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पहाड़ पर लहराया केसरिया परचम

मुंबई.गुजरात के बाद हिमाचल में भी केसरिया परचम का लहराना केंद्र की यूपीए सरकार को सकते में लाने के लिए काफी है। हालांकि केंद्रीय राजनीति में हिमाचल की खास भूमिका नहीं रही फिर भी इस जीत का दूरगामी प्रभाव केंद्र की राजनीति पर पड़ने की पूरी संभावना है। हिमाचल विधानसभा चुनाव के परिणाम से जहां भाजपा का मनोबल बढ़ा है वहीं कांग्रेस उत्तर प्रदेश और गुजरात में खराब प्रदर्शन के बाद हिमाचल से भी अपना किला गंवाने के बाद हताश है। इससे पहले इस साल के शुरुआत में एक और पहाड़ी राज्य उत्तराखंड की सत्ता भी भाजपा ने कांग्रेस से छीन ली थी।

सोनिया के नेतृत्व को चुनौती
लगातार हार की ठोकर ने कांग्रेस पार्टी को एक बार फिर अपने गिरेबान में झांकने को मजबूर कर दिया है। सोनिया का करिश्माई नेतृत्व भी कामयाब नहीं हो पा रहा है। गुजरात की जीत पर जहां नरेंद्र मोदी के व्यक्त्तिव का जादू चला वहीं हिमाचल में भाजपा की जीत एंटी इनकैंबेंसी फैक्टर के कारण मानी जा रही है। हिमाचल में गुजरात की तरह मौत का सौदागर या सोहराबुद्दीन जैसे शब्दों के हथियार नहीं चले। यहां सत्ता के प्रति लोगों में आक्रोश था जिसे उन्होंने अपने मतों से जाहिर कर दिया। भाजपा ने भी शुरुआती असमंजस के बाद प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करके साहसी फैसला लिया, जो सही साबित हुआ।

राष्ट्रीय मुद्दों का भी असर रहा
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर राकेश सिन्हा का मानना है कि स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ राष्ट्रीय मुद्दों ने भी इस चुनाव को प्रभावित किया है। व्यवस्था विरोधी वोट के कारण हिमाचल में कांग्रेस की जीत से पूरी तरह सहमत न होते हुए राकेश सिन्हा का कहना है कि यदि ऐसा होता तो गुजरात में नरेंद्र मोदी फिर सत्ता में वापस नहीं आते। प्रोफेसर सिन्हा ने कहा कि केंद्र सरकार की आर्थिक नीति ने समान रूप से सभी राज्यों में आम लोगों को तंगी एवं अनिश्चितता की स्थिति में ला खड़ा किया है। यह नीति सिर्फ बड़े उद्योगों के हित को साधने वाली है।

केंद्र सरकार के आतंकवाद विरोधी रवैए के नरम रुख को भी चुनावों में कांग्रेस की हार का कारण मानते हुए राकेश सिन्हा ने कहा कि केंद्र सरकार आतंकवाद से कहीं ज्यादा आतंकवादियों के धर्म से डरने लगी है और आंतरिक सुरक्षा को भी सांप्रदायिक चश्मे से देखना शुरू कर दिया है। इसे सभी राज्यों में लोगों ने आतंकवादियों के प्रति सरकार की नरम दृष्टि के रूप में देखा है। सिन्हा का कहना है कि पोटा का हटाया जाना इसका प्रमाण है।

प्रोफेसर सिन्हा ने कहा कि केंद्र सरकार ने अपने आपको वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पूरी तरह अमेरिका का पिछलग्गू बना दिया है, जिसके कारण पूरे देश में लोग परिवर्तन के लिए तैयार दिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह केंद्र सरकार के लिए खतरे की घंटी ही नहीं बल्कि लोकसभा चुनाव के लिए एक तरह का जनादेश है। केंद्र सरकार राजनैतिक एवं नैतिक दोनों रूपों से देश में शासन करने की स्थिति में नहीं रह गई है।

हर पांच साल में बदलती है सत्ता
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर उमेश चौहान इस चुनाव परिणाम को एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर मानते हुए कहते हैं कि यदि 1985 के बाद के चुनाव परिणामों पर नजर डालें तो हरेक पांच साल बाद यहां सत्ता बदलती रही है। कांग्रेस ने अपनी तरफ से विकास को मुद्दा बनाने की कोशिश की लेकिन उसे असफलता मिली। प्रो.चौहान ने कहा कि सत्तारूढ़ दल अक्सर विकास को मुद्दा बनाने की कोशिश करता है लेकिन इसमें अहम बात ये है कि जनता विकास को किस तरह से समझती है। विकास में बेरोजगारी से लेकर तमाम तरह की चीजें शामिल होती हैं। हिमाचल प्रदेश में देखें तो साक्षरता में वृद्धि तो हुई है लेकिन बेरोजगारी बढ़ी है। हिमाचल में कुछ औद्योगिक इकाईयां भी आई हैं जिसका सीधा लाभ आमलोगों को नहीं हुआ। भष्ट्राचार पर लगाम नहीं लगाया जा सका जिसका नतीजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा।





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