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3 पत्रकारों की जुबानी, बाबरी विध्वंस की कहानी:6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में थी कारसेवकों की बाढ़; किसी को चार घंटे मंदिर में बंधक रहना पड़ा तो किसी के तोड़ दिए थे कैमरे

लखनऊ2 महीने पहले
अयोध्या में विवादित ढांचा, जिसे छह दिसंबर 1992 को ढहा दिया गया था।
  • पत्रकार कुर्बान अली, फोटो जर्नलिस्ट अशफाक और मनोज छाबड़ा ने दैनिक भास्कर से साझा किया संस्मरण
  • बोले- प्लानिंग के तहत फोटोग्राफर और पत्रकारों पर हो रहे थे हमले, अयोध्या में हर तरफ से दिख रहे थे धुएं के गुबार
  • बाबरी विध्वंस केस में 28 साल बाद आज कोर्ट के फैसले में आडवाणी समेत सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया गया
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6 दिसंबर 1992 का दिन विहिप और भाजपा ने कारसेवा के लिए चुना था। एक दो दिन पहले से लाखों कारसेवक अयोध्या में पहुंचे हुए थे। देश-विदेश से सैकड़ों की संख्या पत्रकार भी मामले की कवरेज के लिए पहुंचे हुए थे। पत्रकारों के लिए मानस भवन में व्यवस्था की गई थी, जबकि सभा रामकथा कुंज पार्क में चल रही थी, जहां लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल जैसे तमाम बड़े नेता मौजूद थे। मानस भवन से देखने पर लग रहा था कि लोगों की बाढ़ आ गई है। पूरा माहौल जय श्रीराम के नारों से गूंज रहा था। हम आपको तीन पत्रकारों की जुबानी बताने जा रहे है कि आखिर 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में क्या हुआ था?

कुर्बान अली।

बीबीसी से खफा थे लोग, खुदा का शुक्र कि मेरा नाम नहीं पूछा गया

अयोध्या में नेता और कारसेवक पहले ही पहुंच गए थे। हर तरफ भगवा पहने और जय श्रीराम का नारा लगाते हुए लोग नजर आ रहे थे। 6 दिसंबर को स्थानीय पत्रकारों ने उन्हीं कारसेवकों से बात कर अखबार में खबर भी छाप दी थी कि आज बाबरी मस्जिद तोड़ कर ही जाएंगे।

बीबीसी उर्दू और संडे गार्जियन के लिए उस वक्त काम करने वाले कुर्बान अली कहते हैं कि "ज्यादातर पत्रकार फैजाबाद के शाने-अवध का होटल में रुके थे। मैं और बीबीसी के मार्क टली तकरीबन साढ़े 10 बजे मानस भवन पहुंचे और देखते ही देखते लगभग साढ़े 11 से 12 के बीच पहला गुम्बद गिरा दिया गया तो हम लोग रिपोर्ट करना चाह रहे थे। चूंकि उस समय पीसीओ ही एक मात्र जरिया था तो हमें 12 किमी फैजाबाद जाना होता। हम लोग वहां से निकल गए। 2 से ढाई बजे के बीच जब हम लोगों ने लौटने की सोची तो हमने सेन्ट्रल फोर्सेस को साथ लिया, लेकिन अयोध्या फैजाबाद के बीच पड़ने वाली रेलवे क्रासिंग पर उन्हें रोक दिया गया।"

"उसी समय एक मशहूर जर्नलिस्ट विनोद शुक्ला अपनी पत्नी के साथ कार से निकले। हम उनके साथ चल दिए और कैंट होते हुए बाबरी मस्जिद के पीछे इलाके में पहुंचे, लेकिन कारसेवकों ने हमें वहां घेर लिया। वह लोग बीबीसी से खफा थे और मार्क टली को देख कर भड़क गए। उन सबने हम लोगों को पीटना शुरू कर दिया। वह समय लग रहा था कि आज अंतिम दिन है। खुदा का शुक्र है कि उन्होंने मेरा नाम नहीं पूछा।"

"बहरहाल, इन लोगों ने हम सबको एक मंदिर में कैद कर दिया और हम पर नजर रखने के लिए लड़के लगा दिए गए। हमारे साथ एक स्थानीय पत्रकार सरस थे, वह किसी तरह छूटे फिर वह काफी देर बाद किसी साधु के साथ आए तब हम बाहर निकल पाए। फिर पीएसी की गाड़ियों में बैठकर वापस फैजाबाद लौटे। तब तक बाबरी मस्जिद ढहाई जा चुकी थी। बाबरी मस्जिद के साथ साथ उसका मलबा भी हटाया जा चुका था।"

