विश्व ओजोन दिवस / हर मिनट नष्ट हो रही हुई ओजोन कवच से जल रही धरती और भुगत रहा इंसान

  • ओजोनके क्षतिग्रस्त होने का आंकड़ा 1% भी बढ़ा तो दुनियाभर में 0.6 फीसदी मोतियाबिंद के मामले बढ़ जाएंगे

Dainik Bhaskar

Sep 16, 2019, 04:38 PM IST

साइंस डेस्क. धरती और इंसान का सुरक्षा कवच कही जाने वाली ओजोन पर्त नष्ट हो रही है। ओजोन पर्त पर पाकिस्तान की गुजरात यूनिवर्सिटी की रिसर्च बड़ी चेतावनी दे रही है। रिसर्च के मुताबिक ओजोन के क्षतिग्रस्त होने का आंकड़ा 1 फीसदी भी बढ़ा तो दुनियाभर में 0.6 फीसदी मोतियाबिंद के मामले बढ़ जाएंगे। लेंस डैमेज हो जाएंगे। कैंसर के मरीजों में भी इजाफा होगा। पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी का कहना का कहना है धरती को बचाना है तो सबसे पहले प्रदूषण कम करना होगा। प्रदूषण सीधे तौर पर ओजोन की पर्त को नुकसान पहुंचा रहा है। गाड़ियों और फ्रैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं और गैस को नियंत्रित करने की जरूरत है।आज ओजोन डे है, इस मौके पर जानिए यह क्यों नष्ट हो रही है, इंसान इससे कितना प्रभावित होगा और इसे रोकने के उपाय क्याहैं...

ओजोन पर्त सुरक्षा कवच को क्यों कहते हैं 

  1. पृथ्वी के वायुमंडल की एक परत है ओजोन। यह पर्त सूर्य की ओर आने वाली अल्ट्रावायलेट किरणों को रोकने का काम करती हैं। इसकी खोज 1913 में फ्रांस के वैज्ञानिक फैबरी चार्ल्स और हेनरी बुसोन ने की थी। इस पर्त का निर्माण ओजोन गैस से होता है जो वायुमंडल 0.02 फीसदी ही पाई जाती है। धरती से करीब 40 किलोमीटर की ऊंचाई पर ओजोन का 91 फीसदी हिस्सा मिलकर ओजोन पर्त का निर्माण करता है। इन किरणों से स्किन कैंसर होने का खतरा ज्यादा रहता है। ये डीएनए को नुकसान पहुंचाने के अलावा स्किन बर्न और झुर्रियों की वजह भी बनती हैं। हालांकि कुछ अल्ट्रावायलेट किरणें फायदा भी पहुंचाती हैं।

  2. नुकसान हो क्यों रहा है

    गुजरात यूनिवर्सिटी की रिसर्च के मुताबिक, इसके नष्ट होने की बड़ी वजह क्लोरो-फ्लोरो कार्बन है। दरअसल, ओजोन पर्त बनने और क्लोरो-फ्लोरो कार्बन से इसके नष्ट होने की दर का तालमेल बिगड़ गया है। क्लोरो-फ्लोरो कार्बन में क्लोरीन, ब्रोमीन और फ्लोरीन जैसे गैसें और दृव्य शामिल हैं। इनका प्रयोग एसी, फ्रिज, गद्दों के कुशन, फोम बनाने और इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बोर्ड को साफल करने में किया जा रहा है। ज्यादातर सामानों में बढ़ता इनका प्रयोग ओजोन पर्त को नुकसान पहुंचा रहा है। 
    रिसर्च में ओजोन पर्त के नष्ट होने का दूसरा बड़ा कारण बड़े स्तर पर मिसाइलों का प्रक्षेपण कराना भी है। मिसाइलों की अनियंत्रित लॉन्चिंग क्लोरो-फ्लोरो कार्बन से ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है। अगर ऐसा ही रहा तो 2050 तक गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। 
    इसके अलावा ग्लोबल वॉर्मिंग भी ओजोन पर्त को नष्ट करने का काम कर रही है। दुनिया का बढ़ता तापमान और ग्रीन हाउस गैसों के कारण ट्रोपोस्फियर गैस का चेंबर बन गया है।

  3. इंसान को कितना नुकसान

    आंख : दुनियाभर में अंधता बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है मोतियाबिंद। शोध के मुताबिक, ओजोन की पर्त 1 प्रतिशत और नष्ट होती है तो 0.6 फीसदी तक मोतियाबिंद के मामले बढ़ जाएंगे। अल्ट्रा वॉयलेट रेडिएशन से बनने वाला ऑक्सिडेटिव ऑक्सीजन आंखों के लेंस को गंभीर रूप से डैमेज कर सकता है।  स्किन: धरती तक पहुंचने वाली पराबैंगनी किरणों सबसे पहले शरीर के बायोमॉलीक्यूल को बदलती हैं जो कई तरह की बीमारियों का कारण बनता है। त्वचा पर सीधे पड़ने के कारण स्किन कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। ये किरणें स्किन डैमेज के अलावा सनबर्न, ब्रेस्ट कैंसर और ल्यूकीमिया की वजह भी बन सकती हैं।। इम्युनिटी : ये किरणें शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता घटाती हैं जिसके कारण कैंसर और संक्रमण का खतरा बढ़ता है। ओजोन पर्त को जितना ज्यादा नुकसान होगा उतना ज्यादा रोगों से लड़ने की क्षमता घटेगी।  डीएनए डैमेज : शरीर के डीएनए में मौजूद लिपिड, प्रोटीन और न्यूक्लिक एसिड के बदलाव का कारण पराबैंगनी किरणे हैं। जो डीएनए को डैमेज करती हैं। ओजोन पर्त की नष्ट होने की दर एक फीसदी बढ़ने पर कैंसर के मामलों में 2 फीसदी इजाफा होगा। इसका असर फेफड़ों पर होगा जो ब्रॉन्काइटिस और अस्थमा के के रूप में दिखेगा।

  4. एक्सपर्ट व्यू : जीवनशैली बदलें, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें

    पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी का कहना इसे रोकने का सबसे बेहतर जरिया है जीवनशैली में बदलाव। लोगों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए, इससे पॉल्यूशन का स्तर घटाया जा सकता है। लोगों को खुद पहल करने की जरूरत है। 

  5. कैसे हुई ओजोन दिवस की शुरुआत

    16 दिसंबर 1987 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने ओजोन परत में हुए छेद से बढ़ती समस्या के समाधान के लिए कनाडा के मॉन्ट्रियल शहर में भारत समेत 33 देशों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसे मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल कहते हैं। इस दौरान तय किया गया ह कि ओजोन पर्त को नष्ट करने वाले पदार्थ जैसे क्लोरो फ्लोरो कार्बन का उत्पादक और उपयोग सीमित किया जाए। वैज्ञानिकों का मानना है कि वायुमंडल में प्रतिवर्ष के हिसाब से 0.5 % ओजोन की मात्रा कम हो रही है।

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