सोशल मीडिया / आईफोन 11 प्रो के तीन कैमरों को ट्राइपोफोबिया से जोड़ा जा रहा, इसके छिद्रों से डर लगता है

  • अमेरिकन साइकाइट्रिक एसोसिएशन के मुताबिक, छोटे-छोटे छिद्रों और उभार को देखकर लगने वाले डर को ट्राइपोफोबिया कहते हैं
  • ट्राइपोफोबिया कोडिसऑर्डर की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया, अब तक इसका कोई इलाज भी नहीं खोजा गया
  • ट्राइपोफोबिया से पीड़ितकई छिद्र वाली चीजों को देखते हैं तो डर के साथ मिचली, खुजली औरज्यादा पसीना आने लगता हैं

Dainik Bhaskar

Sep 16, 2019, 11:44 AM IST

लाइफस्टाइल डेस्क. एपल ने 10 सितंबरको कैलिफोर्निया मेंअपना पहला तीन कैमरे वाला आईफोन 11 प्रो लॉन्च किया। कंपनी का सारा फोकस कैमरे की खूबियों को बताने पर है लेकिन सोशल मीडिया यूजर इसे 'ट्राइपोफोबिया' नाम के मनोवैज्ञानिक डरसे जोड़ रहे हैं।

यह पहली बार जब मोबाइल के कैमरे की तुलना किसी मनोवैज्ञानिक विकारसे की जा रही है। यूजर्स का कहना है इसके 3कैमरों का जियोमेट्रिक डिजाइनऐसा है कि इससे काले रंग के होल्स को एक साथ देखने पर डर लगता है।अमेरिकन साइकाइट्रिक एसोसिएशन के मुताबिक, छोटे-छोटे छिद्रों और उभार को देखकर लगने वाले डर को ट्राइपोफोबिया कहते हैं। अमेरिका में 2015 में पहली बार एक रिपोर्ट में इसका जिक्र किया गया था। खासतौर परपश्चिमी देशों के लोगों में इस फोबिया को लेकर काफी डर फैला है और इसके शिकार हर उस चीज से डरते हैं जिसमें उन्हें एक साथ कई छेद नजर आते हैं।लोगमधुमक्खी केछत्ते, कमल के सूखे बीजों जैसीचीजें देखते हैं, तो सहम जाते हैं।

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ट्राइपोफोबिया और कैमरे का कनेक्शन

  1. ट्राइपोफोबिया जर्मन भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है। 'ट्रिप्टा' यानी छिद्र और 'फोबोज' का मतलब है डर। 2005 में पहली बार इस शब्द का प्रयोग किया गया। यह एक तरह का डर है, जिसे अब तक डिसऑर्डर की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है। अमेरिकन साइकाइट्रिक एसोसिएशन का कहना है, अब तक इसका इलाज नहीं खोजा जा सका है। इसका वास्तविक कारण भी नहीं सामने आ पाया है।

     

  2. लोग तस्वीरें शेयर कर डर बढ़ा रहे

    सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें वायरल हो रही हैं, जिसमें आईफोन 11 प्रो के 3 कैमरे के साथ छिद्रों के समूह भी नजर आ रहे हैं, जो घबराहट पैदा करते हैं। ट्राइपोफोबिया से जूझ रहे लोगों का कहना है, ऐसी तस्वीरें डर और घबराहट बढ़ाने का काम कर रही हैं। यह कोई मजाक नहीं हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस डिसऑर्डर को भूल चुके हैं, लेकिन उन्हें यह फिर याद आ रहा है।

     

  3. यूजर्स के अपने-अपने तर्क

    सोशल मीडिया यूजर का कहना है, वे ऐसा करके लोगों को ट्राइपोफोबिया के बारे में जागरूक कर रहे हैं। इसके जवाब में दूसरे यूजर का कहना है, मैं ट्राइपोफोबिया को नहीं जानता था लेकिन जब इंटरनेट पर इसके बारे में सर्च किया तो डर पैदा हुआ। अब में इस विकार का शिकार हो गया हूं। आईफोन 11 प्रो के नाम से ही शरीर में डर की लहर दौड़ जाती है। यह फोन मुझमें एक नए तरह का डर पैदा कर रहा है।

     

  4. कब अलर्ट हो जाएं

    ट्राइपोफोबिया से पीड़ित में कई तरह के लक्षण दिखते हैं। जब ये कई छिद्र वाली चीजों को देखते हैं तो डर के साथ मिचली, खुजली, अधिक पसीना आने लगता हैं। कई बार शरीर कांपने लगता है और पेनिक अटैक भी आ सकता है। सभी मामलों में डर सबसे सामान्य लक्षण है। ट्राइपोफोबिया कागज पर प्रिंट तस्वीर को देखकर भी हो सकता है। अगर कई सारे छिद्र देखकर आपने ऐसे लक्षण नजर आते हैं, तो मनोरोग विशेषज्ञ से सलाह लेने की जरूरत है।

  5. क्या नहीं देखना चाहिए

    ट्राइपोफोबिया के मामले आमतौर पर मधुमक्खी के छत्ते, स्ट्रॉबेरी, कमलगट्टा, अनार, कीट-पतंगों की आंखें, सी स्पंज देखने पर सामने आते हैं। डर के कारण शरीर के रोंगटे खड़े जाते हैं। कुछ मामले में ब्लड प्रेशर भी बढ़ जाता है। 

     

  6. एक्सपर्ट की सलाह है कि...

    मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. अनामिका पापड़ीवाल का कहना है, ऐसे मामले सामने आने पर विशेषज्ञ की सलाह लें। इस डिसऑर्डर का फिलहाल कोई इलाज नहीं है, लेकिन कुछ थैरेपी इसका डर कम करने में मदद करती हैं। जैसे- एक्सपोजर और बिहेवियरल थैरेपी। 

     

    एक्सपोजर थैरेपी : इसमें मरीज को ऐसी चीजों से सामना करना सिखाया जाता है जिसके कारण उसमें डर पैदा हो रहा है। डर का कारण बनने वाली तस्वीरें और चीजें मरीज को दिखाई जाती हैं। कई बार ऐसी चीजों को छूने के लिए भी कहा जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे उनमें डर खत्म होता है और बेचैनी कम होती है। उन्हें अहसास होता है कि यह एक आम बात है और लक्षणों में कमी आती जाती है।

     

    बिहेवियरल थैरेपी : इस थैरेपी के दौरान विशेषज्ञ मरीज के व्यवहार को नियंत्रित करने की कोशिश करता है। उसके मन से किसी खास चीज के प्रति नकारात्मक व्यवहार को बदला जाता है। मरीज में धीरे-धीरे बदलाव आता है। धीरे-धीरे वह डर का कारण बनने वाली चीजों को देखकर सामान्य व्यवहार करने लगता है। ऐसे मामलों में ज्यादातर थैरेपी दी जाती है लेकिन डिप्रेशन और बेचैनी बढ़ने पर एंटी-डिप्रेसेंट दवाएं दी जाती हैं। 

     

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