मुक्तसर / दादा, पिता और भाई के मौत का कारण कीटनाशक को माना, इसलिए हेयर ने वकालत छोड़ शुरू की ऑर्गेनिक खेती

खेत में लगे पौधों के बारे में जानकारी देते कमलजीत हेयर।

  • शुरू में घर वालों, लोगों और रिश्तेदारों ने मेरा मजाक उड़ाया
  • आज जो लोग मेरे फैसले का मजाक उड़ाते थे अब मेरी तारीफ करते नहीं थकते

Dainik Bhaskar

Jan 21, 2019, 05:29 AM IST

मुक्तसर.पिता जी की महज 53 वर्ष में हॉर्ट अटैक व छोटे भाई की महज 10 साल में ब्रेन ट्यूमर के कारण मौत हो गई थी, जबकि मेरे दादा जी 110 साल की लंबी उम्र जीए थे। पिता व भाई की मौत कुदरती नहीं थी, बल्कि जहरीली खुराक व वातावरण का परिणाम था।

इसलिए मैंने जहरीली खेती से लोगों को बचाने के लिए अपनी अच्छी तरह से चल रहे वकालत के काम को छोड़कर कुदरती खेती को अपनाने का फैसला किया। शुरू में घर वालों, लोगों और रिश्तेदारों ने मेरा मजाक उड़ाया। मेरे फैसले का विरोध भी किया लेकिन मैं पीछे नहीं हटा। आज जो लोग मेरे फैसले का मजाक उड़ाते थे अब मेरी तारीफ करते नहीं थकते हैं। हालात ऐसे हो गए हैं कि लोग मेरे ‘सोहनगढ़ नैचुरल फार्म’ कोदेखने के लिए देश-विदेश से आते हैं।

यदि लोग ऑग्रेनिक तरीके से खेती करें तो इससे न केवल उनकी आमदन बढ़ेगी बल्कि सेहतमंद समाज की स्थापना में भी उनका योगदान बढ़ेगा। यह कहना है युवा वकील से किसान बने कमलजीत सिंह हेयर का।

20 एकड़ में 60 किस्म की फसलें उगा रहे हैं :

मुक्तसर से करीब 20 किलोमीटर दूर गुरु हर सहाए रोड पर बसे गांव सोहनगढ़ रत्तेवाला का रहने वाले कमलजीत सिंह हेयर बताते हैं कि उनके पास 20 एकड़ जमीन है। यहां पर सैकड़ों तरह के वृक्ष लगे हैं। दर्जनों किस्मों की जड़ी बूटियां हैं, 60 किस्म की फसलें एक वर्ष में होती हैं। खेत में कोई केमिकल स्प्रे नहीं की जाती है। खेत में बाहर के वाहनों का आना मना है व न ही खेत में बिजली की सप्लाई होती है।

खेत में ही कंपोस्ट खाद तैयार होती है। जहां आम तौर पर जहरीले केमिकल खेती के माध्यम 50 हजार रुपए प्रति एकड़ के करीब कमाई होती है, वहीं बिना जहर प्रयोग किए दो लाख रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से कमाई करते हैं, परंतु इसके लिए उन्हें अपने खेत के एक-एक पौधे का ख्याल रखना पड़ता है व एक-एक इंच जमीन का कई तरीकों से प्रयोग करना पड़ता है।

बारिश के पानी की हर बूंद को संभालते हैं :हेयर ने बताया कि वे बारिश की हर बूंदाबांदी को भी व्यर्थ नहीं जाने देते। पूरा पानी ड्रेन सिस्टम के माध्यम से एक डिग्गी में इकट्ठा कर लिया जाता है, जिसकी क्षमता 33 लाख लीटर की है व फिर जरूरत के समय स्टोर किए गए पानी का प्रयोग किया जाता है। पशुओं का मल मूत्र भी कुदरती तरीके से खेती के लिए प्रयोग किया जाता है।

उन्होंने अपने खेत में एक-एक इंच जगह का सही प्रयोग किया है। खाल के ऊपर जगह-जगह पर घास फूस से कंपोस्ट खाद तैयार करने के लिए डिग्गी बनाई है। खेत में बने रास्ते के साथ-साथ मुर्गियों के खुड्डे व खुड्डों की छत ऊपर घास व घास के ऊपर अंगूरों की बेलें लगाई हैं।

विलुप्त हो रहे वृक्ष भी हैं फार्म में : खेत में एक जंगल तैयार किया है, जिसमें विलुप्त हो रहे किस्म के वृक्ष सिंबल, हरड़, करोदा, सिम्मी, गूगल, जकरंडा, दंदासा, ईमली, बहेड़ा, कनेर, जमालघोटा, महूआ, कढ़ी पत्ता, चंदन, गोदी, सीता अशोक, कमर्क चाइनीज अमरूद अमरूद, मिरगुंढी, कचनार, मौलसरी, पलाश, ढक्क, हार शिगार, सेब, हिंग, दालचीनी, कजीलिया, अक्क व वन जैसे पौधे शामिल हैं। एडवोकेट हेयर ने बताया कि जहर मुक्त खेती करने के लिए पहले कुदरत पक्षीय होना जरूरी है व उसके बाद पूरी सिखलाई प्राप्त करनी पड़ती है। इसी गांव में अशोक कुमार 6 एकड़ में व गुरबाज सिंह 11 एकड़ रकबे में कुदरती खेती कर रहे हैं।

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