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यौन उत्पीड़न केस / वकीलों ने कहा- सीजेआई के मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया का रुख सही नहीं

सुप्रीम कोर्ट।

  • वकील आशीष गोयल और गौतम भाटिया ने बार काउंसिल के चेयरमैन को ओपन लेटर लिखा
  • वुमन इन क्रिमिनल लॉ असोसिएशन ने भी मामले में जांच की मांग की

Dainik Bhaskar

Apr 22, 2019, 05:32 PM IST

नई दिल्ली. देश के चुनावी माहौल में एक खबर जो एक तरह से दब कर रह गई है। यह भारत के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर एक पूर्व कनिष्ठ महिला न्यायिक कर्मी द्वारा लगाए यौन उत्पीड़न के आरोप और उन पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अब तक की गई कार्यवाही की खबर है। इसे लेकर अब दो वकील आशीष गोयल और गौतम भाटिया ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन को एक ओपन लेटर लिखा। उन्होंने न केवल इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही, बल्कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के रुख की भी आलोचना की है। इसके अलावा वुमन इन क्रिमिनल लॉ असोसिएशन (डबल्यूसीएलए) ने भी एक बयान जारी कर पूरे मामले में जांच की मांग की है। गोयल और भाटिया ने भी इस मांग का समर्थन किया है।

वकील ने कहा- अब तक हुई कार्यवाही कानून सम्मत भी नहीं

  1. गोयल और भाटिया ने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन को लिखे अपने खत में इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई कार्यवाही को संविधान की गरिमा को कमतर करने वाला बताते हुए कहा है कि उक्त कार्यवाही कानून सम्मत भी नहीं है। उन्होंने कहा है कि ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की एक निश्चित व्यवस्था है। इसके अनुसार एक जांच समिति को उक्त आरोपों का संज्ञान लेते हुए प्रतिपक्ष (इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस) को नोटिस जारी कर जांच प्रारंभ करनी थी, जो नहीं किया गया। इसके बजाय सीजेआई ने उन पर लगे उक्त आरोपों का जवाब देने के लिए अपनी प्रशासनिक शक्तियों का उपयोग कर स्वयं की सुविधानुसार एक विशेष बेंच का गठन किया, जिसमें स्वयं को भी शामिल कर लिया।

  2. इस प्रकार शनिवार 20 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में जो कुछ हुआ वह न्याय के उपहास से कुछ भी कम नहीं था। चीफ जस्टिस ने अपने संवैधानिक पद का उपयोग करते हुए उन पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों को न केवल नकारा, बल्कि शिकायतकर्ता के खिलाफ नकारात्मक टिप्पणी करते हुए स्वयं पर लगे आरोपों को न्यायिक व्यवस्था के विरुद्ध एक बड़ी साजिश बताया। साथ ही साथ इस मामले में मीडिया की भी आवाज दबाने की कोशिश की। इसके अलावा अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल ने भी शिकायतकर्ता की गैरमौजूदगी में उसका चरित्र हनन किया। यह सब तब किया गया जब शिकायतकर्ता को इस कथित सुनवाई की कोई पूर्व सूचना भी नहीं दी गई।

  3. गोयल और भाटिया ने बार काउंसिल के चेयरमैन पर आरोप लगाया कि उन्होंने न्यायिक व्यवस्था को उक्त उपहास का भागी बनते हुए संपूर्ण बार को इस मामले में चीफ जस्टिस के साथ खड़ा बताया। इस संबंध में गोयल और भाटिया ने बार काउंसिल के चेयरमैन को इस मामले में पूरे बार की ओर से बोलने पर आपत्ति जताते हुए लिखा है कि वे इस संबंध में उनके (गोयल और भाटिया) की ओर से बोलने के अधिकारी नहीं हैं।

  4. गोयल और भाटिया ने आगे लिखा कि चीफ जस्टिस पर लगे आरोपों के विषय में कुछ भी टिप्पणी करने के बजाय उन्होंने विश्वास जताया कि इस संबंध में एक स्वतंत्र और उच्चाधिकार जांच होनी चाहिए ताकि न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास बना रहे और न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता बरकरार रहे। उन्होंने अपने पत्र में आगे लिखा है कि न्याय के पेशे से जुड़े होने के नाते वे स्वयं को इस मामले में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के असंवैधानिक रुख से खुद को पूरी तरह अलग करते हुए निम्न कारणों से काउंसिल के उक्त रुख की आलोचना करते हैं-

  5. प्राकृतिक न्याय के केंद्र के दो मूल सिद्धांत हैं- पहला कि कोई भी व्यक्ति स्वयं के मामले में जज नहीं हो सकता और दूसरा यह कि दूसरे पक्ष को भी सुना जाना चाहिए। गोयल और भाटिया ने अपने पत्र में लिखा है कि चीफ जस्टिस ने इस मामले में नैसर्गिक न्याय की इन दोनों मूल भावनाओं की पूरी तरह से अवहेलना की है। इस संबंध में किसी भी तरह से चीफ जस्टिस को उक्त मामले में गठित बेंच का हिस्सा नहीं होना था और न ही उन्हें स्वयं पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों पर बयान देने के लिए उनके संवैधानिक कार्यालय का उपयोग करना था। चीफ जस्टिस को उन पर उक्त आरोप लगते ही मामले को सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक शिकायत समिति को भेजना था, जिसकी अध्यक्ष न्यायमूर्ति इंदू मल्होत्रा हैं। लेकिन ऐसा न करते हुए चीफ जस्टिस ने खुद पर लगे आरोपों के संबंध में उक्त समिति का तिरस्कार किया है। न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से स्वतंत्रता नहीं है। दूसरी ओर शपथपत्र के माध्यम से लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों को आसानी से वाइल्ड और स्कैंडलस और राजनीति से प्रेरित कह कर खारिज नहीं किया जा सकता है।

  6. गोयल और भाटिया ने पत्र में आगे कहा कि बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया का मुख्य दायित्व कानून और न्यायिक सुधारों का समर्थन और उनका पोषण करना है, न कि उन्हें दबाना। इसके अलावा गोयल और भाटिया ने इस मामले में डबल्यू. सी. एल. ए. द्वारा उठाई गई निष्पक्ष जांच की मांग का भी समर्थन किया है।

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