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यादों में राहत इंदौरी:वसीम बरेलवी ने कहा- राहत जिंदादिल इंसान थे, उनकी शायरी में हमेशाा हौसला और हिम्मत ही दिखती थी; मन नहीं मान रहा कि राहत नहीं रहे

लखनऊ2 महीने पहले
राहत इंदौरी की मौत की खबर सुनने के बाद मशहूर शायर वसीम बरेलवी काफी भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि इस खबर के लिए अभी तैयार नहीं था, मैं पूरी तरह से हिल गया हूं।
  • मशहूर शायर राहत इंदौरी का मंगलवार को इंदौर में निधन हो गया
  • बरेलवी ने कहा कि मैं पूरे हुदूद (अस्तित्व) से हिला हुआ हूं, इसके लिए तैयार नहीं था
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मशहूर शायर राहत इंदौरी का दिल का दौरा पड़ने से मंगलवार को निधन हो गया। वे कोरोना वायरस से भी संक्रमित थे। उनके साथ कई बार मंच साझा कर चुके मशहूर शायर वसीम बरेलवी ने राहत इंदौरी को याद करते हुए कहा...

हमने आज ही उन्हें मैसेज किया था

मैं इतनी देर से उसी में लगा हूं। लगातार फोन आ रहे हैं। इस समय मैं पूरे हुदूद (अस्तित्व) से हिला हुआ हूं। जेहन अभी तैयार नहीं था। राहत में हौसला और हिम्मत था। यह हौसला और हिम्मत उनकी शायरी से भी जाहिर होती थी। इतनी जल्दी मन मान नहीं रहा है कि राहत नहीं रहे। यूं कहें कि कुबूल करने को तैयार नहीं है।"''हमने आज उन्हें मैसेज भी किया था, लेकिन उनके सभी फोन बंद थे। मेरी मंजर भोपाली से बात हुई तो उन्होंने भी बताया कि सारे टेलीफोन बंद है। हकीकत यह है कि उनके जाने से एक दौर का खात्मा हुआ है। इसलिए कि जो शोहरत उन्हें ऊपर वाले ने दी वह कम लोगों को मिलती है। मेरा तो इस स्टेज से संबंध 60 के दशक से है, जबकि राहत 70 के दशक में आए। मेरी पहली मुलाकात 1975 में उज्जैन के एक मुशायरे में हुई थी। उस समय शायरी को तरन्नुम या लय के साथ पढ़ा जाना जो था वह कामयाबी की जमानत माना जाता था।

हमारी इज्जत करते थे

मुशायरों में वही लोग कामयाब होते हैं, जिनके पास तरन्नुम होता है। वह बागी शायर के तौर पर स्टेज पर दाखिल हुए और जो अंदाज अपनाया वह निराला था। उर्दू स्टेज पर राहत का ये कंट्रीब्यूशन था कि उन्होंने अपना अलग अंदाज अपनाया। राहत साहब का यह स्टाइल न सिर्फ मशहूर हुआ बल्कि मकबूल भी हुआ। साथ ही कुबूल हुआ। कई नस्लों को उन्होंने मुतास्सिर किया। उनके लाखों करोड़ों चाहने वाले दुखी हैं। जितने उनके चाहने वाले हैं उन्हें सब्र अता फरमाएं। हमने रिकॉर्ड नहीं रखा नहीं तो ये गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड्स की बात होती। हम लोगों की तो जिंदगी में ये कोरोना आ गया। हम बरेली में तरसते थे, वह इंदौर में तरसते थे। हम लोगों को मालिक ने इतना नवाजा था कि खुद चाहे तो खाली हो जाएं वरना लोगों की मोहब्बतें घरों में छोड़ती कहां थी। घरों से ज्यादा हम लोग साथ रहे। वह मेरे अजीज थे, छोटे थे। हमारी इज्जत और एहतराम करते थे। बहुत दिल दुख रहा है।

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