भोपाल / द कबाड़ीवाला- मप्र का पहला स्टार्टअप जिसे मिला 3 करोड़ का निवेश

द कबाड़ीवाला के सह संस्थापक अनुराग असाटी और कवींद्र रघुवंशी हैं।

  • 1500 तक किताबें निकलती हैं रोजाना कबाड़ से, इसे खरीदता द कबाड़ीवाला
  • इस स्टॉर्टअप में अब यूनीलिवर के डायरेक्टर नवीन रेड्डी की भी हिस्सेदारी

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2019, 05:58 PM IST

भोपाल. आपके द्वारा रद्दी में बेची गईं किताबें एक दुर्लभ पुस्तकालय का हिस्सा बन रही हैं। यहां गीता, उपनिषद, वेद, पुराण, महाभारत, रामायण हैं तो महात्मा गांधी का जीवन दर्शन भी। सिकंदर से लेकर अंग्रेज तक सारे आक्रांताओं पर लिखे नामचीन लेखकों की किताबें भी आपको मिल सकती हैं। अगर पारखी नजर हो तो आप पा सकते हैं कई लेखकों की पांडुलिपियां भी। आप 5 से 20 रुपए तक के मामूली दाम पर घर बैठे ऑर्डर कर सकते हैं।

दरअसल, घर से कबाड़ एकत्र करने वाले ऑनलाइन स्टॉर्टअप द कबाड़ीवाला पिछले एक माह से रद्दी से लाइब्रेरी का कैम्पेन चला रहा है। इसके जरिए घरों से रद्दी और कबाड़ में मिली किताबों को एकत्र करके फिर से उपयोग लायक बनाते हैं। बाकी कबाड़ को रीसाइक्लिंग के लिए भेजते हैं। इस ऑनलाइन पोर्टल में घर का कबाड़ बेचने के लिए राजधानी के 35 हजार लोग पंजीकृत हैं। ये रोज 60 टन कबाड़ बेचते हैं। इसमें 1000 किलो तक किताबें होती हैं।

संख्या के आधार पर यह 1500 तक हो सकती हैं। द कबाड़ीवाला के सह संस्थापक अनुराग असाटी और कवींद्र रघुवंशी हैं। असाटी कहते हैं- पहले हम न्यूजपेपर की रद्दी के साथ किताबों को भी रीसाइकिल में भेज देते थे। जब कबाड़ में रामचरितमानस मिली तो हमारा नजरिया बदल गया। कई स्कूल पुरानी किताबें छात्रों को देती हैं, ताकि अभिभावकों का बोझ कम हो। इसलिए हमने यह काम शुरू किया।

इन दिनों देशभर में कबाड़ीवाला की चर्चा
भोपाल की स्टार्टअप कंपनी द कबाड़ीवाला डॉट कॉम ने 3 करोड़ रुपए का इक्विटी फंड जुटाया है। इसके बाद यूनीलिवर के डायरेक्टर नवीन रेड्डी, बीहिव कैपिटल एडवाइजर के भूषण गजारिया, सिंगापुर स्थित इंवेस्टमेंट फर्म की एबकॉम इंवेस्टमेंट्स भारत मंडलाेई, पारेख मेरिन ट्रांसपोर्ट्स के सुरेश पारेख भी इसके हिस्सेदारों में शामिल हो चुके हैं। कंपनी यह पैसा टेक्नोलॉजी के अपग्रेडेशन और कंपनी के उन्नयन पर लगाएगी। कंपनी भोपाल में बरखेड़ा से काम करती है।

वर्तमान में कंपनी भोपाल के साथ इंदौर, रायपुर और औरंगाबाद में भी काम कर रही है। यह हर साल 100 टन कचड़ा एकत्र करती है। अभी चार राज्यों में काम कर रहे हैं। अगले कुछ सालों में हर बड़े शहर में उपस्थिति दर्ज कराने का लक्ष्य है।

घर-घर पहुंचकर खरीदा जाता है कबाड़।
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