इंजीनियर्स डे विशेष / ऐसे 10 इनोवेटर्स जिन्होंने दुनिया में देश का नाम किया रोशन

  • विश्वेश्वरैया जी के जन्मदिन, 15 सितंबर को इंजीनियर्स डे मनाया जाता है
  • उन्हें किंग जॉर्ज पंचम ने ब्रिटिश अंपायर की उपाधि दी थी

Dainik Bhaskar

Sep 15, 2019, 12:37 PM IST

यूटिलिटी डेस्क. सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया काजन्मदिवसकोइंजीनियर्स डे के रूप में मनाया जाता है। इन्हें आधुनिक भारत के विश्वकर्मा के रूप में जाना जाता है। भारत रत्न से सम्मानित विश्वेश्वरैया मैसूर के दीवान थे उन्हें किंग जॉर्ज पंचम ने ब्रिटिश अंपायर की उपाधि दी थी। उनके जन्मदिन पर हम आपको ऐसे 10 इंजीनियर और वैज्ञानिकों के बारे में बता रहे हैं, जिन्होंने देश का नाम रोशन किया। यह विज्ञान में जुड़े कई पहलुओं को लोगों तक लाए,जिनसे दुनिया में देश की नई पहचान बनीं।

ये हैं वो 10 वैज्ञानिक जिन्होंने देश का नाम रोशन किया

  1. होमा जहांगीर भाभा : इन्हे भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक माना जाता है

    इन्हें भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक माना जाता है। इन्होंने ही मुम्बई में भाभा परमाणु शोध संस्थान की स्थापना की थी। भाभा का एक प्लेन क्रेश में निधन हुआ था। एक न्यूज वेबसाइट के मुताबिक उस प्लेन क्रैश के लिए अमेरिकन खुफिया एजेंसी जिम्मेदार थी।

    बचपन से ही पढ़ाई में तेज भाभा के लिए उनके घर में ही लाइब्रेरी बनाई गई थी। उनका झुकाव शुरू से ही फिजिक्स और मैथ में था। होमी ने एल्फिस्टन कॉलेज मुंबई और रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से बीएससी किया। साल 1927 में वो इंग्लैंड चले गए जहां उन्होंने कैंब्रिज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। वहां उन्होंने सन् 1930 में ग्रेजुएशन किया और साल 1934 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से ही डाक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की। उन्होंने कॉस्केट थ्योरी ऑफ इलेक्ट्रान का प्रतिपादन करने के साथ ही कॉस्मिक किरणों पर भी काम किया। उन्होंने ‘टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च’ (टीआइएफआर) और ‘भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर’ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वो भारत के ‘एटॉमिक एनर्जी कमीशन’ के पहले अध्यक्ष भी थे। उन्हें भारत सरकार ने 1954 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया।

     

  2. विक्रम साराभाई : कॉस्मिक रे पर की महत्वपूर्ण रिसर्च

    विक्रम साराभाई भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान राष्ट्रीय समिति के प्रथम अध्यक्ष थे। थुम्बा में स्थित इक्वेटोरियल रॉकेट प्रक्षेपण केन्द्र के वे मुख्य सूत्रधार थे। कॉस्मिक रे और अंतरिक्ष पर उनकी रिसर्च के लिए उन्हें पूरी दुनिया में जाना जाता है। साराभाई ने 1947 में अहमदाबाद में ‘भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल)’ की स्थापना की थी।

    1962 में इन्हें इसरो का कार्यभार सौंपा गया। उन्होंने मात्र एक रुपए की सैलरी में काम किया। भारत को अंतरिक्ष में पहुंचाने में इन्होंने होमा जहांगीर भाभा के साथ मिलकर महत्वपूर्ण योगदान दिया। देश के पहले प्रबंधन संस्थान इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (अहमदाबाद) की स्थापना भी साराभाई ने ही की थी। विक्रम साराभाई को 1962 में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, 1966 में पद्म भूषण और 1972 में पद्म विभूषण (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। 

    विक्रम साराभाई के द्वारा स्थापित संस्थान - भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद, कम्यूनिटी साइंस सेंटर, अहमदाबाद, दर्पण अकाडेमी फ़ॉर परफार्मिंग आर्ट्स, अहमदाबाद, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम, स्पेस एप्लीकेशन सेंटर, अहमदाबाद, फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर), कल्पकम, वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रॉन प्रॉजेक्ट, कोलकाता, इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड(ईसीआईएल), हैदराबाद  और यूरेनियम कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल), जादूगुडा, बिहार।