अशफाक।

भीड़ केवल पत्रकारों और कैमरा पर्सन को बना रही थी निशाना, उन्हें डर था कि कहीं कोई सबूत न छूट जाए
6 दिसंबर 1992 के लिए विहिप पिछले 5 से 6 दिनों से माहौल बना रही थी। ऐसे में कुछ अखबार के फोटो जर्नलिस्ट रोजाना कवर करने के लिए लखनऊ से पहुंचते थे। फोटो जर्नलिस्ट अशफाक भी उन्हीं में शामिल थे। अशफाक बताते हैं कि "ज्यादातर पत्रकार मानस भवन कारसेवा कवर करने के लिए पहुंचे थे। हम भी वहीं पहुंचे। मैं फोटोग्राफर था तो मुझे भीड़ में जाना था। मेरे पास प्रेस कार्ड और विहिप का दिया हुआ आमंत्रण कार्ड भी था। गले में लटकाकर मैं और मेरे कुछ साथी भीड़ में पहुंचे, लेकिन लाखों की भीड़ में फोटो करना भी बड़ा काम था। किसी तरह हम लोगों ने फोटो निकालनी शुरू की।"

"लगभग 11:30 पर पहला गुंबद कारसेवकों द्वारा तोड़ दिया गया, हम लोग उसे खींचने में लग गए। लेकिन, उसी के बाद से भीड़ ने पत्रकारों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। जब तक हम कुछ समझ पाते गुस्साई और जय श्रीराम का नारा लगाती भीड़ से घिर चुके थे। भीड़ से लगातार आडवाणी-जोशी जैसे नेता संयम बरतने की अपील कर रहे थे, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। भीड़ ने घेर कर हमें बहुत मारा। जो भाग पाए वह किसी तरह गिरते पड़ते भागे।"

"मुझे लगा कि आज मेरी जिंदगी का आखिरी दिन है। मेरा कैमरा तोड़ा जा चुका था। साथ ही मेरा सिर फट गया था। हाथ पर गहरा जख्म था। लेकिन, कुछ लोगों में इंसानियत जिंदा थी। उन्हीं लोगों में से कुछ लोगों ने मेरी जान बचाई। मारने वाले भी कारसेवक थे और बचाने वाले भी कारसेवक ही थे। किसी तरह हमें एम्बुलेंस से फैजाबाद हॉस्पिटल पहुंचाया गया। बाद में घटनास्थल से जला हुआ बैग मिला था, जिसमें घटना के दौरान खींची गई कुछ तस्वीरें भी सुरक्षित थीं।"

मनोज छाबड़ा।

जान बचाने के लिए पुलिस की गाड़ी पर चढ़ा तो जवान बोला मुझे भी मरवाओगे

टाइम्स ग्रुप के साथ जुड़े फोटो जर्नलिस्ट मनोज छाबड़ा बताते है- "हम जब अयोध्या पहुंचे तो पहले रामकथा कुंज पार्क गए। वहां हमने कुछ अच्छी तस्वीरें ली। मंच पर चढ़े, जहां अशोक सिंघल, उमा भारती, लालकृष्ण आडवाणी बैठे थे। अलग-अलग नेताओं का भाषण चल रहा था। बीच-बीच में लोग जय श्रीराम का नारा लगा रहे थे। हम लोगों ने तय किया की बाबरी मस्जिद के सामने से जाएंगे और वहां से फोटो करेंगे तो बेहतर आएगी। हम लगभग 200 मीटर की दूरी तय कर सामने पहुंचे तो देखा भीड़ उन्मादी हो गई थी। इनमें से पहले गुंबद पर करीब 12 या 13 लोग चढ़े फिर दूसरे गुंबद पर 3 से 4 और तीसरे गुंबद पर 2 से 3 लोग थे। कारसेवक अचानक से बढ़ने लगे।"

"पीएसी के जवान बल्लियों से नीचे उन्हें धकेलने लगे तो वह और तेजी से बढ़े बाद में पीएसी भी पीछे हट गयी। उसी भीड़ में मै फंस गया। हम फोटो खींच रहे थे अचानक वह आक्रामक हो गए। उन्होंने मुझे बीबीसी का फोटोग्राफर समझ लिया और मेरे दोनों हाथ पीछे से पकड़ लिए। मैं चिल्लाता रहा कि मै नवभारत टाइम्स से हूं। लेकिन, उन्होंने नहीं सुना। मैं बस सोच रहा था कि भले कैमरा टूट जाए, लेकिन रोल बच जाए। वह लोग बिना सोचे समझे मेरे ऊपर लात घूंसे बरसा रहे थे।"

"एक विदेशी कैमरामैन की गर्दन से खून बह रहा था, मैं भी डर गया था कि किसी तरह उनसे पिंड छुड़ा कर भागा तो पुलिस की गाड़ी पर चढ़ गया तो पुलिस वाला चिल्लाया उतरो हमें भी मरवाओगे। हमनें मिन्नत की लेकिन, वह नहीं माना। कारसेवकों ने हमें फिर मारना शुरू कर दिया। आसमान की तरफ देखो तो सिर्फ कैमरे उछाले जा रहे थे या फिर उन्हें जमीन पर पटक कर रौंदा जा रहा था। किसी तरह फिर उनसे छूटा तो लगभग 1 किमी भागता ही रहा। आगे कुछ साथी मिले जिन्होंने दिलासा दिया। मुझे लगता है कि रिपोर्टर और फोटोग्राफर पर हमला प्री प्लांड था। बहरहाल, हम लखनऊ लौट रहे थे, लेकिन अयोध्या छोड़ते हुए आग और धुएं की लपटे भी दिखाई दे रही थी।"

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