंत्र जीवंत हो तो सारी अशुद्धियों को दूर करने में सक्षम हो जाता है। ऐसे दिल के लोकतंत्र को लाठी-गोली से दबाया नहीं जा सकता और शासन में बैठे लोगों को यह भ्रम छोड़ देना चाहिए।
अब हमारी सरकार और संसद या स्थापित राजनीतिक दलों ने इधर उभरे आंदोलनों से कोई बेवकूफी भरा व्यवहार नहीं किया है पर वे आंदोलनों को मर्ज समझने की गलती कर रहे हैं। असल में आंदोलन हमारी शासन व्यवस्था के बीमार होने का संकेत देते हैं। कायदे से इस संकेत को सबसे पहले सत्ता में बैठे लोगों को समझना चाहिए। अभी तक सरकार, मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों और संसद तक ने ऐसा आचरण नहीं दिखाया है। बार-बार उठता जनाक्रोश यह प्रकट कर रहा है कि हमारी व्यवस्था को जबरदस्त बदलाव से गुजरना होगा। बड़ी पार्टियां और नेता इसे जितनी जल्दी समझ जाएं यह उनके लिए और मुल्क के लिए भी शुभ होगा।
यह अलग बात है कि इस तरह के जन समर्थन से उत्साहित अरविंद केजरीवाल ने जब एक राजनीतिक पार्टी बना ली तो उन्हें अचानक अपना समर्थन घटता लगा। सिविल सोसाइटी और राजनीतिक पार्टी का फर्क अरविंंद न जानते हों, यह संभव नहीं है पर समाज विज्ञान के छात्रों को यह फर्क समझाने का यह बहुत अच्छा उदाहरण है। असल में आधुनिक समाजशास्त्र में सिविल सोसाइटी का काम उस चीज को मानता है जो हम आप अपने पेशे, कमाई के काम और परिवार के अलावा साझा तौर पर करते हैं। इसमें किसी मुद्दे पर एकजुट होकर आंदोलन करना ही नहीं खेलने, ट्रेड युनियन बनाने, फिल्म देखने, किताब पढऩे और किसी हॉबी को सामूहिक रूप से पूरा करना भी शामिल है। सो सबसे जरूरी है नौकरी-पेशा और परिवार से अलग समय गुजारना और साझा हित के काम करना। और जैसे ही आप अपने अंशकालिक काम या जिम्मेवारी को पूर्णकालिक धंधा बना लेंगे, समाज उसे अलग ढंग से देखेगा ही। अब यह आपके पुरुषार्थ पर है कि आप नई पार्टी को ऊपर लाकर दिखाएं।
इसी क्रम में यह भी साफ हुआ कि संसद और मुख्य राजनीतिक दलों की रुचि लोकपाल जैसी कोई प्रभावी व्यवस्था बनाने में नहीं है। संसद ने पिछले साल के अंत में लोकपाल बिल को जैसे लटका दिया, उससे यह भी छुपा नहीं रहा कि संसद लाख आलोचना के बावजूद अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने वाले कदमों में रुचि नहीं लेने वाली है। एक तरफ संसद और राजनीतिक दलों का व्यवहार था और दूसरी ओर अन्ना और अरविंद के अनशन का जोर था कि लोगों को आंदोलन की सार्थकता में कोई भ्रम नहीं रहा। आज दिल्ली और देश के लगभग सभी शहरों में स्वत:स्फूर्त ढंग से जो आंदोलन चल रहे हैं, वे भी उसकी निरंतरता में ही हैं। लोगों में आंदोलन के प्रति समर्थन और सहानुभूति देखकर नेताओं और स्थापित व्यवस्था के लोगों ने सिविल सोसाइटी की भूमिका और सार्थकता पर ही सवाल उठाना शुरू किया। फिर कई तरफ से चुनाव में आकर आजमा लेने की चुनौती भी उछाली गई। जैसा पहले कहा गया है हमारे यहां और सच कहें तो पूरी दुनिया में स्थापित और व्यवस्थित समाज के लिए अपने कार्य-व्यापार के संचालन और सामने आई गड़बडिय़ों को दूर करने के लिए बाहर से मदद लेने या भगवान भरोसे बैठे रहने के उदाहरण नहीं हैं। समाज होता ही है सुख-दुख में साथ रहने और भागीदारी करने के लिए। अगर उसके प्रमुख और अगुआ लोग अपनी भूमिका भूल जाएं तो समाज बचेगा ही कैसे।
सत्तर के दशक तक पैदा हुए मजदूर संघ और अन्य संगठनों की ताकत और ऊर्जा कम हुई तो राजनीतिक दलों ने नए और समाज के लिए कुछ करने के जज्बे से निकले युवकों को अपनी ओर आकर्षित किया। पर अस्सी के दशक में उभरे एनजीओ आंदोलन ने समाज सेवा और कॅरियर की ऐसी स्वादिष्ट खिचड़ी तैयार कर दी कि समाज के लिए कुछ भी करने और सुविधाओं के संग करने का इच्छुक हर नौजवान-नवयुवती उधर ही मुडऩे लगा। ऐसे में जब पूरी दुनिया में सिविल सोसाइटी आंदोलन परवान चढ़ा और चर्चित हुआ तब भारत के लिए यह पद ही अनजाना रह गया। हमारे यहां स्व. किशन पटनायक जैसे लोगों ने उस दौर में भी विदेशी धन से समाज सेवा हो सकती है या नहीं, जैसी बहस उठाई पर बात ज्यादा आगे नहीं गई। विदेशी धन से काम को जासूसी वाले अंदाज में जरूर देखा गया, पर गंभीर चर्चा नहीं हुई। आज जब अरविंद केजरीवाल और उससे पहले समाजवादी जन परिषद जैसे संगठनों ने जब राजनीतिक दल बनाने की मुहिम चलाई तो साफ लगा कि एनजीओ क्षेत्र ने सारे समाज को भेद दिया है और समाज सेवा को कॅरियर बनाने वाले लोगों की संख्या इतनी बड़ी हो चुकी है कि इतने बड़े देश भर में काम जमाने लायक ईमानदार और समर्पित कार्यकर्ता ढूंढना मुश्किल है। लेकिन एक पर एक हो रहे आंदोलन यह आस जगाते हैं कि समाज में अपनी गड़बडिय़ों को दूर करने की ऊर्जा बची हुई है।
इस ऊर्जा को कैसे लोकतांत्रिक उपकरण में बदलें, यह कुछ लोगों के लिए चुनौती हो सकती है, पूरे समाज के लिए नहीं।
 
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