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एससी-एसटी, ओबीसी जजों की कम संख्या चिंताजनक : राष्ट्रपति

5 वर्ष पहले
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कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं तो भावनाएं आहत करने का भी नहीं: नायडूने कहा कि कहा कि किसी को कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। साथ ही आपको किसी की भावनाएं आहत करने का भी अधिकार नहीं है। धर्म और संस्कृति में अंतर है। धर्म पूजा का तरीका है तो संस्कृति जीने का। लोकतंत्र में असहमति मंजूर है, विघटन नहीं। नायडू ने कहा कि आपको बहुमत स्वीकार करना ही होगा। लोगों के जनादेश के प्रति सहनशीलता लानी होगी।

नायडू बोले- लोकतंत्र में धमकी देना या इनाम रखना मंजूर नहीं

नई दिल्ली | राष्ट्रपतिरामनाथ कोविंद ने शनिवार को कहा कि न्यायपालिका में महिला, एससी-एसटी और ओबीसी जजों की अस्वीकार्य रूप से कम संख्या चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि देश की अधीनस्थ अदालतों, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के 17 हजार जजों में से सिर्फ 47 सौ ही महिलाएं हैं। यानी चार में से सिर्फ एक महिला जज। उन्होंने न्यायपालिका को यह स्थिति सुधारने की दिशा में कदम उठाने की सलाह दी है। राष्ट्रपति ने कहा कि जिला और सेशन जजों के कौशल को बढ़ाना उच्चतर न्यायपालिका का कर्तव्य है, ताकि ज्यादा लोगों को हाईकोर्ट में प्रमोट किया जा सके। हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि ऐसे जजों की नियुक्तियों में गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय विधि दिवस पर नीति आयोग और विधि आयोग की ओर से आयोजित दो-दिवसीय सम्मेलन में राष्ट्रपति ने कहा कि हमें अपनी अदालतों और उनकी स्वतंत्रता पर गर्व है, लेकिन एक विरोधाभास यह भी है कि अक्सर गरीब कानूनी लड़ाई से बचते हैं। इसकी वजह लागत और लंबा समय है। वहीं, संपन्न लोग कई बार मामलों को खींचने के लिए ही अदालती प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करते हैं। यह विरोधाभास खत्म करना होगा। सुनवाई स्थगित करने की चालाकियों से निपटना होगा।

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