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छत्तीसगढ़ चुनाव / राजनीति के कुछ मिथक इस बार टूट गए, कुछ बने रह गए

  • नेता प्रतिपक्ष इस बार जीत गए, पर एक बार फिर विधानसभा अध्यक्ष नहीं बचा सके कुर्सी
  • कांग्रेस के टीएस सिंहदेव ने बरकरार रखा जीत का सिलसिला, गौरीशंकर अग्रवाल की हार

Dainik Bhaskar | Dec 11, 2018, 10:20 PM IST

मोहनीश श्रीवासतव/ रायपुर.  छत्तीसगढ़ की राजनीति में तमाम अजीब से मिथक प्रचलित हैं। यह सारे मिथक छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से 2003 में हुए पहले चुनाव में प्रचलित हुए और फिर जारी रहे। इसमें नेता प्रतिपक्ष जो होता है, उसके बाद वह चुनाव नहीं जीत पाता। यही मिथक विधानसभा अध्यक्ष को लेकर भी है। हालांकि इस बार के चुनाव में कुछ मिथक टूट गए। नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव ने अपनी जीत को बरकरार रखा और अंबिकापुर सीट अपने नाम कर ली। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष रहे गौरीशंकर अग्रवाल ने मिथक को सही साबित किया अौर वे कसडोल से अपनी कुर्सी नहीं बचा सके। Advertisement

जब विधानसभा अध्यक्ष जीते, तो सरकार चली गई

  1. छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद पं. राजेंद्र प्रसाद शुक्ल विधानसभा अध्यक्ष बने। इसके बाद जब वर्ष 2003 में पहला चुनाव हुए तो पं. शुक्ल चुनाव जीत गए, लेकिन कांग्रेस की सरकार चली गई। तब चुनाव जीत कर आई भाजपा ने प्रेम प्रकाश पांडेय को विधानसभा अध्यक्ष बनाया। 2008 के चुनाव में वह हार गए। 

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  2. उनके बाद 2008 से 2013 की सरकार में धरमलाल कौशिक विधानसभा अध्यक्ष थे। 2013 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2013 से 18 की सरकार में गौरीशंकर अग्रवाल विधानसभा अध्यक्ष थे। इस चुनाव में वह अपनी कसडोल सीट नहीं बचा सके और शकुंतला साहू के सामने हार का सामना करना पड़ा। 

  3. ...और टीएस बाबा ने ताेड़ दिया मिथक

    मध्य प्रदेश से अलग होकर जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनी तो विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने आदिवासी नेता नंद कुमार साय को नेता प्रतिपक्ष बनाया। इसके बाद प्रदेश के पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें अजीत जोगी के खिलाफ मरवाही सीट से उम्मीदवार बनाया, लेकिन वह जीत नहीं दर्ज कर सके। 

  4. फिर 2003 में भाजपा की सरकार बनी और कांग्रेस ने महेंद्र कर्मा को नेता प्रतिपक्ष बनाया, पर 2008 के चुनाव में वह भाजपा के भीमा मंडावी से हार गए। 2008 में कांग्रेस ने रविंद्र चौबे को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी, लेकिन 2013 के चुनाव में वह भी अपनी सीट नहीं बचा सके। 

  5. इसके बाद सबकी नजर इस चुनाव में नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव पर लगी थी। इसका बड़ा कारण कि उन्हें कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी माना जा रहा है। उन्होंने पूर्व के सारे मिथकों को तोड़ते हुए अपनी सीट से जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया। उन्होंने न केवल अपनी सीट बचाई, बल्कि भारी मतों (39624 वोटों) से जीत दर्ज की। 

  6. पहले हारे, पर इस बार पंचायत मंत्री ने बचा ली अपनी सीट

    कुछ ऐसे ही मिथक प्रदेश में पंचायत मंत्री की जिम्मेदारी संभालने वाले विधायक के साथ-साथ भी चल रहे थे। भाजपा की कुरूद विधानसभा से प्रत्याशी अजय चंद्राकर खुद इसका शिकार बने और 2008 का चुनाव हार गए। हालांकि इस बार उन्होंने इस मिथक को तोड़ दिया। पंचायत मंत्री होने के बावजूद अजय चंद्राकर ने जीत दर्ज की। हालांकि इससे पहले अजीत जोगी की सरकार में अमितेष शुक्ल को पंचायत मंत्री बनाया गया और वह अगला चुनाव हार गए। इसके बाद रामविचार नेताम पंचायत मंत्री बनाए गए। विधानसभा चुनाव से सालभर पहले 2012 में नेताम और हेमचंद यादव के प्रभार बदल दिए गए। हेमचंद को पंचायत मंत्री बनाया गया था।  2013 में नेताम और यादव दोनों ही चुनाव हार गए। 

  7. इन सीटों ने बदला इतिहास

    2013 के चुनाव तक अभनपुर में धनेंद्र साहू और चंद्रशेखर साहू पांच बार के प्रतिद्वंद्वी रहे। हर बार ये बदले गए। इस चुनाव में भी दोनों आमने सामने थे, लेकिन इस बार फिर से धनेंद्र साहू के हाथ जीत लगी।  बिलासपुर की बिल्हा सीट पर भी सियाराम कौशिक और धरमलाल कौशिक एक-एक बार विधायक बनते हैं।  इस बार सियाराम कौशिक कांग्रेस का साथ छोड़ अजीत जोगी की पार्टी से मैदान में हैं, लेकिन जीत का सेहरा फिर से धरमलाल कौशिक के सिर बंधा।  कोरबा सीट के बारे में भी कहा जाता है कि वहां जिस पार्टी का विधायक होता है, उसकी सरकार नहीं होती। कोरबा से पिछले तीन चुनाव में कांग्रेस के जयसिंह अग्रवाल विधायक हैं, लेकिन सरकार भाजपा की बनी। इस बार कोरबा से कांग्रेस के जयसिंह अग्रवाल जीते और सरकार भी कांग्रेस बनाने जा रही है। 

  8. यहां पर कायम रही पुरानी बात

     जांजगीर-चांपा में एक बार कांग्रेस के मोतीलाल देवांगन जीतते हैं तो एक बार भाजपा के नारायण चंदेल। इस बार भी दोनों नेता आमने सामने थे। पहले की तरह इस सीट पर एक-एक बार जनता का मौका देने का सिलसिला जारी रहा और जीत भाजपा के नारायण चंदेल को मिली। यही हाल पाली तानाखार सीट का भी है। यहां से भी कांग्रेस के मोहित राम जीते हैं। 

    बघेल की बातों पर बहस छिड़ी, पर बात सही निकली

    पीसीसी के कार्यकारी अध्यक्ष रहे रामदयाल उइके ने चुनाव के दौरान ही भाजपा में प्रवेश कर लिया। इसके बाद पीसीसी चीफ भूपेश बघेल ने यह कहकर नई बहस छेड़ दी कि उइके जिस पार्टी में रहते हैं, उसकी सरकार नहीं बनती। उइके जब भाजपा के विधायक थे, तब मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। राज्य निर्माण के बाद 2000 में उइके कांग्रेस में शामिल हो गए और अजीत जोगी के लिए मरवाही सीट छोड़ दी। जोगी ने उन्हें पाली तानाखार से कांग्रेस का टिकट दिया। रामदयाल उइके लगातार तीन बार से पाली तानखार सीट से विधायक रहे, लेकिन सरकार भाजपा की बनी। अब वो भाजपा में हैं और कांग्रेस सरकार बनाने की तैयारी में।   

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