डीबी ओरिजिनल / नेहरू के निधन के बाद बाल दिवस मना तो देश में मायूसी थी; उस दौर की साक्षी 3 हस्तियों ने बताए किस्से

  • नेहरू के निधन के बाद 1964 में 14 नवंबर को देश में मना बाल दिवस कैसा था? पद्मश्री पुष्पेश पंत, वर्ल्ड लॉफ्टर योग के संस्थापक डॉ मदन कटारिया और पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राजीव लोचन से जानिए
  • संयुक्त राष्ट्र ने 20 नवंबर को घोषित किया है बाल दिवस लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू जी की याद में भारत में 14 नवंबर को मनाया जाता है

Dainik Bhaskar

Nov 14, 2019, 08:04 AM IST

अक्षय बाजपेयी (ओरिजिनल डेस्क). आज बाल दिवस (14 नवंबर) है। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिवस कोबाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। वे बच्चों से बहुत प्यार करते थे। बच्चे उन्हें चाचा कहकर बुलाते थे।नेहरू के निधन के बाद से 14 नवंबर को बाल दिवस मनाते हुए आज 55 साल हो चुके हैं। इस मौके पर दैनिक भास्कर APPने जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर पद्मश्री पुष्पेश पंत, वर्ल्ड लॉफ्टर योग के संस्थापक डॉ मदन कटारिया और पंजाब यूनिवर्सिटी के हिस्ट्री के प्रोफेसर राजीव लोचन से बात कर जाना कि पंडित नेहरू के निधन के बाद 1964 में मना बाल दिवस कैसा था? उस दौर में क्या होता था? इनके सबके साथ ही जानिए उस दौर के कुछ दिलचस्प किस्से भी।

देश मायूसी में डूबा था

  • 1964 में हुए बाल दिवस के वक्त मेरी उम्र 17 वर्ष की थी और मैं उस समय कॉलेज में पढ़ रहा था। यादें आज भी ताजा हैं। तब बाल दिवस का कोई उत्साह देश में नहीं था क्योंकि देश एक निराशा में डूबा था। 1962 में चीन हम पर भारी पड़ा था। जिससे हमारा आत्मविश्वास कम हुआ था। देश सूखे और अनाज की समस्या से जूझ रहा था। ऐसे में बाल दिवस को लेकर उत्साह जैसी कोई बात नहीं थी।
  • 1964 से लेकर 1971 तक ऐसा ही समय रहा। 1966 में लालबहादुर शास्त्री के देहांत के बाद इंदिराजी ने देश की कमान संभाली। 1971 में हमने पाकिस्तान को धूल चटाई। नया बांग्लादेश बना। देश में हरित क्रांति आई। जिससे देश कृषि उत्पादन बढ़ा। इसके बाद देश में थोड़ा उत्साह लौटा। बाल दिवस पर स्कूलों में उस समय भी लड्‌डू बांट दिए जाते थे। खेद-कूद के थोड़े कार्यक्रम हो जाते थे। छुट्‌टी हो जाती थी।
  • मुझे लगता है कि वास्तव में बच्चों के लिए जो काम होना चाहिए वो तो आज तक बाकी है। कितने बच्चे अशिक्षित हैं, कुपोषित हैं। हम सिर्फ दिवस मनाने की परंपरा निभा रहे हैं। असल में जो काम जमीन पर होना चाहिए वो नहीं हो पा रहा।

आयोजन हुए लेकिन बाल दिवस का महत्व नहीं पता था

  • मैं उस समय नौ साल का था। हम फिरोजपुर में रहते थे। बाल दिवस स्कूल में ही मनाया गया था। हालांकि किसी ने हम बच्चों को इसके महत्व के बारे में नहीं बताया और पूरा ध्यान एक तरह से सेलिब्रेशन की ओर रहता था। बच्चे देशभक्ति के गीत गाते थे, नेहरू टोपी पहनकर और हाथों में तिरंगे लेकर मार्च करते थे।
  • मुझे इससे पहले की एक रोचक घटना भी याद आती है कि जिस समय नेहरू जी का निधन हुआ, तो उसकी जानकारी रेडियो के माध्यम से सभी को लगी। हमारी गली में रेडियो एक हलवाई की दुकान पर लगा हुआ था और वहां से ही सभी को अपने प्रिय प्रधानमंत्री की मृत्यु का समाचार मिला।
  • उस खबर को फैलाने में हमारा एक हमउम्र दोस्त भी था जिसने आकर इस बारे में बताते हुए, बड़ी अजीब से बात कही कि- चाचा नेहरू का निधन वहां हलवाई की दुकान पर हो गया है! सब लोग सुनकर बड़े हैरान हुए कि ये क्या बात कर रहा है? नेहरू जी यहां कैसे आ गए? फिर कुछ बड़े लोगों ने समझाया किबेटा नेहरू जी का निधन तो दिल्ली में हुआ है, हलवाई की दुकान पर नहीं। इसके बाद सब लोगों को मामला समझ आया और सबने श्रद्धांजलि अर्पित की'।

सैनिक का बेटा था, इसलिए पीएम ने गोद में लिया था

  • 1964 के पहले बाल दिवस काफी बड़े रूप में मनाया जाता था। तब दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में फंक्शन होता था, जहां स्कूल के बच्चों को इकट्‌ठा कर अलग-अलग कार्यक्रम करवाए जाते थे। 1964 में नेहरू जी के देहांत के बाद बाल दिवस उनकी याद में मनाया जाने लगा। फिर बाल दिवस का स्वरूप भी बदला। कार्यक्रम बड़े स्तर पर न होकर स्कूलों के स्तर पर होने लगा।
  • मुझे आज भी एक किस्सा याद है। 1963 में मैं जबलपुर के सेंट जोसेफ स्कूल में पढ़ा करता था। तब नेहरू जी बाल दिवस पर हमारे स्कूल में आए थे। मेरे पिताजी फौज में थे। 1962 में हम चीन से हारे थे। तब सैनिकों का हौंसला हर जगह बढ़ाया जा रहा था। मैं सैनिक का बेटा था, ये बात नेहरू जी को पता चली तो उन्होंने मुझे गोद में लिया और थोड़ा प्यार किया।

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