महाभारत-2019 विश्लेषण: न्याय पर भीड़तंत्र को हावी होने से रोकना होगा

पुण्य प्रसून वाजपेयी | Aug 08,2018 09:09 AM IST

अगले हफ्ते आज़ादी के 71 बरस पूरे होंगे और इस दौर में भी कोई यह कहे, हमें चाहिए आज़ादी या फिर कानून का राज है कि नहीं। या फिर भीड़तंत्र ही न्यायिक तंत्र हो जाए और संविधान की शपथ लेकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में बैठी सत्ता कहे कि भीड़तंत्र की जिम्मेदारी तो अलग-अलग राज्यों में संविधान की शपथ लेकर चल रही सरकारों की है। यानी जिस आज़ादी का जिक्र आजादी के 71वें बरस में हो रहा है, क्या वह डराने वाली नहीं है? क्या एक ऐसी उन्मुक्तता को लोकतंत्र का नाम दिया जा सकता है? लोकतंत्र चुनावी सियासत की मुट्‌ठी में कुछ इस तरह कैद हो चुका है कि जिस वाम को 71 बरस पहले आज़ादी मिली, वही वाम अब अपने एक वोट के आसरे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में खुद को आज़ाद मानने का जश्न मनाती है। लालकिले की प्राचीर से देश के नाम संदेश को सुनकर गदगद हो जाती।

तमिल राजनीति ने हाजिरजवाब नेता खोया: वरिष्ठ तमिल पत्रकार एन. अशोकन

‌एन. अशोकन | Aug 08,2018 03:56 AM IST

यह 2013 का वर्ष था। एम. करुणानिधि अपनी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के मुख्यालय अरिवालयम जाने के लिए अपने घर से निकले। उन्होंने देखा कि कार्यकर्ताओं की हमेशा रहने वाली भीड़ के बीच एक बूढ़ा व्यक्ति समीक्कान्नु अपनी पत्नी के साथ उनका इंतजार कर रहा है। उन्होंने इस व्यक्ति को पास बुलाया। उसने कहा कि वह जल्दी ही उम्र के सौ साल पूरे करने वाला है और इसलिए अपने प्रिय नेता के आशीर्वाद चाहता है। करुणानिधि पार्टी के अखबार ‘मुरासोली’ में रोज कार्यकर्ताओं को ‘उदानपिराप्पाए’ (यानी बंधुओं) संबोधित करके पत्र लिखते थे। इस घटना से अभिभूत डीएमके नेता ने कार्यकर्ताओं को लिखा, ‘मैंने समीक्कान्नु को शुभकामनाएं दीं और आगे बढ़ गया। उन बुजुर्ग की जन्मतिथि जानकर मैंने एमके स्टालिन (तब पार्टी के कोषाध्यक्ष) से कहा कि वे पार्टी के जिला सचिव को उस दिन समीक्कान्नु के घर भेजे। स्टालिन ने इस युगल को घर के भीतर आमंत्रित किया और समीक्कान्नु को तोहफे में एक हजार रुपए दिए। निर्देश के मुताबिक जिला महासचिव उस दिन उनके घर गए और उन्हें शुभकामनाएं व तोहफे दिए।

भास्कर अंडर-30Y कॉलम: आरक्षण में आर्थिक पिछड़ेपन की अलग श्रेणी बनाने का वक्त

कैलाश बिश्नोई | Aug 08,2018 01:07 AM IST

देशभर में आरक्षण के लिए नियमित अंतराल पर जातिगत आंदोलन हो रहे हैं। ऐसे समय में पूरी आरक्षण प्रणाली पर अब नई तरह से सोचने की जरूरत है।अगर संविधान के तमाम प्रावधानों की समीक्षा हो सकती है तो आरक्षण की क्यों नहीं हो सकती? स्वस्थ लोकतंत्र में ऐसा होना भी चाहिए।

भास्कर संपादकीय: महिला अपराधों में बिहार को टक्कर देता उत्तर प्रदेश

‌Bhaskar News | Aug 08,2018 00:38 AM IST

बिहार के मुजफ्फरपुर से सटे उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के नारी संरक्षण गृह में भी उसी तरह का सेक्स रैकेट पकड़े जाने से यह लगने लगा है कि दोनों प्रदेशों में सत्ता और एनजीओ का गठजोड़ समाज सेवा के नाम पर एक ही तरह के घृणित अपराधों में लिप्त है। देवरिया में पुलिस की कार्रवाई में पता चला है कि रजिस्टर में दर्ज 42 अंतःवासियों में से 18 अभी भी गायब हैं। संबंधित एनजीओ की मान्यता तो क्रेच में अनियमितता के कारण एक साल पहले रद्‌द हो गई थी और इस बार जब जिला परिवीक्षा अधिकारी जांच करने गए तो उनसे झड़पों के बाद यह रहस्योद्‌घाटन हुआ कि वहां तो सेक्स का रैकेट चल रहा है।