पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

Install App
Open Dainik Bhaskar in...
Browser
Loading advertisement...

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

मुनव्वर राना की जुबानी, राहत इंदौरी की कहानी:पचास या सौ बरस तक कोई उम्मीद नहीं कि राहत जैसा कोई आदमी उर्दू स्टेज पर आएगा

लखनऊ5 महीने पहलेलेखक: मुनव्वर राना
मुनव्वर राना (बाएं) और राहत इंदौरी का यह फोटो 14 दिसंबर 2019 का है। तब दोनों जश्न-ए-रेख्ता के मंच पर साथ नजर आए थे।
  • राना और राहत ने कई मुशायरे एक साथ किए
  • दोनों के बीच दोस्ती का रिश्ता रहा, लेकिन राहत साहब राना की बहुत इज्जत करते थे
Loading advertisement...

मशहूर शायर राहत इंदौरी का मंगलवार को निधन हो गया। राहत इंदौरी के साथ अनगिनत मुशायरों में शिरकत करने वाले नामचीन शायर मुनव्वर राना ने कुछ यूं याद किया....

अभी कुछ देर पहले हमें राहत साहब के इंतकाल के बारे में पता चला। राहत साहब हमारे दुख-सुख के साथी थे। हम भी ये कहते थे कि स्टेज पर हमारा सिर्फ एक ही दोस्त है- राहत। उन्हें भी यह फख्र रहता था कि हमारा भी एक ही दोस्त है जो, स्टेज पर है और वो है मुनव्वर राना। राहत के साथ बहुत अच्छा वक्त बीता। राहत हमारी बात मानते भी थे। वे हमसे उम्र में बड़े थे, लेकिन हमेशा मेरा लिहाज करते थे। बहुत अदब से पेश आते थे।

हमारे सामने शराब नहीं पीते थे राहत...
मुशायरे के दौरान अगर कभी हम होटल में उनके रूम में पहुंच भी गए, तो वह गिलास नीचे रख दिया करते थे। आखिरी दिनों में जब वह बहुत बीमार पड़े तो उन्होंने शराब छोड़ दी। हमने उन्हें कहा था- बेटे को साथ लेकर चला करो। अकेले मत जाया करो। दोस्त अहबाब तुम्हें शराब पिला देते हैं। फिर 5-6 बरस से यह हुआ कि राहत अकेले नहीं जाते थे। बेटे को साथ ले जाते थे। उस वक्त काफी सहारा मिला उन्हें। तबीयत भी कुछ सही हो गयी। दवाएं लेने के मामले में बड़े लापरवाह किस्म के थे। लेकिन, बेटा साथ रहता था तो वह वक्त पर दवा का ख्याल रखता। इससे काफी हद तक हालात सुधरे। लेकिन, ये कमबख्त ये कोरोना इस मुल्क में जब से आया है, कब किस को खा जाए- कुछ कहा नहीं जा सकता। राहत साहब को पहले भी कई बार हार्ट की प्रॉब्लम हुई थी। उस वक्त उससे उबर गए थे। लेकिन, ये कोरोना उनकी मौत का सबब बन गया।

इस वक्त स्टेज पर राहत जैसा कोई नहीं
सबसे बड़ी बात हमारे स्टेज पर इस वक्त ऐसा कोई शायर नही है, जो राहत इंदौरी का जवाब बन सके। आइंदा पचास या सौ बरस तक कोई उम्मीद नहीं कि राहत के जैसा कोई आदमी उर्दू स्टेज पर आएगा। यह बहुत बड़ा नुकसान है। जो दो चार लोग बचे है उर्दू के। स्टेज खाली और वीरान हुआ जा रहा है। राहत साहब की मौत निदा फाजली की मौत के बाद बड़ा नुकसान है।

फरवरी में किया था उनके साथ आखिरी मुशायरा
हम लोगों ने कम से कम 500 बार स्टेज शेयर किया। आखिरी मर्तबा हम और राहत साहब एक प्रोग्राम में शामिल हुए थे। फरवरी में हुआ था। उसमें एक प्रोग्राम था शायरी के 50 साल और राहत इंदौरी और मुनव्वर राना के शायरी के 50 साल। तो ये प्रोग्राम हुआ। एक इंटरव्यू की तरह था। हम दोनों अपने-अपने किस्से और वाकयात सुना रहे थे।

