जीने की राह कॉलम: नई भूल समझदारी का माध्यम होती है

पं. विजयशंकर मेहता | Sep 06,2018 01:16 AM IST

यदि सूरज उगने तक रोशनी का इंतजार न कर सकें तो रात में ही उजाले की संभावना जरूर खोजिएगा। जब आप रात में रोशनी टटोलने जाएंगे तो या तो जुगनू साथ आएंगे या चंद्रमा का सहयोग मिल जाएगा। वरना कृत्रिम प्रकाश पैदा करना पड़ेगा। लेकिन जो भी करना पड़ेगा, अंधेरे में ही करना पड़ेगा और अंधेरे में आप टकरा सकते हैं, भूल कर सकते हैं। ऋषि-मुनियों ने तो कहा है कि मनुष्य अंधकार के कारण ही भूल करता है। अंधकार एक तरह की बेहोशी है। यह जीवन में उतरी कि आप टकराए। लेकिन हम बात यह कर रहे हैं कि सुबह सूरज की रोशनी तक का इंतजार मत करिए, अंधेरे में भी प्रयास कीजिए।

संपादकीय: अनुसूचित जाति उत्पीड़न कानून के विरोध में सवर्णों का गुस्सा

Bhaskar News | Sep 06,2018 00:12 AM IST

गुरुवार को 35 सवर्ण संगठनों की ओर से अनुसूचित जाति और जनजाति उत्पीड़न अधिनियम में संसद की ओर से किए गए संशोधन के विरुद्ध आहूत भारत बंद का सबसे ज्यादा शोर मध्य प्रदेश में सुनाई दे रहा है, जो उचित ही है, क्योंकि वहां चुनाव है और चुनाव ही वह मौका होता है, जब विभिन्न वर्ग अपने मुद्‌दे रखते हैं। छत्तीसगढ़ में भी संशोधन के खिलाफ प्रतिक्रिया इसी वजह से दिखी है। सुप्रीम कोर्ट से कानून को नरम बनाए जाने के विरोध में जब 2 अप्रैल को दलित संगठनों ने बंद का आयोजन किया था तो सबसे ज्यादा हिंसा ग्वालियर संभाग में ही हुई थी।

जीने की राह कॉलम: शिक्षक में गुरु देखकर संस्कार गृहण करें

पं. विजयशंकर मेहता | Sep 05,2018 06:43 AM IST

आज के इस युग में जबकि हर क्षेत्र में भागमभाग, 'और मिल जाए-बहुत मिल जाए', 'मैं सबसे आगे निकल जाऊं..' की होड़ मची हुई है, अच्छी शिक्षा के बिना जीवन का स्वाद बिना नमक के भोजन जैसा होगा। आज हर माता-पिता की इच्छा होती है अपनी संतानों को खूब अच्छी शिक्षा दिलाएं, पढ़ा-लिखाकर उन्हें 'बड़ा' बनाएं। लेकिन कोरी शिक्षा किसी को 'बड़ा' नहीं बना सकती। सफलता के शीर्ष को छूना हो तो शिक्षा के साथ बच्चों को संस्कार देना भी जरूरी हैं। परंतु यह भी तय है कि जब तक संस्कार ज्ञान के साथ नहीं गूंथ दिए जाते, बच्चा सफल होना तो दूर, कामयाबी की दौड़ में शामिल हो पाने के लायक भी नहीं बन सकता।

​​भास्कर अंडर-30Y कॉलम: आर्थिक की बजाय अब ‘पर्यावरण जीडीपी’ की बात हो

रचित पंडया | Sep 04,2018 00:13 AM IST

​जिस तरह से ‘ग्लोबल वार्मिंग’ का असर दिख रहा है, उन हालातों में ‘आपदा प्रबंधन’ महत्वपूर्ण विषय के रूप में उभरा है। हाल के दिनों में केरल में आई बाढ़ ने कहीं न कहीं इकोलॉजी में आए असंतुलन की तरफ संकेत किया है। अब यह आवश्यकता है कि देश में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में विस्तार और विकास की पहल की जाए। अगर इसे केवल मौसम आधारित मानकर औपचारिक रूप में मान लेना ठीक नहीं है। अब प्राकृतिक आपदाएं मौसम आधारित न होकर वर्षभर कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में घटित हो रही हैं। अतः सरकार को नए सिरे से ‘आपदा-प्रबंधन’ को शैक्षिक पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर इसके बारे में प्रचार प्रसार करना चाहिए।