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मध्य प्रदेश/ हाईकोर्ट ने पूछा आजादी के 71 साल बाद भी लोकसभा और विधानसभा में एंग्लो इंडियन के लिए आरक्षण क्यों

Dainik Bhaskar | Jan 14, 2019, 07:15 PM IST
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  • केन्द्र और राज्य सरकार को नोटिस
  • प्रावधान को असंवैधानिक करार देने की मांग

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 07:15 PM IST

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने केन्द्र और राज्य सरकार से पूछा है कि आजादी के 71 साल बाद भी लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एंग्लो इंडियन के लिए सीट आरक्षित क्यों रखी जाती है। सोमवार को इस मामले में जस्टिस आरएस झा और जस्टिस संजय द्विवेदी की खंडपीठ ने कानून मंत्रालय और राज्य सरकार के विधि एवं विधायी कार्यविभाग के प्रमुख सचिव को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई एक मार्च को होगी। ये याचिकानागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के डॉ पीजी नाजपांडे ने दायर की है।

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संविधान के 95वें संशोधन में अनुच्छेद 331 और 333 के तहत क्रमश: लोकसभा और विधानसभा में एंग्लो इंडियन के लिए सीट आरक्षित रखने का प्रावधान है। याचिकाकर्ता के वकील अजय रायजादा ने कहा कि यह प्रावधान 1950 में 10 साल के लिए रखा गया था, लेकिन हर बार एससीएसटी के साथ इसे भी 10 साल के लिए बढ़ा दिया जाता है। लोकसभा में राष्ट्रपति और विधानसभ में संबंधित राज्यपाल इन सीटों पर एंग्लो इंडियन कोनामांकित करतेहैं। याचिका में उक्त संशोधन को असंवैधानिक करार देने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता की दलील है कि आजादी और गणतंत्र के इतने साल बाद अब इसकी आवश्यकता ही नहीं है।

एंग्लो इंडियन कौन: इसके लिए भी नियम है। संविधान के अनुच्छेद 366 (2) के तहत एंग्लो इंडियन ऐसे किसी व्यक्ति को माना जाता है जो भारत में रहता हो और जिसका पिता या कोई पुरुष पूर्वज यूरोपियन वंश का हो। एंग्लो इंडियन भारत का अकेला समुदाय हैं जिनका अपना प्रतिनिधी संसद और राज्यों की विधानसभा में होता है।


अल्पमत को बहुमत में बदलने के लिए इस्तेमाल: अधिवक्ता अजय रायजादा ने तर्क दिया कि इस प्रावधान से संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लघंन हो रहा है। राजनीतिक दल संविधान के इस प्रावधान का इस्तेमाल अल्पमत को बहुमत में बदलने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत परीक्षण के दौरान एंग्लो इंडियन कोटे से विधायक मनोनीत करने पर रोक लगा दी थी।