विश्व धरोहर दिवस / 100 के नए नोट पर आप जिस बावड़ी को देखते हैं उसे रीस्टोर किया था शहर के पुरातत्वविद् नारायण व्यास ने

गुजरात में रानी की वाव के रेस्टोरेशन का काम भोपाल के पुरातत्व विद् नारायण व्यास ने किया।

  • इस मौके पर धरोहरों की देखभाल करने वाले नारायण व्यास की कहानी और शैलचित्रों की बात भी...

Dainik Bhaskar

Apr 18, 2019, 02:14 PM IST

भोपाल. नोटबंदी के बाद कई नोट बदल दिए गए थे। इन्हीं में से एक नोट था 100 रुपए का। जामुनी रंग के 100 रुपए के इस नोट के पीछे एक खूबसूरत बावड़ी नजर आती है। यह सात मंजिला बावड़ी है गुजरात में स्थित रानी की वाव। ये आज इतनी खूबसूरत इसलिए है, क्योंकि 1981 में देश के आर्कियोलॉजिस्ट्स ने न सिर्फ इसका सही ढंग से डॉक्यूमेंटेशन किया, बल्कि इसका रीस्टोरेशन भी।

खास बात यह है कि जिन विशेषज्ञों की टीम इस बावड़ी के डॉक्यूमेंटेशन का काम कर रही थी, उसमें शामिल थे भोपाल के पुरातत्वविद् डॉ. नारायण व्यास। डॉ. व्यास ने 1981 से 1987 तक इस बावड़ी पर काम किया और बाद में इस पर थिसिस भी लिखीं।

विश्व धरोहर दिवस के अवसर पर नारायण व्यास से सिटी भास्कर ने जानी रानी की वाव को रीस्टोर करने की कहानी और यह समझने की कोशिश की कि यदि भोपाल में मौजूद हेरिटेज साइट्स को जर्जर होने से बचाया जाए, तो इसके लिए आखिर क्या करना होगा।

रेस्टोरेशन के दौरान तीन बार गिरने से बचे व्यास
डॉ. नारायण व्यास ने बताया- 1981 में मैं आगरा में एएसआई में पोस्टेड था। वहां से मेरा ट्रांसफर गुजरात कर दिया गया। काम दिया गया कि रानी की वाव को डॉक्यूमेंट करूं। 7 मंजिला इस बावड़ी में तब आधी ऊंचाई तक मिट्‌टी भर चुकी थी। बावड़ी की दीवारों पर खूबसूरत मूर्तियां बनी हैं। करीब 1500 मूर्तियां दशावतार विष्णु की और 200 मूर्तियां अप्सराओं की। सभी को मैंने फोटोग्राफी और स्केच के साथ डॉक्यूमेंट किया। यहां से एक-एक पत्थर को निकाल कर अधूरी कड़ियों को जोड़ा गया, कुछ गायब भी थे। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि दीवारों के पास संकरा प्लेटफॉर्म था। ढंग से बैठने की जगह भी नहीं होती थी।

तीन बार यहां से 70-80 फीट की गहराई में गिरते-गिरते भी बचा। गिरता तो मौत निश्चित थी, क्योंकि उस वक्त बावड़ी में पानी नहीं बल्कि टूटे हुए पत्थरों के अवशेष थे। एक बार बैलेंस बिगड़ा तो मैं दीवार पकड़कर लटक गया। एक बार वहां चक्कर आने लगा। गिर ना जाऊं, इस डर से मैं वहीं संकरी फर्श पर दो घंटों के लिए लेट गया। फर्श इस कदर ठंडी थी कि पीठ दर्द की समस्या हो गई और 6 महीने अस्पताल में रहना पड़ा। इलाज कराकर लौटा और फिर से डॉक्यूमेंटेशन शुरू किया। इसी के आधार पर एएसआई ने रेस्टोरेशन किया। आज जब नोट पर यह फोटो देखता हूं, तो खुद पर फख्र होता है।

बेनजीर पैलेस

  • यहां अंडरग्राउंड वॉटर का पूरा चैनल है, जिससे यहां फव्वारे चला करते थे, हमाम भी था, जिसके बारे में सभी को पता है। इसके मैप को फॉलो करते हुए, दोबारा संचालित किया जाए, तो यह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन सकता है। तीन सीढ़ी तालाब के बिलकुल किनारे इस पैलेस को खास गर्मियों के लिए बनवाया गया था।

बाग उमराव दूल्हा

  • इस बावड़ी के अलावा कई और बावड़ियां हैं, जिन्हें बचाने की जरूरत है। इनसे कूड़ा बाहर निकालें और रेगुलर सफाई करवाएं तो इन बावड़ियों में पानी वापस लौट आएगा। ये पीने के पानी की जरूरत को आज भी पूरा कर सकती हैं।

  • पुराने दरवाजे

इनके आस-पास बने 150 साल से भी पुराने बहुत से मकान हैं, जिसमें लोग रह रहे हैं। इन मकानों को लिविंग हेरिटेज घोषित कर इनके संरक्षण पर काम करना चाहिए। जैसे इनके ओवरऑल लुक को बनाए रखने के
लिए आस-पास के कंस्ट्रक्शन को नियंत्रित किया जाए। इस तरह शहर अपने मिजाज को लंबे समय तक जिंदा रख पाएगा।

यहां देख सकते हैं शैल चित्र

  • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के ओपन एयर एग्जीबिशन के पास स्थित पहाड़ी पर भी भीमबैठका की तरह शैलचित्र देखे जा सकते हैं। इन शैल चित्रों की खोज विष्णु श्रीधर वाकणकर ने 1956-57 की खोज के दौरान की थी। संग्रहालय परिसर में ऐसे लगभग 25 शैल चित्र हैं। पुरातत्वविदों की मानें तो मानव संग्रहालय में मिले यह शैल चित्र लगभग 10 हजार साल पुराने हैं।
भोपाल के रानी की वाव के रेस्टोरेशन काम करने वाले पुरातत्व विद् नारायण व्यास।
रानी की वाव।
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