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छत्रपति हत्याकांड/ राम रहीम के खिलाफ पत्रकार के बेटों ने 16 साल तक लड़ी कानूनी जंग, किसी भी वकील ने नहीं ली फीस

Dainik Bhaskar | Jan 17, 2019, 07:07 PM IST
-- पूरी ख़बर पढ़ें --

  • छत्रपति के बड़े बेटे अंशुल ने कहा-पिता के एडवोकेट दोस्त लेखराज ढोट ने इस कानूनी लड़ाई मेंकी मदद
  • बोले-केस लड़ने वाले वकीलों को राम रहीम ने लालच और धमकी दी, लेकिन वह नहीं झुके

Dainik Bhaskar

Jan 17, 2019, 07:07 PM IST

सिरसा (मनोज कौशिक/कुलदीप शर्मा).पिता की हत्या के बाद पत्रकाररामचंद्रछत्रपति के बड़े बेटे अंशुल नेजब 2002 में कानूनी लड़ाई शुरू की तो सबसे बड़ी चुनौती राम रहीम के खिलाफ मजबूत वकील खड़ा करने की थी।क्योंकि तबउसकी पहुंच सत्ता तक थी। अकूतपैसा औरपावर था। अंशुल बताते हैं किलेकिन वकीलों ने साथ दिया। तभी ये लड़ाई मुकाम तक पहुंच सकी। लोअर कोर्ट से लेकर, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक वकीलों ने बिना पैसे केस लड़ा। आखिर गुरुवार कोपंचकूला की सीबीआई कोर्ट से रामरहीम समेत चारों आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

अंशुल बताते हैं,'सबसे पहलेपिता के दोस्त एडवोकेट लेखराज ढोट ने आकर उनके कंधे पर हाथ रखा और आखिर तक केस लड़ने का वादा किया। 10 नवंबर 2003 को पुलिस ने चार्जशीट पेश कर सिरसा कोर्ट में ट्रायल शुरू कर दिया। यहां पर लेखराज ढोट ने केस लड़ा।'


वह बताते हैं किपुलिस ने तब अपनी चार्जशीट में गुरमीत राम रहीम को आरोपी नहीं बनाया था। इसलिए वे सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे। ऐसे में उन्हें हाईकोर्ट की तरफ रुख करना पड़ा। हाईकोर्ट में लेखराज ढोट ने उनकी मुलाकात एडवोकेट अश्वनी बख्शी, राजीव गोदारा से करवाई।

बातचीत हुई तो उन्होंने बताया कि यदिहमारा केस एडवोकेटआरएस चीमा लेने को तैयार हो जाएं तो गुरमीत राम रहीम का मुकाबला किया जा सकता है।अश्वनी बख्शी ने मदद का आश्वासन दिया और आरएस चीमा से बातचीत की। आरएस चीमा ने पूरी कहानी सुनने के बाद भरोसा दिया कि आपके पिता जांबाज पत्रकार थे। सच लिखने को लेकर शहीद हुए हैं। उनका केस वे लड़ेंगे। आरएस चीमा ने केस लड़ा और इसके बदले एक पैसा नहीं लिया।

अंशुल कहते हैं किइसके बाद गुरमीत राम रहीम सीबीआई जांच पर स्टे के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। उसे स्टे मिल गया। स्टे तुड़वाने के लिए वे भीसुप्रीम कोर्ट पहुंचे। यहां एडवोकेट राजेंद्र सच्चर ने उनका केस लड़ा, उन्होंने भी इसके लिए कोई फीसनहीं ली। आखिर में1 साल बाद नवंबर 2004 को सुप्रीम कोर्ट का स्टे टूट गया और सीबीआई जांच शुरू हुई।

बकौल अंशुल- इस केस में डेरा की ओर से वकीलों को खरीदने का भी प्रयास किया। एक बार एडवोकेट आरएस चीमा ने उन्हें बताया था कि उन्हें डेरे ने कई बार लालच देने की कोशिश की। उन्हें बड़े-बड़े बैग ऑफर (पैसे)किए गए। सीबीआई जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट पेश हुई तो सीबीआई स्पेशल कोर्ट में ट्रायल शुरूहुआ। यहां सीबीआई के वकील एचपीएस वर्मा ने यह केस हाथ में लिया।

वर्मापटियाला से केस को लड़ने के लिए अम्बाला में स्थित सीबीआई कोर्ट में आते थे। तब उनकी कार को एक डेरा समर्थक ने टक्कर मार दी। उन्होंने पुलिस से इसकीशिकायत की। लेकिन कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद एक डेरा समर्थक ने उन्हें जान से मारने की धमकी भीदी। लेकिन वर्मा झुके नहीं और मजबूती से केस को अंजाम तक पहुंचाया।

रामचंद्र के जरिए आया थायौन शोषण मामला सामने
साध्वी यौन शोषण मामले में जो लेटर लिखे गए थे, उन्हीं के आधार पर रामचंद्र ने अपने अखबार में गुरमीत राम रहीम केडेरे के खिलाफखबरें प्रकाशित की थीं। छत्रपति पर पहले दबाव बनाया गया। जब वे धमकियों के आगे नहीं झुके तो 24 अक्टूबर 2002 को उन पर हमला कर दिया गया। 21 नवंबर 2002 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी। उनकी हत्या के मामले में कोर्ट ने 11 जनवरी को राम रहीम समेत चार को दोषी करार दिया है।