     

  3. एस . एस . भटनागर : इन्हें कहा जाता है भारत में राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं का जनक

    इन्होंने देश में वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं की स्थापना की थी, इसलिए इन्हें “भारत में राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं’ का जनक भी कहा जाता है। इन्होंने डॉ भटनागर वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसन्धान परिषद (सी.एस.आई.आर.) की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया और इसके पहले महा-निदेशक भी रहे।

    एस . एस . भटनागर को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) का पहला अध्यक्ष भी बनाया गया था। भारत में विज्ञान और शोध के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसन्धान परिषद (सी.एस.आई.आर.) ने सन् 1958 में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार की स्थापना की। यह पुरस्कार उन वैज्ञानिकों को दिया जाता है जिन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया हो। डॉ भटनागर ने भारत में कई राष्ट्रीय प्रयोगशालाएं स्थापित कीं जिनमें केन्द्रीय खाद्य प्रोसैसिंग प्रौद्योगिकी संस्थान (मैसूर), राष्ट्रीय रासायनिकी प्रयोगशाला (पुणे), राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला (नई दिल्ली), राष्ट्रीय मैटलर्जी प्रयोगशाला (जमशेदपुर) और केन्द्रीय ईंधन संस्थान (धनबाद) प्रमुख हैं। भारत सरकार ने डॉ शांति स्वरूप भटनागर को विज्ञान एवं अभियांत्रिकी क्षेत्र में पद्म भूषण से सन 1954 में सम्मानित किया।

     

  4. सतीश धवन : सुपरसोनिक विंड टनल स्थापित करने का जाता है श्रेय

    30 दिसंबर 1971 में साराभाई की आकस्मिक मृत्यु के बाद, धवन ने देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य पदभार को संभाला। मई 1972 में धवन ने भारत के अंतरिक्ष विभाग के सचिव के रूप में पदभार संभाला।

    वे बेंगलूर स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) में प्रोफ़ेसर भी रहे और उन्हें आईआईएससी में भारत के सर्वप्रथम सुपरसोनिक विंड टनल स्थापित करने का श्रेय भी दिया जाता है। उन्‍होंने सफलतापूर्वक भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह (इनसेट) और ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन वाहन (पीएसएलवी) के रिमोट सेंसिंग और उपग्रह संचार कार्यक्रम का काम भी संभाला। इनके सम्मान में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र इसरो की भी स्थापना की गई। महत्वाकांक्षी दूसरे चंद्र मिशन के तहत ‘चंद्रयान-2’ ने इसी साल 22 जुलाई को इसी अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी थी। सतीश धवन को विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन् 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

     

  5. जगदीश चंद्र बसु : पौधों की वृद्धि को मापने के लिए बनाया यंत्र

    महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु (जे सी बोस) ने ही यह साबित किया था कि पौधों में भी भावनाएं होती हैं। उन्होंने दिखाया कि पौधो में उत्तेजना का संचार वैद्युतिक (इलेक्ट्रिकल) माध्यम से होता हैं ना कि केमिकल माध्यम से। उन्होंने यह भी साबित किया कि पेड़-पौधों में भी जान होती है और वे भी सांस लेते हैं।

    पौधों की वृद्धि को मापने के लिए बोस ने एक यंत्र बनाया। उन्होंने इस यंत्र को क्रेस्कोग्राफ नाम दिया। वह रेडियो और सूक्ष्म तरंगों पर अध्ययन करने वाले जगदीश चन्द्र बसु पहले भारतीय वैज्ञानिक थे। नवंबर 1894 में बसु ने कलकत्ता के टाउन हॉल में अपनी रेडियो तरंगों का प्रदर्शन किया। इस दौरान उन्होंने रेडियो तरंगों का इस्तेमाल करके दूर रखी एक बेल को बजाया और बारूद में विस्फोट किया। बोस ने दिखाया कि विद्युत चुम्बकीय तरंगें किसी सुदूर स्थल तक हवा के सहारे पहुंच सकती हैं। उन्होंने साबित कर दिया था कि इन तरंगों का इस्तेमाल करके दूर स्थित किसी चीज को कंट्रोल किया जा सकता है। आज के रिमोट कंट्रोल सिस्टम उनकी इसी धारणा पर आधारित हैं। जगदीश चंद्र बसु ने प्रेसीडेंसी कॉलेज में अध्यापन का कार्य किया था। प्रेसीडेंसी कॉलेज से अगल होने के बाद साल 1917 में इन्होंने कलकत्ता में बोस रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना की और 1937 तक इसके निदेशक रहे। 1917 में ब्रिटिश सरकार ने जगदीश चंद्र को नाइट की उपाधि प्रदान की गई। इसके बाद 1920 में उन्हें रॉयल सोसायटी लंदन का फैलो चुन लिया गया।

