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नोटबंदी/ नए बड़े नोट अब पुरानों से ज्यादा, कैसे रुकेगा कालाधन?



मार्च 2017 तक जारी 2000 के नोटों का मूल्य 6.57 लाख करोड़ था, जबकि नोटबंदी के दौरान 6.32 लाख करोड़ रुपए मूल्य के 1000 के नोट बाजार में थे।
  • नोटबंदी के दो साल, तीन सवाल
  • हजार के पुराने नोटों से ज्यादा कीमत के दो हजार के नोट जारी हुए, इससे कालाधन कैसे कम होगा?
  • क्या 2000 के नोट से कालेधन को बढ़ावा नहीं मिला?
  • जब कालाधन सामने आने की रफ्तार 300% घट गई तो नोटबंदी का क्या फायदा?

Dainik Bhaskar

Sep 22, 2018, 12:48 PM IST

नई दिल्ली. नवंबर 2018 में नोटबंदी को दो साल पूरे होने जा रहे हैं। सरकार और भाजपा नोटबंदी को सबसे बड़ा और अच्छा कदम बता रही है, जबकि आर्थिक विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि इतना बड़ा पहाड़ खोदने के बाद भी मिला कुछ नहीं। और भी कई सवाल हैं। इन्हीं सवालों के जवाब सामने रख रहा है दैनिक भास्कर प्लस एप। जानिए आखिर नोटबंदी से देश, सरकार, अर्थव्यवस्था और आम आदमी को क्या मिला? क्या उम्मीद के अनुसार ब्लैकमनी पकड़ी गई? क्या नकली नोटों पर लगाम लगी? 

 

500 और 1000 के नोटों को हटाने का बड़ा मकसद कालेधन और नोटों की जमाखोरी पर लगाम लगाना था। नोटबंदी के बाद जारी हुए 2000 के नोटों की संख्या मार्च 2017 तक 328.5 करोड़ थी। इनका मूल्य 6 लाख 57 हजार करोड़ रुपए होता। देखा जाए तो यह आंकड़ा नोटबंदी के दौरान सर्कुलेशन में मौजूद 1000 रुपए के नोटों के मूल्य 6.32 लाख करोड़ रुपए से कहीं ज्यादा है। सरकार कहती है कि बड़े नोटों से कालाधन बढ़ता है। फिर पुराने हजार के नोटों से ज्यादा कीमत के दो हजार के नोट जारी करने से कालाधन कम कैसे हो गया?

 

इसके अलावा नोटबंदी के वक्त कुल करंसी में  500 और 1000 रुपए के नोटों की हिस्सेदारी 86 फीसदी थी, नोटबंदी के अगले साल यानी दिसंबर 2017 में 500 और 2000 के नोटों की हिस्सेदारी 90 फीसदी से ऊपर चली गई। यहां सवाल उठता है कि आखिर बड़े नोट पहले से ज्यादा ही जारी करने थे तो फिर नोटबंदी का मकसद क्या था? क्या 2000 के नोट से कालेधन को बढ़ावा नहीं मिला?

 

अप्रैल-18 में फिर से कैश की किल्लत सामने आई। इसके बाद सरकार ने 2000 के नोटों का सर्कुलेशन घटाना शुरू किया। कई आर्थिक और बैंकिंग विशेषज्ञों के मुताबिक 2000 के नोटों के जरिए ब्लैकमनी जमा करना ज्यादा आसान है। यह 500-1000 के नोटों की तुलना में संख्या में कम और कीमत में ज्यादा बैठते हैं।

 

आरबीआई की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े
कुल करंसी
: 15.41 लाख करोड़ रुपए   
नोटबंदी के बाद वापस आए नोटों का मूल्य : 15.31 लाख करोड़ रुपए
बैंकों तक नहीं लौटे नोटों का मूल्य : 10,000 करोड़ रुपए

 

 

 

नोटबंदी से पहले कालाधन सरेंडर करने की जो योजना थी, उसमें 1 जून 2016 से सितंबर 2016 तक इस राशि से तीन गुना से भी ज्यादा 67,382 करोड़ रुपए आए थे। सवाल उठता है कि नोटबंदी से पहले की योजना में ही भारी सफलता मिली तो बाद में ऐसा क्यों नहीं हुआ? नहीं भी हुआ तो नोटबंदी के बाद जो कालाधन सामने आने की रफ्तार बढ़नी थी, वह बढ़ने की बजाए 300 फीसदी घट क्यों गई? रफ्तार घट ही गई तो फिर नोटबंदी का फायदा क्या हुआ?

