ओडिशा / ग्रामीण खूंटे को ग्राम प्रधान मानते हैं, शुभ कार्यों को करने से पहले इजाजत लेते हैं

प्रतीकात्मक फोटो।

  • खूंट गौंटिया संबलपुर जिले के बामड़ा ब्लॉक के कुसुमी, कंधबलंडा और बेतझरण गांवों की सीमा पर स्थापित है
  • अंग्रेज लेखक उवे स्कोडा की किताब द अघरिया-ए पीजेंट कास्ट ऑन ए ट्राइबल फ्रंटियर नामक पुस्तक में भी जिक्र है

Dainik Bhaskar

Sep 15, 2019, 01:10 PM IST

बामड़ा(संबलपुर). ओडिशा के संबलपुर जिले के बामड़ा ब्लॉक के कुसुमी, कंधबलंडा और बेतझरण गांवों में लोगलकड़ी के खूंटे को ग्राम प्रधानमानते हैं। ग्रामीण शादी-विवाह, पूजा-पाठ जैसे कार्य करने से पहले खूंटे से अनुमति लेते हैं। वहां की मिट्‌टी लाकर ही नेक कार्य की शुरुआत करते हैं। तीनों गांवों के लोग देवता की तरह साल में एक बार खूटें की पूजाकरते हैं। लोग इसे खूंट गौंटिया कहते हैं। ग्राम प्रमुख और उनके परिवार वाले खूंट गौंटिया के प्रमुख सेवादार होते हैं। नुआखाई और रक्षाबंधन के मौके हर साल यहां विशेष पूजा की जाती है।

आजादी के पहले से खूंट गौंटिया

बामड़ा ब्लॉक से 50 किलोमीटर दूर जंगलों के बीच ये तीनों गांव आजादी से पहले बामड़ा रियासत का हिस्सा थे। रियासत के 27वें राजा बासुदेव सुढल देव ने गांव की व्यवस्था चलाने के लिए खूंट गौंटिया की कल्पना की थी। इसका मकसद आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच समन्वय बनाना था। छह फीट लंबा खूंट सरगी लकड़ी से बना है। गांव की सीमा पर स्थापित यह खूंट किसी स्थानीय देवता से कम नहीं है। 

इन गांवों में मुख्य रूप से गोंड, भुइयां व अघरिया समुदाय के लोग रहते हैं। अघरिया इसे खूंट गौंटिया बोलते हैं। भुइयां और गोंड इसे खूंट नायक कहते हैं। खूंट का जिक्र द अघरिया-ए पीजेंट कास्ट ऑन ए ट्राइबल फ्रंटियर नामक पुस्तक में भी मिलता है। इसे अंग्रेज लेखक उवे स्कोडा ने लिखा था। 

कंधबलंडा के ग्राम प्रमुख तुलाराम नायक के मुताबिक, खूंट गौंटिया की परंपरा 200 वर्षों से चली आ रही है। ग्रामीण शुभ कार्य को करने से पहले खूंट गौंटिया को निमंत्रण देते हैं। रक्षाबंधन पर खूंट गौंटिया को राखी भी बांधी जाती है। तीन गांवों में यह परंपरा अब भी जीवित है।

 

किताब जिसमें खूंट गौंटिया का जिक्र किया गया।
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