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जन्माष्टमी उत्सव:यहां जन्माष्टमी से 5 दिन पहले अपनी प्रियाजी से दूर हो जाते हैं बड़े गोविंदजी

दतिया7 महीने पहले
जन्माष्टमी के दिन से छठी तक भक्तों को प्रिया जी व गोविंद के अलग अलग दर्शन होते हैं।
  • भाद्रपद कृष्ण अष्टमी यानि कृष्ण जन्माष्टमी के दिन से बड़े गोविंद अपनी प्रिया जी से 5 दिन के लिए दूर हो जाते हैं
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भाद्रपद कृष्ण अष्टमी यानि कृष्ण जन्माष्टमी के दिन से बड़े गोविंद अपनी प्रिया जी से 5 दिन के लिए दूर हो जाते हैं। जन्माष्टमी के दिन से छठी तक भक्तों को प्रिया जी व गोविंद के अलग अलग दर्शन होते हैं। गोविंद जहां मुख्य गर्भगृह में तो प्रिया जी अलग कमरे में भक्तों को दर्शन देती है। जन्माष्टमी पर्व की सभी पूजा प्रक्रिया होने के बाद पुन: गर्भगृह में गोविंद प्रिया जी के साथ दर्शन देते हैं। मंदिर के पुजारी विपिन गोस्वामी बताते है कि जन्माष्टमी को श्रीकृष्ण का जन्म होता है यानि वह बाल रूप में होते है। इसलिए प्रिया जी व गोविंद के अलग अलग दर्शन कराए जाते है।

मंदिर के पुजारी विपिन गोस्वामी बताते है कि जन्माष्टमी पर्व की शुरूआत 12 अगस्त को सुबह 7 बजे ठाकुर जी व प्रिया जी के दूध, दही से स्नान व अभिषेक के साथ होगी। इसी के साथ प्रिया जी को अलग कमरे में सिंहासन पर विराजमान करा दिया जाएगा। सुबह लगभग 8.30 बजे ठाकुर जी व प्रिया जी के अलग अलग दर्शन भक्तों को होंगे। रात्रि 12 बजे भगवान का जन्म होगा। जन्म आरती सहित विभिन्न पूजनादि कार्य किए जाएंगे। दूसरे दिन यानि 13 अगस्त को दधिकांदा मंदिर प्रांगण में भक्तों द्वारा लुटाया जाएगा। दधि कांदा इस बार औपचारिक होगा। कोरोना के कारण मंदिर प्रांगण में भीड़ एकत्रित न हो इसलिए इसे औपचारिक किया जाएगा।

इसलिए प्रिया से दूर हो जाते हैं ठाकुर जी

पुजारी गोस्वामी के अनुसार मंदिर में गोविंद स्वरूप में ठाकुर जी विराजमान हैं। चूंकि जन्माष्टमी पर भगवान का जन्म होता है। यानि बाल रूप में होते हैं। इसलिए पर्व के दौरान प्रिया जी को ठाकुर जी से अलग सिंहासन पर विराजमान कराया जाता है। प्रिया जी भक्तों को अलग से दर्शन देती हैं। जन्म के बाद मंदिर में छठी का आयोजन किया जाता है। जिन दिन छठी होती है, उसी दिन फिर से गोविंद जी व प्रिया जी साथ साथ सिहासन पर विराजमान हो जाते हैं।

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