     

  6. चंद्रशेखर वेंकट रमन :  कुछ सिक्कों से बनाया स्पैक्ट्रोमीटर

    डॉ. सी वी रमन का नाम हमेशा से क्वांटम हाइपोथेसिस से जोड़कर लिया जाता है। डॉ रमन ने महज कुछ सिक्कों से बने मामूली स्पैक्ट्रोमीटर से क्वांटम हाइपोथेसिस को नई ऊंचाइयां दी थी। आसमान या समुद्र का नीला दिखना इसी स्कैटरिंग का रिजल्ट होता है, उन्होंने अपने रिसर्च में इस बात का दावा किया था। इसी बात के लिए डॉ सी वी रमन को 1930 में फिजिक्स में नोबल अवार्ड दिया गया।

    ‘ऑप्टिकल’ एरिया में उनके इस योगदान के लिए साल 1924 में इन्हे लन्दन की रॉयल सोसाइटी का मेंबर बनाया गया। उन्होने 8 फरवरी 1928 को ‘रमन इफेक्ट’ की खोज की और धीरे-धीरे विश्व की सभी प्रयोगशालाओं में ‘रमन इफेक्ट’ पर जांच पड़ताल होने लगी। वेंकट रमन ने साल 1929 में इंडियन साइंस कांग्रेस के अध्यक्षता की। 1930 में स्केटरिंग ऑफ लाइट और रमन इफेक्ट की और रमण प्रभाव की रिसर्च के लिए फिजिक्स में नोबेल पुरस्कार अवार्ड दिया गया । साल 1934 में रमन को बेंगलुरु के इंडियन इंस्टिट्यूट का डायरेक्टर बनाया गया। उन्होंने स्टिल की स्पेक्ट्रम नेचर , स्टिल डाइनैमिक्स, हीरे की स्ट्रक्चर एंड प्रॉपर्टी जैसे सब्जेक्ट पर शोध किया। उन्होंने ही पहली बार तबले और मृदंगम के हार्मोनिक नेचर की खोज की थी।

     

  7. बीरबल साहनी : इन्हे कहा जाता है 'फादर ऑफ इंडियन पैलियो बॉटनी'

    बीरबल साहनी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के पुरावनस्पति वैज्ञानिक थे इन्हें भारत का सर्वश्रेष्ठ पेलियो-जियो बॉटनिस्ट माना जाता है। जीवाश्म वनस्पतियों पर उनके काम के लिए उन्हें फादर ऑफ इंडियन पैलियो बॉटनी (पुरावनस्पति शास्त्र) कहा जाता है। उनकी खोज और उनकी लिखी गई किताबें आज भी वनस्पति विज्ञान के छात्रों को पढ़ाई जाती हैं।

    प्रो. साहनी ने भारत में पौधों की उत्पत्ति तथा पौधों के जीवाश्म पर महत्त्वपूर्ण शोध किए। पौधों के जीवाश्म पर उनके शोध मुख्य रूप से जीव विज्ञान की विभिन्न शाखाओं पर आधारित थे। जीवाश्म वनस्पतियों पर अनुसंधान के लिए वर्ष 1919 में उन्हें लंदन विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ साइंस यानी डीएससी की उपाधि प्रदान की गई। 1936 में उन्हें लंदन की रॉयल सोसाइटी का सदस्य चुना गया। उनके द्वारा 1949 लखनऊ में जिस संस्थान की नींव रखी गई थी, उसे आज हम बीरबल साहनी पुरा-वनस्पति विज्ञान संस्थान के नाम से जानते हैं। भारतीय विज्ञान कांग्रेस ने उनके सम्मान में 'बीरबल साहनी पदक' की स्थापना की है, जो भारत के सर्वश्रेष्ठ वनस्पति वैज्ञानिक को दिया जाता है।