 

नोटबंदी के बाद आरबीआई के पास 500 रुपए का नया एक भी नोट ही नहीं था
दूरदर्शिता का अभाव इसे कहते हैं। आरबीआई को पता था नोटबंदी होने वाली है। 2000 के नोट छपने शुरू हो चुके थे। फिर भी पुराने 500 और 1000 के नोटों का स्टॉक बहुत ज्यादा था, जबकि नए 2000 के नोट बहुत कम। 500 रुपए के नए नोट तो थे ही नहीं। यही वजह थी कि पूरा देश नोटबंदी के तीन महीने बाद तक करंसी को तरसता रहा। 

 

 

नोटबंदी के दिन तक आरबीआई के पास बंद किए जाने वाले 1000 रुपए के 913.14 करोड़ नोटों का स्टॉक था और पुराने 500 रुपए के 2276 करोड़ नोट मौजूद थे। इनकी कीमत क्रमशः 9 लाख 13 हजार करोड़ और 11 लाख 38 हजार करोड़ रुपए होती है। वहीं नए जारी किए जाने वाले 2000 रुपए के महज 247 करोड़ नोट ही स्टॉक में मौजूद थे। इनकी कीमत 4.94 लाख करोड़ रुपए होती है। 500 रुपए का एक भी नया नोट नोटबंदी के दिन तक आरबीआई के स्टॉक में मौजूद नहीं था।

 

8 नवंबर 2016 को आरबीआई का कैश स्टॉक

नोट संख्या कीमत
1000 रुपए 913.14 करोड़  9.13 लाख करोड़ रुपए
500 रुपए (पुराना) 2,276 करोड़  11.38 लाख करोड़ रुपए
2000 रुपए 247.32 करोड़ 4.94 लाख करोड़ रुपए 
500 रुपए (नया) 00 00

 

 

500 रुपए के कितने नोट लौटे, कितने नहीं, इसी का नहीं पता
नोटबंदी के दौरान सर्कुलेशन में मौजूद कुल नोटों में 500 और 1000 के नोटों की हिस्सेदारी 86.4 फीसदी थी। 500 रुपए के 1,716.5 करोड़ नोट बाजार में थे। इनकी कीमत 8.58 लाख करोड़ रुपए थी। वहीं 1000 रुपए को 685 करोड़ नोट सर्कुलेशन में थे। इनकी कुल कीमत 6.86 लाख करोड़ रुपए थी। रिजर्व बैंक की अगस्त-18 में आई सालाना रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के बाद 15.31 लाख करोड़ रुपए वापस आए। 

 

नोटबंदी के वक्त सर्कुलेशन में मौजूद 500-1000 के नोट

नोट संख्या कीमत
500 1,716.5 करोड़ 8.58 लाख करोड़ रुपए
1000 685.8 करोड़ 6.86 लाख करोड़ रुपए 

(नोटबंदी के दौरान मिला शुरुआती आंकड़ा)

 

आरबीआई द्वारा 2017 में जारी रिपोर्ट में मार्च-2016 तक सर्कुलेशन में मौजूद 1000 रुपए के नोटों की संख्या 632.6 करोड़ बताई थी। आरबीआई के मुताबिक इनमें से केवल 8.9 करोड़ नोट वापस नहीं लौटे, इनकी कीमत 8,900 करोड़ रुपए होती है। जबकि नोटबंदी की घोषणा नवंबर-16 में हुई। इस दौरान कहीं ज्यादा 1000 के नोट बाजार में मौजूद थे। इसी तरह 500 रूपए के कितने नोट वापस आए इसकी जानकारी भी आरबीआई ने न नई रिपोर्ट में दी है ना ही पुरानी रिपोर्ट में। 

 

नोटबंदी के बाद आए 500-2000 के नोट

नोट संख्या कीमत
500  1546.9 करोड़ 7.73 लाख करोड़ रुपए
2000 336.3 करोड़ 6.72 लाख करोड़ रुपए

(मार्च 2018 तक)

 

