Dainik Bhaskar Brings you the latest Hindi News

सियासी फ्लैश बैक / धोखे से हारे थे रेणु, चुनाव नहीं लड़ने की खाई थी चौथी कसम

  • 1972 में फारबिसगंज से चुनाव मैदान में उतरे फणीश्वरनाथ रेणु कद्दावर नेता सरयू मिश्रा से हार गए थे

Dainik Bhaskar

Apr 20, 2019, 07:30 AM IST

रूपेश कुमार|फारबिसगंज .साहित्य की नई विधा आंचलिक साहित्य का सृजन करने वाले अमर कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु ने अपने साहित्य सृजन (मारे गए गुलफाम, जिस पर तीसरी कसम फिल्म बनी। फिल्म में राजकपूर तीन कसमें खाते हैं।) में तीन कसमें खाई थीं, लेकिन जिंदगी का तजुर्बा मिलने पर उन्होंने चौथी कसम भी खाई। रेणु की चौथी कसम थी-कभी चुनाव न लड़ने की। रेणु ने यह कसम 70 के दशक में फारबिसगंज से विधानसभा चुनाव में छल-प्रपंच और अपनों से मिले धोखे के कारण हुई हार के बाद खाई थी।

तीसरी कसम लिखने वाले रेणु सभाओं में सुनाते थे किस्से, कहानी और गीत :हिंदी साहित्य में अपनी खास पहचान बना चुके रेणु ने वर्ष 1972 में चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। रेणु पूरी ताकत से अपने अंदाज में चुनाव लड़े। उनके चुनावी प्रचार के तौर-तरीकों का जिक्र करते हुए पुत्र डीपी राय बताते हैं कि वे चुनावी सभाओं में किस्से-कहानियां और भजन-गीत भी सुनाते थे। उनका एक खास चुनावी नारा था-कह दो गांव-गांव में, अबके इस चुनाव में वोट देंगे नाव में। चुनाव में उनका मुकाबला कांग्रेस के कद्दावर नेता सरयू मिश्रा से था, लिहाजा रेणु चुनाव हार गए। इसकी भरपाई 2010 में उनके बेटे ने चुनाव जीत कर की।

बड़े बेटे पद्मपराग राय वेणु ने 2010 में जीता चुनाव :रेणु के बड़े बेटे पद्मपराग राय ‘वेणु’ 2010 से 2015 तक फारबिसगंज से भारतीय जनता पार्टी के विधायक रह चुके हैं। अभी जदयू में हैं। 2015 में भाजपा ने वेणु को टिकट नहीं दिया तो जदयू में चले गए। एकबार फिर जब नीतीश कुमार लौटकर राजग में आ गए हैं, तब रेणु का परिवार भी खुद को राजग गठबंधन का हिस्सा बन गया है। पूर्व विधायक पद्मपराग राय वेणु बताते हैं, उनसे मिलने बीजेपी से लेकर जदयू तक के नेता आते हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 5 बार हमारे घर आ चुके हैं।

1972 से ही रेणु परिवार का राजनीति में हो रहा इस्तेमाल :रेणु का गांव अररिया के औराही हिंगना में है। साहित्य से जुड़ा यह परिवार अब सियासी हो चुका है। मगर रेणु परिवार की पीड़ा कुछ अलग ही है। रेणु के तीन बेटों में से सबसे छोटे दक्षिणेश्वर प्रसाद राय बताते हैं कि 1972 से ही रेणु परिवार का राजनीति में खूब इस्तेमाल होता रहा है। उन्होंने कहा कि सभी दलों को रेणु से मोह है। जब भी सक्रिय राजनीति की बात चलती है तो इस परिवार के साथ छल-प्रचंप होना लाजिमी है। हालांकि उन्होंने ने यह भी कहा कि रेणु का नाम इस परिवार के लिए एक वटवृक्ष के समान है। इसका छांव तो मिलता है, परंतु उन्हें भी सियासत के लिए एक बड़ी पार्टी की तलाश रहती है।

Share
Next Story

पॉलिटिकल कंट्रोवर्सी / मांझी बोले-कुशवाहा को महागठबंधन में लेना गलत था, मैंने तो विरोध किया था

Next

Dainik Bhaskar Brings you the latest Hindi News

Recommended News