     

  8. सुब्रमण्‍यम चंद्रशेखर : तारे के विखंडन की प्रक्रिया को समझाया 

    सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर खगोल भौतिक शास्त्री थे और सन् 1983 में भौतिक शास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता भी थे। मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातक की उपाधि लेने तक उनके कई शोध पत्र प्रकाशित हो चुके थे। 18  साल की उम्र में चंद्रशेखर का पहला शोध पत्र ‘इंडियन जर्नल ऑफ फिजिक्स' में प्रकाशित हुआ।

    वह नोबेल पुरस्कार विजेता सर सी. वी. रमन के भतीजे  थे। उन्होंने खगोल भौतिक शास्त्र तथा सौरमंडल से संबधित विषयों पर कई पुस्तकें लिखीं। सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर ने 'व्हाइट ड्वार्फ', यानी 'श्वेत बौने' नाम के नक्षत्रों के बारे में सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इन नक्षत्रों के लिए उन्होंने जो सीमा निर्धारित की है, उसे 'चंद्रशेखर सीमा' कहा जाता है। यह किसी स्थिर श्वेत वामन तारे का अधिकतम द्रव्यमान है। इससे अधिक द्रव्यमान होने के बाद तारे के विखंडन की प्रक्रिया शुरू होती है और वह आगे चलकर न्यूट्रॉन तारा या ब्लैक होल में बदल जाता है। उनके सिद्धांत से ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में अनेक रहस्यों का पता चला। उन्होने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि ‘यद्यपि मैं नास्तिक हिंदू हूं पर तार्किक दृष्टि से जब देखता हूं, तो यह पाता हूं कि मानव की सबसे बड़ी और अद्भुत खोज ईश्वर है।’

     

  9. के श्रीनिवास कृष्णन्:  प्रकाशिकी, चुंबकत्व और इलेक्ट्रॉनिक्स पर की कई महत्वपूर्ण खोज

    कार्यमाणिवकम् श्रीनिवास कृष्णन्  प्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक थे। 'मद्रास विश्वविद्यालय' ने इनको 'डी. एस. सी.' की उपाधि प्रदान की थी। श्रीनिवास कृष्णन सन 1945-1946 में 'भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी' के अध्यक्ष चुने गए थे।

    प्रकाशिकी, चुंबकत्व, इलेक्ट्रॉनिकी, ठोस अवस्था भौतिकी तथा विशेषकर धातु भौतिकी पर इन्होंने अनेक खोज की थीं। इन्होने सी. वी. रमन के साथ 'रमण प्रभाव' की खोज में भी इनका योगदान था। विज्ञान के क्षेत्र में सराहनीय योगदान के लिए श्रीनिवास कृष्णन् को 1954  में  पद्मभूषण पुरस्कार  से सम्मानित किया गया।

     

  10. ए.पी.जे. अब्‍दुल कलाम :  देश को बनाया महा शक्ति 

    अब्दुल कलाम का पूरा नाम 'अबुल पक्कीर जैनुलआबेदीन अब्दुल कलाम' था। अग्नि एवं पृथ्वी जैसे प्रक्षेपास्त्रों को स्वदेशी तकनीक से बनाने के कारण उन्हे उन्हें मिसाइल मैन के नाम से भी जाना जाता था। 2002 में वह देश के 11वें राष्ट्रपति बने।

    कलाम को विधार्थियों से विशेष लगाव था इसी कारण संयुक्त राष्ट्र ने उनके जन्मदिन को 'विधार्थी दिवस' के रुप में मनाने का निर्णय लिया। उनकी लिखी हुई पुस्तकें विंग्स ऑफ फायर, इंडिया 2020, इग्नाइटेड मांइड, माय जर्नी आदि हैं। अब्दुल कलाम को 48 यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूशन से डाक्टरेट की उपाधि मिली है। भारत में अब्दुल कलाम को 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण, 1997 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। जुलाई 1992 से लेकर दिसम्बर 1999 तक डॉ कलाम प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और रक्षा अनुसन्धान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के सचिव थे। भारत ने अपना दूसरा परमाणु परिक्षण इसी दौरान किया था। साल 2011 में प्रदर्शित हुई हिंदी फिल्म ‘आई ऍम कलाम’ उनके जीवन से प्रभावित है।

     

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