लोकसभा सीट सुपौल / यहां कांग्रेस को नहीं मिल रहा राजद का साथ, एनडीए से रंजीत को मिल रही कड़ी चुनौती

वर्तमान सांसद और कांग्रेस प्रत्याशी रंजीत रंजन।

  • मधेपुरा में शरद यादव के विरोध में चुनाव लड़ रहे पप्पू यादव, इसी वजह से सुपौल के राजद कार्यकर्ता नाराज
  • पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन का समर्थन नहीं कर रहे राजद कार्यकर्ता, कांग्रेस की बढ़ी मुश्किलें

Dainik Bhaskar

Apr 19, 2019, 05:07 PM IST

सुपौल. परिसीमन के बाद 2008 में सुपौल लोकसभा सीट अस्तित्व में आई। यहां अब तक हुए 2 लोकसभा चुनाव में एक बार जदयू जबकि एक बार कांग्रेस ने जीत दर्ज की। 2014 में मोदी लहर के बाद भी इस सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। जन अधिकार पार्टी के अध्यक्ष और मधेपुरा से सांसद पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जदयू प्रत्याशी दिलेश्वर कामत को 60 हजार वोटों से हराकर पहली बार लोकसभा पहुंचीं। भाजपा यहां तीसरे नंबर पर थी।

इस बार महागठबंधन में हुए सीटों के बंटवारे के बाद यह सीट कांग्रेस के खाते में आई और पार्टी ने यहां से फिर रंजीत रंजन को टिकट दिया। एनडीए ने यहां से जदयू के टिकट पर दिलेश्वर कामत को मैदान में उतारा। इस सीट पर 2009 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में वर्तमान सांसद रंजीत रंजन ने अपनी किस्मत आजमाई थी। जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ रहे विश्व मोहन कुमार ने रंजीत को डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों से हराया था।

कांग्रेस को नहीं मिल रहा राजद का साथ
भाजपा और जदयू के दोबारा साथ आने के बाद रंजीत रंजन की मुश्किलें पहले ही बढ़ी हुई हैं। 2014 में भाजपा और जदयू यहां अलग-अलग चुनाव लड़ रही थीं। दोनों पार्टियों के वोट बंटने का सीधा फायदा कांग्रेस को हुआ था और रंजीत रंजन जीत गई थीं। जबकि इससे पहले2009 में भाजपा और जदयू ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाली रंजीत की हार हुई थी।

सुपौल लोकसभा क्षेत्र में सांसद पप्पू यादव की अच्छी पकड़ है। रंजीत, उनकी पत्नी हैं। हालांकि,इस बार राजद के स्थानीय कार्यकर्ताओं के विरोध के चलते स्थिति बदल गई है। पप्पू यादव मधेपुरा से राजद उम्मीदवार शरद यादव के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। इसके चलते राजद सुपौल में पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन को पूरी तरह सपोर्ट नहीं कर रही है। राजद का एक धड़ा निर्दलीय प्रत्याशी दिनेश प्रसाद यादव के पक्ष में है।

चुनावी गणित
सुपौल संसदीय क्षेत्र में यादव और मुस्लिम वोटरों का दबदबा है। ओबीसी और मुसहर मतदाता भी यहां गेम चेंजर साबित हो सकते हैं। यहां वोटरों की कुल संख्या 1,279,549 है। इसमें 672,904 पुरुष और 606,645 महिला वोटर्स हैं।सुपौल सीट के तहत विधानसभा की 5 सीटें आती हैं- निर्मली, पिपरा, सुपौल, त्रिवेणीगंज और छत्तापुर। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में इनमें से 3 जदयू, एक पर राजद और एक सीट पर भाजपा को जीत मिली थी।

स्थानीय मुद्दे
नेपाल से सटे होने के चलते और कोसी नदी की वजह से हर साल सुपौल में बाढ़ से भारी तबाही होती है। यही वजह है कि बरसात के मौसम में 40 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को पलायन करना पड़ता है। इसके अलावा रेल सेवा के अभाव के चलते लोगों को काफी परेशानी होती है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुपौल काफी पिछड़ा है। उद्योग-धंधे नहीं होने की वजह से हर साल सैकड़ों लोग यहां से पलायन करने को मजबूर हैं।


सुपौल सीट एक नजर-

साल जीते हारे
2009 विश्व मोहन कुमार(जदयू) रंजीत रंजन(कांग्रेस)
2014 रंजीत रंजन(कांग्रेस) दिलेश्वर कामत(जदयू)
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