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मध्य प्रदेश:उमा भारती ने कहा- राम के नाम पर भाजपा का पेटेंट नहीं हुआ है, संघर्ष के बाद ये शुभ दिन आया, इस पर राजनीति नहीं करनी चाहिए

भोपाल2 महीने पहले
उमा भारती अयोध्या में हैं। उन्होंने कहा है कि वे जब आठ साल की थीं तब पहली बार प्रवचन करने आईं थीं। रामलला को ताले में देख उन्हें बेहद दुख हुआ था।
  • उमा ने कहा- राम के नाम पर किसी का पेटेंट नहीं हो सकता है
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राम मंदिर आंदोलन का प्रमुख नेता रहीं उमा भारती एक बार फिर चर्चा में हैं। उमा ने कहा है कि राम के नाम पर भाजपा का पेटेंट नहीं हुआ है। राम के नाम पर किसी का पेटेंट नहीं हो सकता है। राम का नाम अयोध्या या भाजपा की बपौती नहीं है। ये सबकी है, जो भाजपा में हैं या नहीं हैं, जो राम को मानते हैं, राम उन्हीं के हैं। बड़े ही संघर्ष के बाद ये शुभ दिन आया है, इस पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।

उमा भारती ने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि जब वे आठ साल की थी तब से अयोध्या आ रही हैं। 28 साल की थीं, जून 1990 में तब विश्व हिंदू परिषद के मार्गदर्शक मंडल की सदस्य बन गईं। इसी साल 31 अक्टूबर को मार्गदर्शक मंडल की बैठक में राम जन्मभूमि पर कारसेवा की घोषणा हुई। विहिप ने पूरे देश में कारसेवा के लिए अयोध्या पहुंचने का आह्वान किया। लालकृष्ण आडवाणी ने भी रथ यात्रा की घोषणा कर दी, फिर पूरे देश में जैसे राम भक्ति का ज्वार आ गया। उमा भारती के मुताबिक उन्हें विजयाराजे सिंधिया के साथ चित्रकूट से गिरफ्तार कर बांदा ले जाया गया, जहां 50 हजार कारसेवकों के साथ रखा गया।

जेल से आधी रात को भागकर पहुंची थीं अयोध्या

उन्होंने कहा कि उस समय पूरे बांदा नगर को ही जेल मान लिया गया था। उन्हें पीडब्ल्यूडी के गेस्ट हाउस को ही जेल में तब्दील कर वहीं रखा गया। 31 अक्टूबर की ही शाम टीवी पर हजारों कारसेवकों के कर्फ्यू तोड़कर अयोध्या पहुंचने, अशोक सिंघल के घायल होने और वासुदेव हलवाई के बाबरी ढांचे पर केसरिया पताका फहरा देने की खबर देखी। बेचैनी होने लगी कि पूरे देश में घूमकर जिनका आह्वान किया, वे सब अयोध्या पहुंच गए। जेल से भागने की योजना बना ली और सिर मुड़वा कर रात के 12 बजे बड़े भाई स्वामी प्रसाद लोधी के साथ अयोध्या के लिए निकल पड़ी। सुबह 8 बजे मणिराम दास छावनी पहुंची गईं। पूरे रास्ते में पुलिस थी, बैरियर थे, कर्फ्यू लगा था। अयोध्या में सुरक्षा के इतने तगड़े इंतजाम थे कि परिंदा भी पर न मार सके। 2 नवंबर 1990 को कारसेवा की तैयारी हुई। हजारों की तादाद में कारसेवकों का जत्था जानकी कुटीर के रास्ते हनुमानगढ़ी होते हुए राम जन्मभूमि की ओर चल पड़ा। अशोक सिंघल ने उन्हें जत्थे के साथ रहने के लिए कहा था।

हर तरफ था खौफनाक मंजर

हनुमानगढ़ी से थोड़ा पहले पुलिस थाने के पास भीषण संघर्ष हुआ, जिसमें हजारों लोगों के साथ वे खुद भी घायल हो गईं। उन्हें गिरफ्तार कर अयोध्या के थाने में रखा गया। थाने में ही उन्हें मणिराम दास छावनी से कारसेवकों के दूसरे रास्ते से राम जन्मभूमि की ओर चल पड़ने की जानकारी मिली। पुलिस से संघर्ष में कुछ कारसेवकों की मौत भी हुई थी। हर तरफ खौफनाक मंजर था। उन्हें पहले फैजाबाद, फिर नैनी जेल ले जाया गया. जहां पहले से ही कल्याण सिंह और कलराज मिश्र बंद थे।

आडवाणी-जोशी के साथ हुई थी गिरफ्तारी

कुछ दिनों के बाद उन सबको रिहा कर दिल्ली भेज दिया गया। चुनाव हुए और केंद्र में वीपी सिंह, राज्य में मुलायम सिंह की सरकार गिर गई। साल 1991 में यूपी में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। संसद से लेकर हर तरफ यह मुद्दा राजनीति का मुख्य बिंदु बन गया। 17 नवंबर को संन्यास की दीक्षा लेने के बाद अशोक सिंघल के आह्वान पर वे 1 दिसंबर को अयोध्या पहुंचीं। 6 को ढांचा गिरा दिया गया। 7 को वो दिल्ली लौटीं और 8 दिसंबर को उन्हें लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।

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