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गुजरात से ग्राउंड रिपोर्ट / गुजराती इमोशनल नहीं, प्रोफेशनल हैं; लेंगे राहुल-प्रियंका की परीक्षा

  • मध्य गुजरात में सवाल: क्या आडवाणी की विशाल जीत का रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे अमित शाह
  • उत्तर गुजरात: कच्छ-भुज में सांसदों से ऐसी नाराजगी, भाजपा को 3 चेहरे बदलने पड़ गए

Dainik Bhaskar

Apr 20, 2019, 12:35 PM IST

अहमदाबाद. रात नौ बजे का वक्त। सरखेज-गांधीनगर हाई-वे पर थलतेज चौकड़ी पर मेडिकल स्टूडेंट अर्चना शाह अपने ग्रुप में काफी एग्रेसिव दिखीं। कहती हैं- राहुल-प्रियंका साबरमती आश्रम में बापू के सामने कितनी ही प्रार्थना कर लें, गुजराती इमोशनल नहीं, प्रोफेशनल हैं। हमें तो मोदी-शाह की जोड़ी ही चाहिए....जो पाकिस्तान को सबक सिखाए। बिजनेस को आगे बढ़ाए....। जैसा अर्चना कह रही हैं, कमोबेश वैसा ही आम गुजराती मध्य गुजरात में सोचता है। मध्य गुजरात यानी सिर्फ भाजपा। अहमदाबाद की दो शहरी सीटें उसका अभेद्य किला है और गांधीनगर सीट पिछले 35 सालों से मजबूत दीवार है। लालकृष्ण आडवाणी की जगह इस बार अमित शाह गांधीनगर से मैदान में हैं।

राजनीतिक विश्लेषक आरके मिश्रा कहते हैं- शंकरसिंह वाघेला ने ढाई लाख वोटों से जीत कर इस सीट पर भाजपा का केसरिया तिलक लगाया था। आडवाणी सात बार सांसद रह चुके हैं। वे पिछला चुनाव करीब पांच लाख वोटों से जीते थे। अब देखना है अमित शाह इसे कितना आगे बढ़ाते हैं। उधर, अहमदाबाद वेस्ट सीट में भाजपा ने सांसद किरीट सोलंकी पर फिर भरोसा जताया है और कांग्रेस तीन चुनावों से नए-नए चेहरे उतार रही है। जो हर बार फेल हो रहे हैं। अहमदाबाद ईस्ट में सांसद परेश रावल ने जब चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया तो भाजपा ने यहां हंसमुख पटेल को उतारा है। कांग्रेस ने भी हार्दिक पटेल की सहयोगी गीता बेन पटेल को यहां टिकट दिया है। बहरहाल अहमदाबाद ईस्ट-वेस्ट की 15 विधानसभा सीटों में से 11 पर भाजपा का कब्जा है इसलिए वह काफी मजबूत स्थिति में है।


खेड़ा लेउवा पटेल बाहुल्य सीट है। मौजूदा सांसद देवूसिंह चौहान जो ठाकोर समुदाय से हैं, उन्होंने कांग्रेस से सीट छीनी थी। यहां किसान वर्ग ज्यादा होने के कारण कर्ज माफी की चर्चा है। लेकिन पहली पसंद मोदी ही है। मेलड़ी माता के प्रसिद्ध मंदिर में बैठे हीरा भाई व समाभाई ने बताया कि यह पिछड़ा इलाका है, जो पिछड़ों की सुनेगा उसी को वोट मिलेगा। विधानसभा की दो सीटों पर हमने कांग्रेस को भी जिताया है।


सौराष्ट्र से लगती सुरेंद्रनगर भाजपा की कमजोर सीट मानी गई है। इस लोकसभा की सभी 6 सीटों पर कांग्रेस के विधायक हैं। भाजपा ने यहां कुछ समय पहले ही यहां के ध्रांगध्रा से कांग्रेसी विधायक पुरुषोत्तम सवारिया को तोड़ा है। गुजरात की भाजपा सरकार में एक चौथाई मंत्री कांग्रेस से तोड़ कर लाए हुए हैं।