10 नवंबर से 19 दिसंबर 2016 के दौरान आरबीआई ने 2000 और 500 रूपए के 220 करोड़ नोट जारी किए। नोटबंदी के बाद जारी हुए 2000 के नोटों की संख्या मार्च 2017 तक 328.5 करोड़ थी। इनका मूल्य 6 लाख 57 हजार करोड़ रुपए होता है। मार्च 2017 तक बाजार में मौजूद 500 के नोटों की संख्या 588.2 करोड़ रुपए थी। इनकी कीमत 2 लाख 94 हजार करोड़ थी।

 

 

सहकारी बैंकों में हुआ खेल

नाबार्ड द्वारा एक आरटीआई में दी गई जानकारी के अनुसार नोटबंदी के दौरान 10 जिला सहकारी बैंकों में सबसे ज्यादा नोट बदले गए, उनके अध्यक्ष भाजपा, कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी के नेता हैं। नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) द्वारा दिए गए आरटीआई के जवाब के अनुसार देश के 370 डीसीसीबी में 10 नवंबर से 31 दिसंबर, 2016 के बीच 22,270 करोड़ रुपए की राशि के 500 और 1000 रुपए के नोट जमा हुए। 370 सहकारी बैंकों में जमा हुई 22,270 करोड़ रुपए की राशि का 18.82 प्रतिशत यानी करीब 4,191.39 करोड़ रुपए उन 10 बैंको में जमा हुए, जिनके अध्यक्ष विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता हैं। रिकॉर्ड के मुताबिक इनमें से 4 बैंक गुजरात, 4 महाराष्ट्र, 1 हिमाचल प्रदेश और 1 कर्नाटक के हैं।  इन बैंकों की सूची में सबसे ऊपर अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक (एडीसीबी) है, जिसके निदेशक भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और अध्यक्ष भाजपा नेता अजयभाई एच पटेल हैं। इस बैंक में नोटबंदी के दौरान सर्वाधिक 745.59 करोड़ मूल्य के प्रतिबंधित नोट जमा किए गए।

 

‘सरकार के दावे गलत’

ऑल इंडिया बैंक इम्प्लॉई एसोसिएशन के वाइस प्रेसिडेंट विश्वास उटागी बताते हैं कि जिन वजहों से नोटबंदी का कदम उठाया गया था उनमें से एक भी पूरा नहीं हुआ। ब्लैकमनी के स्रोत और बढ़ गए हैं। नोटबंदी को लेकर सरकार के दावे गलत हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह कदम बड़ी आपदा जैसा था।

 

उटागी कहते हैं कि आरबीआई के मुताबिक 99.3 फीसदी नोट वापस आ गए हैं। लेकिन इन नोटों में आरबीआई ने को-ऑपरेटिव बैंकों में नोटबंदी के दौरान जमा हुए पैसों को शामिल नहीं किया है। अगर उस पैसे को भी इसमें शामिल किया जाए तो आंकड़ा 100 फीसदी के पार चला जाएगा। को-ऑपरेटिव बैंकों को जून 2017 तक नोटबंदी की पूरी प्रक्रिया से बाहर रखा गया। इस तरह देखें तो वापस आए नोटों को लेकर आरबीआई का अनुमान गलत है और सरकार के सभी दावे झूठे हैं। 

 

नेपाल-भूटान में अटके पड़े हैं 3300 करोड़ रुपए 

नेपाल और भूटान में लंबे अरसे से भारतीय करंसी नोट चलते रहे हैं। कई रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों के मुताबिक इन दोनों पड़ोसी देशों के बैंकिंग सिस्टम में 500 और 1000 रुपए के नोटों के तौर पर 3300 करोड़ रुपए की भारतीय करंसी मौजूद है। अकेले नेपाल में 3200 करोड़ रुपए होने का अनुमान है। लेकिन इस पैसे को वापस लाने में सरकार दिलचस्पी नहीं ले रही है। न ही इसका कोई सही-सही आंकड़ा जारी किया गया है।

 

जाली करंसी पर भी लगाम नहीं
रिजर्व बैंक की रिपोर्ट देखें तो पता चलता है कि अर्थव्यवस्था में नकली नोटों के आने का सिलसिला बना हुआ है। नोटबंदी के बाद 50 और 100 के नकली नोटों की संख्या में सबसे ज्यादा इजाफा हुआ है। 2015-16 में 50 रुपए के 6,453 नकली नोट पकड़े गए थे। 2016-17 में यह आंकड़ा बढ़कर 19,222 और 2017-18 में 23,447 पर पहुंच गया। 

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