पांच पैग में अंबाला पहुंच जाएंगे
एक बार हमने राहत साहब से पूछा- अंबाला जाएंगे? उन्होंने कहा- हां जाएंगे। तुम कैसे जाओगे? तो मैंने कहा- ट्रेन से जाएंगे। राहत बोले- हम तो कार से जाएंगे। इसलिए कि हमें जल्दी लौटना है और दिल्ली से रात की ट्रेन पकड़नी है। मैंने पूछा- राहत ये बताओ कि वैसे गाड़ी से कितना वक्त लगता है अम्बाला तक दिल्ली से। तो कहने लगे तुम समझ लो एक...दो... तीन...चार... बस पांचवां पैग हम शुरू करते हैं और अम्बाला आ जाता है। वह बहुत जिंदादिल थे। दोस्तों के काम आने वाले थे।

ये मेरे लिए व्यक्तिगत नुकसान
हमारे ऐसे ताल्लुकात थे कि किसी मुशायरे में राहत हमें बुलाएं, या हम राहत को बुलाएं। दोनों एक-दूसरे की बात का मान रखते थे। अगर हमारा प्रोग्राम है तो राहत साहब वक्त छोड़ कर वहां आ जाते थे। यह हमारा व्यक्तिगत नुकसान है कि हम किसी से कह भी नहीं सकते कि राहत साहब का इंतकाल हो गया। क्योंकि, हमें लगता है कि जैसे हम मर गए। अभी हम अपने बच्चों से कह रहे थे कि अब इसके बाद हमें जाना है। हमें सवेरे ही मालूम हो गया था। इंदौर में एक लड़का है जो पत्रकार है। उसने बताया कि राहत साहब बीमार हो गए हैं। फिर फेसबुक वगैरह पर चलने लगा, लेकिन हम उस पर हैं नहीं। लेकिन, फिर भी मुझे पता चल गया था।

एक आदमी और कितने काम
'उनमें सबसे बड़ी क्वॉलिटी ये थी कि एक शख्स जो ट्रक का साइन बोर्ड पर पेंट करता था, एक शख्स जो मोटर साइकिल के पीछे नम्बर लिखता था, वहां से उठते-उठते उसने एमए किया, पीएचडी की और उर्दू शायरी पर उसने डॉक्टरेट किया। शायरी से उठकर कॉलेज में प्रोफेसर हुआ। वहां से मुंबई गया फिल्मों में गाने लिखे। फिर वहां से लौट कर फिर वही इंदौर, वही शायरी में रहा। एक अकेला शख्स कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। जो अकेले इतने काम कर सके। शायरी भी कर ले। फिल्मों में गाने भी लिख ले। पढ़ाई कर ले। पीएचडी कर ले। इतना सब करने वाला हमारे विचार में कोई दूसरा नहीं है।

वो हंसते बोलते रहे..
राहत के जिस्म में बीमारियां फैल रहीं थीं, लेकिन राहत पूरी जिंदगी हंसते बोलते रहे। हम और राहत मिल जाते, तो वही लतीफेबाजी और हंसना और पुरानी यादों के साथ खेलना बड़ा मजा आता था। हम दो ही लोग स्टेज पर मिलकर बड़े खुश होते थे। राहत कहते थे कि हम लोग बीमार ऊंट की तरह पीछे बैठे रहते हैं। कैसा लगता है। पहले कितना धमाचौकड़ी स्टेज पर करते थे। अब कैसे लाश की तरह बैठे हैं। राहत ने अपनी छोटी सी उम्र में बहुत काम किया। खूब पढ़ा-लिखा। सबसे बड़ी बात उन्होंने ऊर्दू जुबान को उर्दू मुशायरे को बहुत इज्जत दिलाई। हमारी शायरी को हिंदी वालों के साथ जोड़ा। ये सबसे बड़ी बात है। राहत साहब से मेरी पहली मुलाकात बम्बई के एक मुशायरे में हुई थी। हमारे ख्याल से यह 1978-79 की बात है। फिर वहीं से वह हमको इंदौर ले गए थे। इंदौर जाकर हमें खुशी यह हुई थी कि वहां हमारे शेर लोगों को पहले से याद थे।

(जैसा उन्होंने रवि श्रीवास्तव को बताया)

Loading advertisement...
खबरें और भी हैं...

Copyright © 2020-21 DB Corp ltd., All Rights Reserved

This website follows the DNPA Code of Ethics.