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मध्यप्रदेश/ आध्यात्मिक आनंद ढूंढ़ने 24 साल की उम्र में फ्रांस छोड़ा, पूरा भारत घूमा, नर्मदा तट पर तलाश पूरी

Dainik Bhaskar | Jan 21, 2019, 04:38 PM IST
24 साल की उम्र में फ्रांस छोड़कर अध्यात्म की तलाश में नर्मदा किनारे साधना कर रही हैं।

  • होशंगाबाद के बांद्राभान में साधना में लीन हैं फ्रांस से आईं राधा मुनि
  • अध्यात्म, पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण ही जिंदगी का लक्ष्य 

Dainik Bhaskar

Jan 21, 2019, 04:38 PM IST

रामभरोसे मीणा। होशंगाबाद. मैंने दक्षिणी फ्रांस के कॉलेज में दाखिला ही लिया था कि एक चिड़िया की कहानी पढ़ी। इसमें चिड़िया परिवार को छोड़कर अपना संसार स्वयं बनाती है। उसके जीवन से प्रेरणा मिलते ही स्वयं की तलाश में मैंने बांद्राभान तक का सफर तय किया। तब यहां आध्यात्म के आनंद से परमानंद मिला। देवी दुर्गा और शिव की उपासना से यह संभव हो पाया। 

 

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लोग एक देश से दूसरे देश में महज घूमने के ख्यालों से जाते हैं लेकिन वहां की संस्कृति को देखकर उसे आत्मसात करने का साहस किसी में ही जागृत होता है। ऐसे ही जज्बे की बदौलत यूरोपियन देश आस्ट्रिया से संस्कृत और दर्शन पढ़कर आईं राधा मुनि आज नर्मदा-तवा संगम बांद्राभान में आध्यात्म का आनंद ले रही हैं। अब वे धर्म-अध्यात्म के साथ गरीब और असहाय युवतियों-महिलाओं के उत्थान के कामों में जुटी हैं।
 
आध्यात्मिक साधक राधा मुनि ने बताया बांद्राभान में अध्यात्म और आनंद के लिए नदी, जंगल और पहाड़ एक साथ विहंगम दृश्य आनंद की अनुभूति कराते हैं। यहां आने के बाद आध्यात्मिक शांति के साथ परमानंद का साथ मिलता है। बांद्राभान काली और शिव बाबा की उपासना के लिए शांति का स्थल है। 

 

 

ग्रीक पिता और फ्रांसीसी मां की बेटी को भाया भारत 
राधा मुनि का जन्म ग्रीक देश में हुआ। उनकी मां फ्रांस की थीं। स्कूली शिक्षा ग्रीक से करने के बाद उच्च अध्ययन फ्रांस और आस्ट्रिया में किया। 16 साल की उम्र से ही अध्यात्म में रुचि होने से 17 साल की उम्र में ही फ्रांस की सामाजिक संस्था में जैविक खेती की। कई देशों का भ्रमण किया। 24 साल की उम्र में भारत के आध्यात्मिक शहरों की यात्रा की। भारत में मन रम गया। राधा मुनि ने भारत की नागरिकता के लिए अपने देश की नागरिकता भी छोड़ दी। 

 

भारत के कई आध्यात्मिक शहरों में किया अध्ययन 

 

अध्यात्म- अध्यात्म से लगाव 16 साल की उम्र में हुआ। फ्रांस में संस्थाओं के संपर्क में रही। भारत के कई आध्यात्मिक शहरों में अध्ययन किया। इस दौरान वह बनारस, हरिद्वार आदि शहरों में भी रहीं। 20 साल से नर्मदा के किनारे बांद्राभान में साधनारत हैं। 

 

अध्यात्म, पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण जीवन का लक्ष्य 

 

पर्यावरण-नर्मदा के किनारे रहने के बाद लगातार पर्यावरण संरक्षण के लिए काम किया। स्वयं बगीचे में 100 से ज्यादा पेड़ लगाए। अब पौधों की नर्सरी लगा कर पर्यावरण संरक्षण करने के लिए लोगो को प्रेरित कर रही है। 

 

 

नर्मदा किनारे को ही बनाया साधना स्थल 

 

1989 में राधा मुनि भारत घूमने आईं। 9 साल तक भारत के हर क्षेत्र के अध्ययन किया। 1998 में नर्मदा की परिक्रमा शुरू की। तीन साल की परिक्रमा के बाद नर्मदा के किनारे को ही अपना लिया। पहले 6 माह गुजरात के आश्रम में रहने के बाद बांद्राभान के स्थल पर आश्रम बनाया। हाल ही में प्रयागराज में कुंभ स्नान करके भी आईं हैं। 

राधा मुनि महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण के लिए काम कर रही हैं।

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