भास्कर संपादकीय: राजधानी दिल्ली में मौजूद हैं कालाहांडी के कई इलाके

Bhaskar News | Jul 28,2018 03:28 AM IST

मंगलवार को राजधानी दिल्ली ही नहीं भारत का लोकतंत्र भी उस समय शर्मशार हो गया जब तीन बच्चियों ने भूख से तड़पकर दम तोड़ दिया। सरकार ने दो बार पोस्टमार्टम कराया लेकिन, दोनों बार मौत का कारण खाली पेट होना ही निकला। दुष्यंत कुमार ने कभी व्यंग्य करते हुए कहा था कि ‘भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस यह मुद‌्दआ’। संयोग से जिस समय देश की संसद में विपक्ष का पप्पी-झप्पी का कार्यक्रम चल रहा था और उसके जवाब में सत्तापक्ष की ओर बताया जा रहा था कि पिछले चार साल में कितनी नौकरियां पैदा हो गई हैं उसी समय उन बच्चियों का रिक्शा चालक पिता मंगल सिंह नौकरी की तलाश में घर से निकल गया था और मानसिक तौर पर असमान्य मां की बेटियां भूख से तड़प रही थीं।

भास्कर अंडर-30Y कॉलम: हमें बहुराष्ट्रीय ब्रैंड नहीं, हजारों छोटे-छोटे देशी ब्रैंड चाहिए

देवेन्द्रराज सुथार | Jul 28,2018 03:24 AM IST

हम दुनिया के देशों से भारत में निवेश करने के लिए दर-दर भटकते है लेकिन, छोटी-छोटी इकाइयों को खड़ा करने, उनकी उत्पादन लागत घटाने और कम लागत वाले चीनी आयात का विकल्प खड़ा करने से चूक रहे हैं। हम ‘मेक इन इंडिया’ का नारा लगा रहे हैं। दुनिया की कंपनियों को भारत में अरबों का निवेश करने के लिए भारत बुला रहे हैं लेकिन, यह समझ नहीं पा रहे हैं कि घरेलू फर्नीचर, प्लास्टिक के डिब्बे, मुलायम खिलौने, छाते बनाने, दिवाली के रंगीन बल्ब, पंखे या घड़ियां, पटाखे बनाने या रोजमर्रा के लिए लगने वाली छोटी-छोटी चीजों के लिए अरबों डॉलर के निवेश की जरूरत नहीं होती।