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विधानसभा चुनाव/ कांग्रेस को किसानों ने जिताया, भाजपा को महिलाओं ने हराया

  • एकै साधे सब सधै : कर्जमाफी बनी सत्ता की सीढ़ी साहू, कुर्मी और आदिवासी साध जातीय संतुलन बैठाया
  • सब साधे सब जाय : न चावल काम आए न मोबाइल किसान बहुल राज्य में घोषणा पत्र में उन्हीं को भूल गए

Dainik Bhaskar

Dec 12, 2018, 03:15 AM IST

रायपुर . 15 साल तक छत्तीसगढ़ में सत्ता पर काबिज होने के बाद आखिर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस का वनवास खत्म हुआ।

 

भाजपा की हार का आलम ये है कि आदिवासी बहुल सरगुजा और बस्तर में तो पार्टी खाता तक नहीं खोल सकी। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने अलग पार्टी बना ली थी, ऐसा अंदेशा लगाया जा रहा था कि वो कांग्रेस को ही नुकसान करेंगे। पर कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं के दम पर जीत दर्ज कर ली। जानिए वो प्रमुख कारण जिनसे पलटी पूरी बाजी-

 

ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस को 42 सीटें : 53 ग्रामीण सीटों में से कांग्रेस 42 जीती। वजह दो घोषणाएं- कर्जमाफी और धान का समर्थन मूल्य बढ़ाकर 2500 रुपए करना।

 

एससी सीटों पर भाजपा 9 से 1 पर सिमटी :  एससी की 10 सीटों में से कांग्रेस 9 जीती। रमन ने 4% आरक्षण दिया, आबादी 13% है। 8 सामान्य सीटों पर भी एससी 15% हैं।

 

महिलाएं जहां वोटिंग में आगे, वहां भाजपा हारी : शराबबंदी के वादे ने महिलाआें का ध्यान खींचा। जिन 24 सीटों पर महिलाओं की वोटिंग पुरुषों से ज्यादा रही, उनमें से 22 कांग्रेस जीती।

 

ओबीसी चेहरों के दम पर कांग्रेस को 35 सीटें :  51 प्रतिशत वोटर ओबीसी हैं। कांग्रेस ने साफ कर दिया था कि सीएम आेबीसी वर्ग से ही होगा। दूसरी ओर, सवर्ण रमन सिंह थे।

 

इस चुनाव में ये पहली बार हुआ

 

प्रदेश में पहली बार किसी पार्टी ने इतनी सीटें जीतीं। कांग्रेस ने 10% से ज्यादा अंतर से जीत हासिल की। विपक्षी ददल सिर्फ 15 सीटों पर सिमटा। तीसरी शक्ति के रूप में जोगी-बसपा गठबंधन ने 7 सीटें हासिल कीं। भाजपा का गढ़ बन चुके जशपुर में पार्टी का सफाया। सरगुजा संभाग में भाजपा एक भी सीट पर जीत नहीं पाई है। पति-पत्नी के रूप में अजीत जोगी व डॉ. रेणु जोगी सदन में होंगे। आजादी के बाद से कांग्रेस के गढ़ कोटा में दूसरे दल की जीत। 59000 से ज्यादा लीड के साथ जीत का रिकॉर्ड बना।

एससी-एसटी बहुल 39 सीटों में से 32 पर कांग्रेस ने बनाई पैठ सतनाम सेना के प्रमुख का पार्टी में शामिल होने का लाभ मिला

 

ओबीसी बड़ा फैक्टर  :  49 सामान्य सीटों में से ज्यादातर पर विशेष रूप से मैदानी क्षेत्रों में इनका प्रभाव है। पिछले चुनावों तक यह वर्ग भाजपा के साथ था, इस बार ये वर्ग कांग्रेस के साथ खड़ा रहा।। दरअसल, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस-भाजपा के नेता ओबीसी वर्ग से ही हैं। प्रदेश में करीब 52 फीसदी ओबीसी हैं। इसमें शामिल 95 से अधिक जातियों के दावे भी अलग-अलग हैं।

 

ओबीसी में भी साहू की आबादी लगभग 30 फीसदी के बीच है, जबकि यादव आठ से नौ फीसदी, मरार, निषाद व कुर्मी की आबादी करीब चार से पांच फीसदी है। इस बार कांग्रेस ने साहू और कुर्मी नेताओं को टिकट देकर महत्व दिया। नतीजतन ये वर्ग कांग्रेस के साथ खड़े हो गए। 

 

एससी वर्ग में सेंधमारी :  प्रदेश में 12.81 फीसदी हिस्सा अनुसूचित जाति (एससी) का है। वैसे तो वर्ग के लिए 10 सीटें आरक्षित हैं, पर करीब 10 सामान्य सीटों पर भी इनका प्रभाव है। इनमें से 9 सीटें भाजपा के पास थीं, लेकिन इस बार कांग्रेस ने बढ़त बनाई है। सतनाम सेना के प्रमुख रहे बालदास का कांग्रेस में शामिल होना पार्टी के लिए फायदेमंद रहा।

 

कांग्रेस ने 6 सीटों पर आसानी से अंतर हासिल कर लिया। कांग्रेस को सराईपाली, डोंगरगढ़, अहिवारा, सारंगढ़, नवागढ़, आरंग और बिलाईगढ़ में जीत के लायक बढ़त मिल गई। सभी सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशियों के पास  6-10 हजार की लीड थी। वहीं भाजपा केवल मस्तूरी, मुंगेली और बसपा के खाते में पामगढ़ जाते दिखा।

 

आदिवासी कांग्रेस की ओर गए :   राज्य की आबादी का 32 फीसदी हिस्सा एसटी वर्ग का है। इसमें करीब 42 जातियां शामिल हैं। एसटी वर्ग का सर्वाधिक प्रभाव बस्तर, सरगुजा व रायगढ़ क्षेत्र में है। अन्य क्षेत्रों में भी इनकी आबादी 10% से कम नहीं है। राज्य की 29 सीटें इस वर्ग के लिए आरक्षित हैं, इनमें से सिर्फ 11 भाजपा के पास थीं।

 

करीब 35 सीटों पर एसटी आबादी 50% से अधिक है। इस बार कांग्रेस ने लीड बढ़ाई है। जशपुर-कांकेर क्षेत्र में हुई पत्थलगड़ी के बाद आदिवासी सरकार से नाराज चल थे। राहुल गांधी ने जब कांग्रेस सरकार बनने पर आदिवासियों के अधिकारों का हनन न होने की बात कही, इसके बाद वर्ग कांग्रेस के पक्ष में खड़ा हो गया।

 

किसान कर्जमाफी : कांग्रेस का सबसे बड़ा चुनावी दांव किसान कर्जमाफी और 2500 रुपए धान का समर्थन मूल्य तथा बिजली बिल आधा करने की घोषणा रही। सरकार द्वारा धान खरीदी शुरू करने के बाद भी किसानों ने धान नहीं बेचा। इसके बाद भाजपा बैकफुट पर चली गई।

 

नक्सल मामला : कांग्रेस लगातार झीरम कांड को उठाती रही। नक्सल इलाकों में हो रही घटनाओं के बाद से बस्तर में लोग भाजपा में कमियां खोजने में लग गए थे। 15 साल में हुई नक्सली वारदातों में महिलाएं सबसे ज्यादा टारगेट बनीं। पुरूषों को भी नक्सलियों और पुलिस दोनों की यातना झेलनी पड़ी थी।

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