'भाजपा के वादे अधूरे'
2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने जिन दो सीटों से चुनाव लड़ा था, उनमें वडोदरा भी एक थी। तब वडोदरा को शंघाई बनाए जाने का वादा किया गया था। महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी के बाहर सतीश पटेल और ईशांत ठाकोर कहते हैं- अभी तक तो मोदीजी की पिछली यात्रा के निशान (खड्‌डे) भरे नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषक जयेश शाह बताते हैं- एम्स खोलने और इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने का वादा भी अभी तक अधूरा है। वडोदरा भाजपा का गढ़ है। उपचुनाव जीती सांसद रंजन बेन फिर मैदान में हैं। उनके खिलाफ कांग्रेस ने प्रशांत पटेल के नए चेहरे पर दांव खेला है। रंजन बेन कहती हैं- काम अधूरे रह गए, इसलिए तो उन्हें पूरा करने के लिए दूसरा मौका मांग रहे हैं। लोग भले ही यहां भाजपा पर तंज कस रहे हो, इसके बावजूद मोदी की लोकप्रियता यहां कायम है। तभी तो यहां सातों विधानसभा सीटें भाजपा ने जीती थीं। आणंद का जिक्र आने पर महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर अमित ढोकलिया कहते हैं- आणंद में जातीय गणित चलता है। ओबीसी की दरबार, राजपूत और पाटीदार निर्णायक जातियां हैं। भाजपा ने पिछली मोदी लहर में भी बहुत कम मार्जिन से जीते दिलीप पटेल का टिकट काट कर मितेश पटेल को प्रत्याशी बनाया है। हालांकि, यहां कांग्रेस के भरतसिंह की स्थिति बेहतर दिखती है। उनके परिवार का दबदबा है। यहां 7 विधानसभा सीटों में से 5 पर कांग्रेस जीती थी।


दाहोद में कांग्रेस के टिकट पर सवाल हैं। लोग कहते हैं-कांग्रेस यहां सोना पटेल जैसे दमदार चेहरे से भाजपा के जसवंत सिंह को टक्कर दे सकती थी, लेकिन यहां कांग्रेस ने बाबू भाई कटारा को प्रत्याशी बनाया है। यहां आदिवासियों में फॉरेस्ट ट्राइबल एक्ट के जजमेंट व कुछ जातियों को ही सर्टिफिकेट देने से असंतोष है। छोटा उदयपुर के सांसद रामसिंह राठवा ने भी ट्राइबल एक्ट में आदिवासियों का सपोर्ट नहीं किया और आंदोलन को कंट्रोल करने मंे भी एक्टिव नहीं रहे। सांसद के प्रति गुस्से को देखकर भाजपा ने यहां गीता राठवा को उतारा है। पंचमहाल की सीट पर भाजपा ने मौजूदा सांसद प्रभातसिंह का टिकट काट दिया अौर रतनसिंह को खड़ा कर दिया है। इससे प्रभातसिंह नाराज हो गए। भाजपा को उनकी नाराजगी का नुकसान उठाना पड़ सकता है।


कच्छ में भाजपा ने पिछले चुनाव में विनोद चावड़ा का नया दलित चेहरा उतारा और जीत हासिल की थी। उन्हीं को टिकट दिया है और उनके मुकाबले में कांग्रेस ने नरेश माहेश्वरी का उतारा है। यहां गुजरात कांग्रेस आईटी सेल की उपाध्यक्ष अंजली गौड़ कहती हैं- मोदी साब नर्मदा को कच्छ तक तो नहीं ला पाए। अंजार, मांडवी व भुज में 7-7 दिन तक पानी नहीं आता। सिविल अस्पताल को भी अडाणी को दे दिया, जिन्होंने मेडिकल कॉलेज बना लिया है। उसमें भी कच्छ के स्टूडेंट्स को 20% सीटें देने का वादा भी पूरा नहीं हुआ है।


