शेखर गुप्ता का कॉलम: सौम्य राष्ट्रवाद कांग्रेस को चुनाव में भारी पड़ेगा

शेखर गुप्ता | Sep 10,2018 23:05 PM IST

राहुल गांधी को भगवान शिव की शरण में जाना पड़ा पर वे भाजपा को परेशान करने में कामयाब रहे। उनकी कैलाश मानसरोवर यात्रा पर भाजपा समझदारी भरी प्रतिक्रिया देकर कह सकती थी कि भोले बाबा आपको समझदारी दें और उम्मीद है आपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए भी प्रार्थना की होगी। किस्सा खत्म हो जाता। इसकी बजाय भाजपा सवाल उठाने लगी कि वे वहां गए भी हैं या नहीं।

महाभारत 2019: चुनावी तीर्थ के घाट-घाट पर मंडराते वोटों के मौसमी पंडे- कुमार विश्वास की व्यंग्य श्रृंखला

Bhaskar News | Sep 10,2018 08:13 AM IST

दरवाजे के सामने से जल्दबाज़ी में मुंह चुराकर निकल रहे हाज़ी को मैंने दरेरा ‘अमां हाज़ी तुमने तो बताया तक नहीं कि सुरजेवालाजी द्वारा जनेऊ संस्कार कराने वाले अकस्मात हिन्दू-हिन्दू दिख रहे राहुल बाबा की मानसरोवर यात्रा तुम्हारी एजेंसी ने ही सेट की थी!’ कुढ़े हुए हाजी ने बिना मुंह फेरे झल्लाए स्वर में कहा ‘क्यूं’? जब इतने बड़े देश का महाव्यस्त प्रधानमंत्री तीन घंटे जापान के प्रधानमंत्री से क्योटो में कन्वर्ट बनारस के घाट पर आरती की टुनटुनी बजवा सकता है तो हमारा निपट खाली युवराज तीन दिन के लिए शंकर से वर मांगने मानसरोवर नहीं जा सकता?’ मैंने कहा ‘बिल्कुल जा सकता है,पर वर क्यूं’? वधू मंगवाओ उससे, सोनियाजी की तबियत भी ठीक नहीं रहती, ज़रा घर ही संभल जाएगा’।

मंडे पॉजीटिव: दर्द जीवन की प्रेरणा और ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ मेरी सोच

Bhaskar News | Sep 09,2018 22:41 PM IST

दर्द मेरे लिए हमेशा प्रेरणा रहा है, वह चाहे मेरी इंजरी की तकलीफें हों या जीवन के हालात से मिला दर्द हो। मेरी सफलता में संघर्ष की एक लंबी दास्तान है। कद, जूते, डाइट और प्रैक्टिस के लिए मैदान तक, हर जगह मुझे घोर संघर्ष करना पड़ा। मेरे पिता पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी के एक छोटे से गांव घोसपुरा में रिक्शा चलाते थे। मां चाय बागान में पत्ती तोड़ने का काम करती, इसी से हमारा घर चलता। आज भी घर की चारदीवारी पक्की नहीं है। बस मैंने घर में काली मां का एक पक्का मंदिर बनाया है। करीब सात साल पहले पिता गंभीर रूप से बीमार हो गए और बिस्तर पकड़ लिया।

डॉक्टरों की जिद: करोड़ों हर्जाना भर देंगे, नौकरी छोड़ देंगेे, लेकिन गांव नहीं जाएंगे

Bhaskar News | Sep 08,2018 22:46 PM IST

गांवों में डॉक्टर्स की कमी को पूरा करने के लिए विभिन्न राज्य सरकारों ने कुछ साल पहले सख्त कानून बनाए। मेडिकल छात्रों से ये बॉन्ड भरवाना शुरू किया गया कि वे पढ़ाई के बाद अनिवार्य रूप से कुछ साल ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देंगे। आश्चर्य की बात यह है कि डॉक्टर्स बड़ी संख्या में आज भी गांव जाने के लिए तैयार नहीं हैं। भास्कर ने विभिन्न राज्यों की स्थिति पता की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। यहां के डॉक्टर्स करोड़ों रुपए सरकार को बॉन्ड तोड़ने के बदले में दे रहे हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं जा रहे हैं। अकेले महाराष्ट्र और राजस्थान में ही बीते लगभग एक दशक में 10 हजार से अधिक डॉक्टरों ने ग्रामीण क्षेत्र में जाने मना कर दिया है। यही नहीं राजस्थान में तो नियुक्तियां निरस्त हुईं लेकिन वे गांव नहीं गए।