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मानव को सुख पाना है तो अच्छे कर्म करे तथा बुरे कर्मों से बचे

4 वर्ष पहले
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अच्छे व बुरे दोनों प्रकार के कर्मों का फल मिलता है। यदि मानव अच्छे कर्म करता है तो वह इस जन्म के साथ अगले जन्म में भी सुख भोगेगा लेकिन बुरे कर्म करेगा और जीवों की हिंसा, दूसरों को परेशान करेगा तो उसे अगले भव में नरक या तिरमन्स गति मिलेगी। मानव को यदि सुख पाना है तो वह अच्छे कर्म करे तथा बुरे कर्मों को करने से बचे।

यह सीख आचार्य विश्वर| सागरसूरीश्वरजी ने शुक्रवार को संजय गांधी उद्यान नवर| धाम की धर्मसभा में दी। उन्होंने आगम वाचना के पंचम दिवस विपाक सूत्र का सार व महत्ता पर व्याख्यान देते हुए कहा कि इस विपाक सूत्र में दो भाग है। दुःख विपाक व सुख विपाक। दोनों भागों में मानव के द्वारा अच्छे व बुरे कर्म करने पर क्या स्थिति व दुर्गति बनती है इसकी कई गाथाएं हैं। जैन धर्म कर्म के सिद्धांत में विश्वास रखता है इसके अंतर्गत जैन धर्म का विश्वास है कि मानव को उसके अच्छे व बुरे दोनों प्रकार के कर्मों का फल मिलता है। इसलिए मानव को सदैव शुभ व अच्छे कर्म करना चाहिए ताकि वह सुख प्राप्त करे। यदि मानव बुरे कर्मों का बंधन करेगा तो उसे भी आगामी समय या अगले भव में दुःख ही उठाना पड़ेगा। इसलिए बुरे कर्म करने से पहले सोचो।

पंचम दिवस की आगम वाचना का लाभ दिलीप रांका परिवार, कैलाश शांतिलाल जैन रतलाम वाला परिवार, रवींद्रकुमार दावड़ा परिवार ने लिया। सभी के द्वारा समाजसेवी महेंद्र पोरवाल, समरथमल वरमण्डल वाला के साथ भगवान जीरावला पार्श्वनाथ के चित्र पर माल्यार्पण किया गया। धर्मसभा का संचालन आराधना भवन श्री संघ के कोषाध्यक्ष अनिल धींग ने किया। आभार बाबूलाल जैन चौमेहला वाला ने माना।

संजय गांधी उद्यान में नियमित प्रवचन के दौरान सीख देते आचार्य विश्वर|सागर महाराज।

‘तकलीफ देखकर मन में करुणा का भाव रखो’
आचार्यश्री ने कहा कि किसी व्यक्ति की बीमारी, शरीर में तकलीफ या दु:ख देखकर हमारे मन में करुणा का भाव आना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति आपका शत्रु है या विरोधी है और वह दुःख में है तो उसके दु:ख को देखकर तुम सुख का अनुभव करते हो यह उचित नहीं है। उसके कर्म का फल तो वह दुःख भोगकर काट लेगा लेकिन यदि तुम उसके प्रति ऐसे भाव लाओगे तो तुम अनुचित कर्मों का बंधन करोगे, यह उचित नहीं है।

जप, तप व धर्म-आराधना कभी निष्फल नहीं जाती
आचार्यश्री ने कहा कि कोई व्यक्ति राेज सामाजिक, प्रतिक्रमण करता है या कोई भी धार्मिक कर्म करता है तो उसका फल सदैव उस मानव के लिए शुभ व सुखकारी ही होगा। यदि कोई व्यक्ति तप तपस्या या धार्मिक कार्य करे तो उसकी सदैव अनुमोदना करो। कभी भी ऐसे कार्याें में विघ्न डालने या आलोचना करने का काम मत करो।

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