पाटन में व्यापारी रवि पटेल, सोलर रूफ टॉप कारोबारी कुणाल दर्जी को मौजूदा सांसद लीलाधर वाघेला का नाम तक याद नहीं था। इसी नाराजगी को देखते भाजपा ने भरतसिंह का नया चेहरा उतारा है और कांग्रेस ने जगदीश ठाकोर पर दोबारा दांव लगाया है।


मेहसाणा में हार-जीत पटेलों पर तय होती है क्योंकि वे सबसे ज्यादा 17% तो है ही, शेष जातियों पर भी उनका प्रभाव है। मौजूदा सांसद जयश्री बेन के सामने चुनाव लड़े कांग्रेस के जीवाभाई भी भाजपा में चले गए। सरकारी कर्मचारियों के साथ बैठे राजा भाई और प्रमोद पटेल मौजूदा सांसद से खुश नहीं थे। उन्होंने बताया कि भाजपा ने अच्छा किया यहां से जयश्री का टिकट काट दिया, वे जीत नहीं पातीं।

हार्दिकके कांग्रेस में शामिल होने से भाजपा की राह कठिन

बनासकांठा व साबरकांठा का रास्ता भाजपा के लिए कठिन होता रहा है। पाटीदार आंदोलन खत्म हो चुका है, पाटीदार पहले तो एकतरफा भाजपा की ओर ही थे। अब हार्दिक के कांग्रेस में जाने से एक तबका कांग्रेस को मुफ्त ही मिल रहा है। विधानसभा चुनाव के बाद शंकरसिंह वाघेला के बेटे महेंद्रसिंह भाजपा में चले गए। बनासकांठा के सांसद हरिभाई चौधरी की जगह परबत भाई पटेल को टिकट दिया है और कांग्रेस ने पारथी भाई भटोल को सामने उतारा है। साबरकांठा में भाजपा ने मौजूदा सांसद दीपसिंह पर ही भरोसा जताया है क्योंकि उन्होंने शंकरसिंह वाघेला को हराया था। उनका मुकाबला कांग्रेस के राजेंद्र ठाकोर से है। दोनों सीटों के 14 विधानसभा क्षेत्रों में 9 पर कांग्रेस और 5 पर भाजपा विधायक है।

सबसे असरदार फैक्टर क्या रहेंगे?

मुद्दे जो असरदार रहेंगे

  • गुजरात में मुख्य तौर पर मोदी-शाह की जोड़ी ही सबसे बड़ा भावनात्मक मुद्दा है। खेड़ा के पिछड़े इलाके में विकास मुद्दा है और सुरेंद्र नगर में पाटीदार आंदोलन की छाया आज भी दिखती है।
  • वडोदरा एम्स, इंटरनेशनल एयरपोर्ट मुद्दे तो हैं, लेकिन ये असरदार साबित नहीं होंगे। कांग्रेस कच्छ-भुज में भाजपा की अंदरूनी कलह को भुनाने का प्रयास कर रही है। भाजपा ने यहां बनीपंचम एरिया को विशेष दर्जा देने का वादा पूरा नहीं किया।

जातीय गणित जो दिखेगा: अमित शाह के गांधीनगर से उतरने पर खेड़ा, सुरेंद्रनगर व बनासकांठा तक माहौल बन गया है। अहमदाबाद व गांधीनगर की सीटों पर शहरी वोटर मोदी के पक्ष में हैं। खेड़ा-सुरेंद्रनगर में पाटीदार व ठाकोर प्रभावी हैं। वडोदरा में जाति के बजाय पार्टी ही आगे है। 2014 में गुजरात की सभी 26 सीटें भाजपा ने जीती थीं।

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